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Lok Sabha Debates
SHORT DURATION DISCUSSIONS (RU: Regarding Atrocities On Dalits. on 12 March, 2003

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14.06 ½ hrs.

Title: Regarding atrocities on Dalits.

MR. SPEAKER: We will take up an important discussion regarding atrocities on dalits. There are two names – Shri Ramji Lal Suman and Shri Ram Vilas Paswan.

Shri Ramji Lal Suman may please initiate.

श्री रामजीलाल सुमन (फिरोजाबाद): अध्यक्ष महोदय, मैं आपका धन्यवाद प्रकट करता हूं कि आज आपने देश में दलितों पर हो रहे अत्याचार पर चर्चा कराए जाने की व्यवस्था दी। एक लम्बे अर्से से दलितों पर हो रहे अत्याचार पर सदन में चर्चा नहीं हुई।

आपको स्मरण होगा कि पिछले सत्र के दौरान जब श्री प्रमोद महाजन संसदीय कार्य मंत्री थे, उन्होंने आपसे वार्ता करके यह सुनिश्चित किया था कि राष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर चर्चा के तत्काल बाद दलितों पर अत्याचार के सवाल पर चर्चा करायी जाएगी लेकिन यहां प्राथमिकताएं कुछ और भी रहीं। मैं समझता हूं कि वे प्राथमिकताएं कम नहीं थीं। इसलिए आज हम इस पर चर्चा कर रहे हैं।

आजादी के ५२-५३ वर्ष बाद भी दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं जो अत्यधिक चिन्ता और लज्जा का विषय है। कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जिस दिन दलित अत्याचार की कोई न कोई खबर किसी समाचार पत्र में प्राथमिकता के साथ न आती हो। डरबन सम्मेलन के पूर्व और बाद में हमारी सरकार और समाज ने ऐलान कर दिया कि अस्पृश्यता नाम की कोई चीज हमारे देश में नहीं है और वह समाप्त हो गई है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति अत्याचार निवारण अधनियम हमारे देश में है। मेरे कहने का मतलब यह है कि कानून के जरिए किसी समस्या का अंत नहीं हो सकता है। यहां सवाल हमारी मनोवृत्ति का है, हमारी सोच का है, हमारे संस्कारों का है, हमारी जहनियत का है, हमारे तौर-तरीकों का है। आज जो कुछ पूरे देश में हो रहा है, उसके पीछे हमारी मनोवृत्ति है। कुछ लोग अभी भी अपनी मनोवृत्ति से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है और बदलते संदर्भ में नये सिरे से सोचने के लिये तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि आज दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। जहां तक आंकड़ों का सवाल है, राज आंकड़ों से नहीं चलता। पं. जवाहर लाल नेहरू के जमाने से लेकर भारत सरकार और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री डा. सम्पूर्णानन्द के जमाने से लेकर उ. प्र. की हर राज्य सरकार अपनी उपलब्धियों के बारे में बखान करती रही है। आंकड़ों के आधार पर कोई प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री यह साबित कर देगा कि उन से बढ़कर अच्छी सरकार किसी ने नहीं चलाई। सरकार के बारे में तो जनता ही जानती है कि वह किस प्रकार चल रही है। एक आम आदमी जो उसके बारे में सोचता है, उसके बारे में भाषा बोलता है। यही वह पैमाना है जिसके जरिये सरकार के बारे में सोचा जा सकता है। आज वही काम इस देश में हो रहा है। दलितों पर अत्याचार होने की घटनायें बढ़ रही हैं। मैंने और हमारे वरिष्ठ सहयोगी श्री राम विलास पासवान जी ने झज्जर में गत दिनों जो हुआ…( व्यवधान)अध्यक्ष महोदय, यह बात ठीक नहीं। इन लोगों को पूरी बात कहने का मौका मिलेगा, पहले मेरी बात सुनें। मैं दूसरी बात कह रहा हूं कि वहां जो कुछ हुआ, वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं उस बात का उल्लेख इसलिये करना चाहता था कि जब ९ दिसम्बर को सरकार की ओर से गृह मंत्री जी ने बयान दिया तो कहा कि दलितों पर होने वाले अत्याचार की घटनाओं में कमी आई है जबकि २९ नवम्बर को इसी सदन में सामाजिक अधिकारिता विभाग के मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार दलितों पर होने वाले अत्याचारों की घटनायें बढ़ रही हैं। अध्यक्ष महोदय, एक ही सरकार के दो मंत्रियों के बयानों में इस प्रकार का विरोधाभास हो- एक मंत्री कहता है कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई है, दूसरा कहता है कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों में बढ़ोत्तरी हो रही है, मैं समझता हूं कि यह चिन्ता का विषय है। सरकार की दिलचस्पी इस ओर नहीं है।

अध्यक्ष महोदय, यहां झज्जर के सवाल का जिक्र किया गया। सवाल इस बात का नहीं कि यह घटना झज्जर में हुई या किसी दूसरी जगह हुई लेकिन इन घटनाओं में निरंतर वृद्धि हो रही है। यद्यपि मैं झज्जर के बारे में कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जब राज्य की परिकल्पना की गई, राज्य क्यों बना, राज्य के बनने की क्या आवधारणा थी, उसके पीछे एक यही उद्देश्य था कि कोई किसी की सम्पति न लूटे, न जान ले, समाज में अराजकता न फैले, इसलिये हमने समाज को नियंत्रित करने के लिये इस तंत्र को विकसित किया। झज्जर में जो कुछ हुआ, पुलिस चौकी या थाने के सामने आम आदमी को जबरन मार डाला गया और पुलिस मौके पर मूकदर्शक बनी रही। अगर प्रशासन की शक्ति का इस्तेमाल किया होता, आंसू गैस छोड़ी गई होती, हवाई फायरिंग हुई होती तो स्थिति बदल सकती थी। झज्जर की घटना कोई मामूली घटना नहीं थी। जिस तरह से ५ लोगों को मार दिया गया, वह गंभीर सवाल है। दिनांक ९ दिसम्बर को भारत के गृह मंत्री जी ने झज्जर के संबंध में जो बयान दिया, उसका सत्यता से कोई संबंध नहीं है।

सिर्फ एक हवा बांधी गई, गोकशी के नाम पर एक गलत खबर फैलाई गई। जब हरियाणा के मुख्य मंत्री जी ने कहा कि जिस गोकशी की बात की जा रही है, उसकी स्वाभाविक मौत हुई थी और उस स्वाभाविक मौत का इस घटना से कोई संबंध नहीं है। …( व्यवधान)

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह (रोहतक): आप तथ्यों को तोड़-मरोड़कर गलत ढंग से पेश कर रहे हैं। वहां दलित और गैर दलित का कोई सवाल नहीं था। आप सिर्फ वोट की राजनीति के लिए ऐसा कर रहे हैं। वहां जो घटना घटी वह अकस्मात थी।…( व्यवधान)

अध्यक्ष महोदय : यदि गलत हो तो आप अपने भाषण में कहिये।

श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, इस तरह से मेरा बोलना मुश्किल हो जायेगा। मैं आपका संरक्षण चाहता हूं।

अध्यक्ष महोदय : इसलिए मैं उन्हें कह रहा हूं कि आपको जो कुछ कहना है वह अपने भाषण के समय कहिये।

श्री रामजीलाल सुमन : अध्यक्ष महोदय, जो कुछ हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। मैं इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि जिन लोगों के जिम्मे हमारे संरक्षण का काम है। पुलिस का काम हम लोगों को संरक्षण देना है। लेकिन अगर वहां पुलिस चौकी से खींचकर लोगों को पुलिस चौकी के सामने जलाकर मारा डाला जाए तो मैं समझता हूं कि इससे ज्यादा गंभीर घटना कोई दूसरी नहीं हो सकती है।

जहां तक दलित अत्याचारों का सवाल है, दलितों की समस्याओं के लिए हमने अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग बनाया। लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि उस आयोग की रिपोर्ट पर सदन में कभी चर्चा नहीं होती। काफी परिश्रम के बाद वह रिपोर्ट बनाई जाती है। लेकिन हम लोग चर्चा नहीं करते। वर्ष १९९८-१९९९ की रिपोर्ट सभा पटल पर रख दी गई है। लेकिन वर्ष २००० की छठवीं रिपोर्ट राष्ट्रपति जी के पास पहुंचा दी गई है, लेकिन सदन के सभा पटल पर नहीं रखी गई है। मेरा आपसे आग्रह है कि आगे आने वाले समय में इस रिपोर्ट पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। जब तक अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा नहीं होगी, तब तक मैं नहीं समझता कि दलित कल्याण एवम् जनकल्याण के कोई अच्छे परिणाम हम लोग निकाल पायेंगे। जहां तक दलितों पर अत्याचारों का सवाल है, वर्ष २००० के आंकड़े मेरे पास हैं। वर्ष २००० में महाराष्ट्र में ९०६७, राजस्थान में ८२४७, कर्नाटक में ५९२३, उड़ीसा में ५८८७, तमिलनाडु में २९२१, केरल में २१८६ और उत्तर प्रदेश में ७७९६३ दलितों पर अत्याचार हुए। उत्तर प्रदेश में ७७९६३ अपराध पंजीकृत हुए। दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों में अगर कोई अव्वल प्रदेश है तो वह उत्तर प्रदेश है। सवाल यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हमारी जाति क्या है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम सोचते क्या हैं। हमारा काम करने का तरीका क्या है। लोगों का लक्ष्य सिर्फ सरकार चलाना है, मैंने आपसे पहले भी निवेदन किया था कि सरकार कितनी चली है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, जितने भी दिन सरकार चली है, उस सरकार ने जनकल्याण के कार्य किये हैं या नहीं किये हैं, यह महत्वपूर्ण है। सरकार चार दिन चले या ४० दिन, लेकिन सरकार चलने की दिशा सार्थक होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में एक सूत्री कार्यक्रम है कि किसी तरह से सरकार चलनी चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, दसवीं पंचवर्षीय योजना का जो प्रारूप बना है, मैं उसके सिलसिले मैं कहना चाहूंगा कि उत्तर प्रदेश में जो अपराध पंजीकृत हुए हैं, उनमें सिर्फ ३९ प्रतिशत पंजीकृत अपराधों की जांच हुई है, शेष अपराधों की जांच नहीं हुई है और उत्तर प्रदेश में जो वर्ष २००० में ७७९६३ अपराध पंजीकृत हुए हैं, उनमें सिर्फ ३६६० केसिज का सिर्फ निस्तारण हुआ है।

५९२ केसेज़ में सिर्फ सज़ा हुई और ३०६८ केस कोर्ट से बरी हुए। दलितों पर अत्याचार होने से संबंधित मामलों को निपटाने की यह दर है। कुल मिलाकर स्थिति ठीक नहीं है। मैं समझता हूँ कि यह किसी एक दल का सवाल नहीं है। इन सब सवालों पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।

अध्यक्ष महोदय, मैंने अभी हरियाणा का ज़िक्र किया। न सिर्फ हरियाणा, बल्कि हर जगह से दलितों पर अत्याचार के समाचार आते हैं। राजस्थान की राजधानी जयपुर से ६० किलोमीटर की दूरी पर फागी तहसील में चकबारा में तालाब में नहाने के सवाल पर दलितों पर अत्याचार हुआ। ५ सितम्बर २००२ को तमिलनाडु के जिला डिंडिगुल के गांव कोण्डमपट्टी के शंकर दलित को पेशाब पीने के लिए मजबूर किया गया। आज ही समाचार छपा है जनसत्ता में कि मुरैना जिले के कचनौदा गांव में १६ वर्षीय किशोरी को अकेला पाकर उसके साथ बलात्कार किया गया और जब उसके परिवार के लोग थाने में अपराध दर्ज करा आए तो उन्हें धौंस दी गई कि तुमने अपराध दर्ज कराकर ठीक नहीं किया। उसके बाद मुल्ज़िम के बाप ने उस लड़की को अकेला पाकर उसकी हत्या कर दी जिसने बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया था। मैंने उत्तर प्रदेश का ज़िक्र खास तौर से आपसे किया। ८ दिसम्बर को अंबेडकर इंटर कालेज मेरठ में हिन्दू आतंकवाद विरोधी रैली का आयोजन था। पंडाल लगा हुआ था और लोग अपनी बात कहना चाहते थे। भारतीय जनता युवा मोर्चा के नौजवान यहां से वहां गए। इन लोगों ने पंडाल तोड़ा, माइक तोड़ा और बाबा अंबेडकर तथा महर्षि वाल्मीकि की तस्वीर फाड़ दी। वहां जाकर उत्पात मचाया। सबसे पहले पुलिस ने जब देखा कि इनका व्यवहार ठीक नहीं है तो भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को खदेड दिया लेकिन बाद में सरकार के दबाव में, सरकार के एक मंत्री के कहने पर जो बेगुनाह और बेकुसूर लोग थे, जो शांति से अपनी बात कहना चाहते थे, उन्हीं लोगों के खिलाफ देशद्रोह से लेकर कोई संगीन अपराध ऐसा नहीं बचा जो दलितों के खिलाफ दर्ज न हुआ हो।

१४.२२ hrs.( Mr. Deputy Speaker in the Chair)

उपाध्यक्ष महोदय, यह बहुत गंभीर मामला है। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री के क्षेत्र में एक दलित महिला अंजु के साथ बलात्कार हुआ। उसमें दो मुल्ज़िम थे। एक मुल्ज़िम को जेल भेज दिया गया और जो दूसरा मुल्ज़िम था कृपाल सिंह, उसको इसलिए जेल नहीं भेजा गया कि वह बसपा के जिलाध्यक्ष का भाई था। तीन-चार महीने हो गए लेकिन वह सत्तारूढ़ दल की पार्टी के जिलाध्यक्ष का भाई है इसलिए उसके खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। ५ सितम्बर, २००२ को हरौड़ा विधान सभा क्षेत्र के गंगलहेड़ी थाना के गांव रसूलपुर में बलात्कार हुआ। कोई कार्रवाई नहीं हुई। बड़ौत बागपत में दलितों की ३० बीघा गन्ने की फसल और झोपड़ियां फूंक डालीं। यह ७ नवंबर की घटना समाचार-पत्रों में छपी है। मेरठ के हर्दा गांव के दलितों के पट्टों पर ज़बरन कब्ज़ा कर लिया गया मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में जंगल राज चल रहा है। नौएडा में २४ अगस्त की घटना है। दनकौर थाना क्षेत्र के गांव औरंगाबाद में १ अगस्त को श्यामी की पत्नी श्रीमती राजन देवी के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। कोई कार्रवाई नहीं हुई और रिपोर्ट तक नहीं लिखी गई।

उपाध्यक्ष महोदय ये घटनाएं निरन्तर हो रही हैं। दिनांक ०८-११-२००२ को मुजफ्फरनगर में पुगाना थाना क्षेत्र के गांव डूंगरपुर में ऋषिपाल की सुपुत्री कमला की फांसी लगाकर हत्या कर दी गई। पुलिस में रिपोर्ट लिखाई गई, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट नहीं लिखी। बालिका के साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जहां तक उत्तर प्रदेश का सवाल है, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस फर्जी मुठभेंड़ करने में भी सबसे आगे है। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश पुलिस पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश पुलिस इंसान बने। आज उत्तर प्रदेश के दलित अपने को सबसे अधिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वहां की मुख्य मंत्री का केवल एक सूत्रीय कार्यक्रम सरकार चलाना है जिसके कारण वहां दलितों की घोर उपेक्षा हो रही है। उनके साथ कोई न्याय नहीं हो रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपकी मार्फत एक निवेदन और करना चाहूंगा कि जब इस सदन में धर्म परिवर्तन का प्रश्न आता है, तो बड़ा हल्ला होता है, लेकिन मैं अपने मित्रों से यह पूछना चाहूंगा कि धर्म परिवर्तन के मूल में क्या है, पहले इसको जानिए। कल, परसों विनय कटियार जी यहां बैठे हुए थे, आज नहीं हैं, वे अम्बेडकर को पढ़ रहे थे। मायावती के खिलाफ जब कभी कोई बयान देना होता है, तो वे अम्बेडकर के ही माम का उल्लेख करते हैं, यह बात अलग है कि जब वाजपेयी जी डांट देते हैं, तो दुबारा बयान देने की हिम्मत नहीं करते, उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि जनता धर्म-परिवर्तन क्यों करती है। यह वर्ण-व्यवस्था, यह छुआछूत और यह सामाजिक विषमता,…( व्यवधान)

श्री दिग्विजय सिंह जी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द और महात्मा गांधी जी ने कहा था कि यदि हिन्दू धर्म, समानता का धर्म नहीं बन सकता है, तो मैं चाहूंगा कि यह धर्म नष्ट हो जाए। आज जो कुछ हो रहा है और आरोप लग रहे हैं कि धर्म-परिवर्तन हो रहा है, मिशनरीज धर्म-परिवर्तन करा रही हैं। कभी आपने अपने आप से पूछा कि आपका व्यवहार कैसा है, आप क्या कर रहे हैं ?

उपाध्यक्ष जी, मुझे हरियाणा के माननीय सांसद माफ करें, मैं एक प्रार्थना करना चाहूंगा कि क्या कभी आपने झज्झर में जब पांच दलित मारे गए, तो विश्व हिन्दू परिषद््, आर.एस.एस. और बजरंग दल के लोग जश्न क्यों मनाते हैं और यह क्यों कहते हैं कि हम उन लोगों को पुरस्कृत करेंगे जिन्होंने पांच दलितों को मारा है। …( व्यवधान)

श्री रामचन्द्र बैंदा (फरीदाबाद) : उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य बिलकुल गलत बोल रहे हैं। न आर.एस.एस. और न विश्व हिन्दू परिषद्, किसी ने कोई जश्न नहीं मनाया। माननीय सदस्य को इस प्रकार की गलत बात कहने से रोका जाना चाहिए।…( व्यवधान)

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया) : उपाध्यक्ष महोदय, माननीय सदस्य को ऐसी गलत इन्फर्मेशन हाउस में नहीं देनी चाहिए। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : रामजी लाल सुमन जी, यह बहुत गम्भीर मामला है। आप इस विषय में कंट्रोवर्सी मत लाइए। आप सब्जैक्ट पर बोलिए।

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं स्वयं कह रहा हूं कि यह बहुत गम्भीर मामला है। यह समाचार सभी समाचारपत्रों में छपा है कि वहां जश्न मनाए गए, जो कातिल थे, उनको बचाने का काम किया गया और यह कहा गया कि हम उनको पुरस्कृत करेंगे, उनको शाबाशी देंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, ईसाई के मरने के बाद, दलित के मरने के बाद, यदि जश्न मनाया जाएगा, खुशी मनाई जाएगी, तो इस देश में धर्म-परिवर्तन होने से कोई माई का लाल नहीं रोक सकता। यह कुछ लोगों के कुकर्मों का फल है। इसके अलावा कोई दूसरा कारण नहीं है। यह हालत हमारे देश में है और मुझे माफ करेंगे, उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री, मायावती के क्षेत्र हरोड़ा में ३० दलित परिवारों ने धर्म-परिवर्तन कर लिया है। और पूरे देश में यह सिलसिला चल रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय, यह केवल मान-सम्मान का मामला है। आज का दलित २०० साल पुराना दलित नहीं है। उसने रूस और फ्रांस की क्रान्ति पढ़ी हैं। आज का नौजवान उस माहौल में रहने के लिए तैयार नहीं है। वह आज समाज में बदलाव देख रहा है। आज समाज में दो प्रवत्तियां पनप रही हैं। एक तो दलित में स्वाभिमान से जीने का मादा पैदा हुआ है। वे उस पुराने माहौल में रहने के लिए तैयार नहीं हैं और यह जो हमारी सामन्ती मनोवृत्ति है, वह चाहती है कि उन्हें उसी हाल में रहना चाहिए जिस हालत में कभी उनके पूर्वज रहते थे। यही वजह है कि आज जगह-जगह धर्म-परिवर्तन की सूचनाएं अखबारों में आती रहती हैं।

महोदय, आरक्षण के सवाल पर यहां कई बार चर्चा हुई है। हमारे मित्र राष्ट्रपाल जी यहां बैठे हुए हैं। २१ मार्च, २००३ को राज्य सभा में एक सवाल हुआ कि आजादी के बाद, जब से यह संविधान बना है और आरक्षण की व्यवस्था हुई है, इसकी सरकार ने समीक्षा की है कि इस आरक्षण से अनुसूचित जाति एवं जनजाति को लाभ हुआ है, उसकी समीक्षा हुई है। सरकार का जवाब था कि उनके पास इस प्रकार का कोई आंकलन, लेखा-जोखा अथवा मूल्यांकन नहीं है। यह सरकार आरक्षण के सवाल पर कितनी गंभीर है। इस संसद से तमाम कानून पास हो जाते हैं। महोदय, दलितों का आरक्षण में प्रोन्नति का सवाल है और यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। वे छोटी तकनीकों की कमी की वजह से सुप्रीम कोर्ट में चले जाते हैं और मामला लटक जाता है। हमने कई बार निवेदन किया कि कानून मंत्रालय, कार्मिक मंत्रालय, गृह मंत्रालय तथा और भी संबंधित मंत्रालय हो सकते हैं, उनकी एक कमेटी बन जाए ताकि जो वभिन्न अदालतों में दलितों से संबंधित मामलें लम्बित हैं, वह उनकी पैरवी करने का काम करे। जब तक सरकार उनकी मजबूती के साथ पैरवी नहीं करेगी तब तक वे मामले जहां के तहां पड़ेंगे और दलितों को इंसाफ नहीं मिल सकता। हमारे बार-बार अनुरोध करने के बावजूद भी आज तक सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। जब तक सरकार पहल नहीं करेगी तो इसका मतलब सीधा यह माना जाएगा कि दलितों को इंसाफ मिले, उन्हें आरक्षण में प्रोन्नति मिले, इस मामले में सरकार गंभीर नहीं है। जहां तक आरक्षण का सवाल है, हम लोग वनिवेश पर चर्चा करते हैं। वनिवेश से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले वर्ग अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोग हैं। निजी हाथों में उद्योग, उपक्रम जाने के बाद वे तय करेंगे कि किसे रोजगार में रखना है, किसे नहीं रखना है। बजाए दलितों को रोजगार देने के, यह विस्तृत तौर से आरक्षण समाप्त करने और लोगों को निकालने की साजिश हो रही है।

महोदय, वित्त मंत्री जी ने अपने बजट भाषण में जिक्र किया कि जो वीआरएस लेंगे, उन्हें पांच लाख रुपए देंगे और उस पर कोई आयकर नहीं होगा। उसका सीधा मतलब वीआरएस के प्रति लोगों को आकर्षित करना था, कि नौकरी छोड़ो और अपना कोई काम करो, आरक्षण के सवाल पर सरकार गंभीर नहीं है। वनिवेश से आरक्षण बुरी तरह प्रभावित होने वाला है। उसमें भी रोना यह है कि जो घाटे के उपक्रम हैं, उपाध्यक्ष महोदय, मुझे माफ करेंगे, वे रुपए की वजह से घाटे में नहीं हैं।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह (महाराजगंज, बिहार) : हरिजनों पर जुल्म हुए, उन पर आप बोलिए।…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : यह वनिवेश भी दलितों पर जुल्म ही है। प्रभुनाथ जी, तुम्हारे ऊपर जुल्म कम है, दलितों पर ज्यादा है। सबसे पहले छंटनी उन्हीं की होगी, तुम तो कुछ न कुछ होशियारी कर लोगे। आप जैसे आदमी जहां रहेंगे वहां अपना काम ठीक कर लेंगे।

महोदय, वनिवेश से भी दलित वर्ग का सबसे ज्यादा अहित होने वाला है। इस बार का जो बजट चार लाख, ३८,७९५ करोड़ का है, उसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति की जो आबादी है, उस द्ृष्टि से जो आबंटन होना चाहिए, वह नहीं हुआ है। देखने में आता है कि भारत सरकार जो दौलत राज्य सरकारों को दलितों और गरीबों के नाम पर भेजती है, उसका सही इस्तेमाल नहीं होता, वह दूसरी मदों पर खर्च हो जाता है, उसका कहीं प्रयोग नहीं होता। तमाम राज्य सरकारें उपयोगिता प्रमाण-पत्र, युटिलाइजेशन सर्टफिकेट भी नहीं भेजतीं। मैं दलितों के नाम पर एक उदाहरण देना चाहूंगा, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फनगर में जो निजी विद्यालय थे, राज्य सरकारों ने उन्हें छात्रवृत्ति दे दी। सरकारी स्कूलों में दलित छात्रों को छात्रवृत्ति नहीं मिली। मुजफ्फरनगर में ८० हजार दलित छात्र छात्रवृत्ति से वंचित रह गये। उत्तर प्रदेश में यह हुआ है। जैसा मैंने पहले आपसे निवेदन किया कि सबसे बड़ा सवाल धन आबंटित करने का ही नहीं है, यह देखने का भी है कि हमने जो दौलत राज्य सरकारों को भेजी है, उसका सही इस्तेमाल भी हो रहा है या नहीं हो रहा है। नवीं पंचवर्षीय योजना में हमने दो दलितों के नाम पर वभिन्न राज्यों को दौलत का आबंटन किया, , उसमें से ९०० करोड़ रुपये तो खर्च ही नहीं हुए। इसका सीधा मतलब यह है कि जो इन योजनाओं को क्रियान्वित करने में लगे हैं, उनकी कोई दिलचस्पी दलितों के कल्याण में नहीं है। मैंने आपके मार्फत निवेदन किया, प्रार्थना की…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : उपाध्यक्ष जी, मैंने उनसे आग्रह किया…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अगर ये यील्ड करते हैं तो आप बोलें। क्या आप यील्ड कर रहे हैं?

श्री रामजीलाल सुमन : ये कोई काम की बात तो करेंगे नहीं।…( व्यवधान)

श्री प्रभुनाथ सिंह : मैं आपके काम की बात करूंगा।…( व्यवधान) इतनी देर में तो हमने बात कह दी होती। हम यह कहना चाहते हैं कि यहां दलितों पर अत्याचार की बात चल रही है, लेकिन इस सदन में एक दलित दूसरे दलित पर अत्याचार कर रहा है। रामजीलाल सुमन जी मायावती जी पर इतना हमला कर रहे हैं तो फिर ये किस अत्याचार की बात कर रहे हैं, हम जानना चाहते हैं?

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं किसी व्यक्ति विशेष पर हमला नहीं कर रहा हूं, मैं नीतियों पर हमला कर रहा रहूं। मैं समाजवादी आन्दोलन से आया हूं, इसलिए मेरा जाति में कोई विश्वास नहीं है और प्रभुनाथ सिंह जी, मुझे माफ करें, मैं इस हीनभावना से ग्रसित कभी नहीं रहा। व्यक्ति में अगर योग्यता और क्षमता है तो वह जहां भी रहेगा, अपना स्थान बना लेगा, दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती। मैं नीतियों की बात कर रहा हूं और यह कहना कि जाति का आदमी जाति के आदमी का कल्याण कर सकता है, इससे बड़ी गलतफहमी दूसरी कोई नहीं हो सकती।…( व्यवधान) मैं खत्म कर रहा हूं। डॉ. अम्बेडकर ने वभिन्न धर्मों का अध्ययन किया और अन्त में गौतम बुद्ध के रास्ते को क्यों चुना। गौतम बुद्ध का जन्म तो किसीदलित परिवार में नहीं हुआ था। गौतम बुद्ध तो क्षत्रिय थे, लेकिन डॉ. अम्बेडकर ने स्वीकार किया कि मानव मुक्ति का रास्ता अगर कहीं है तो बौद्ध धर्म के अलावा कहीं नहीं है। इसलिए प्रभुनाथ सिंह जी, सवाल जाति का नहीं है, सवाल नीति का है। उत्तर प्रदेश में मायावती का एक सूत्री कार्यक्रम सरकार चलाना है, दलितों का कल्याण करना नहीं है, मैं यह निवेदन कर रहा था।

मैं फिर कहना चाहता हूं कि जितने अत्याचार हुए, मैंने आपके सामने आंकड़ों की बात की, मैंने आपके सामने तथ्य गिनाए कि जितने अत्याचार उत्तर प्रदेश मेंदलितों के ऊपर हो रहे हैं, उतने अत्याचार हिन्दुस्तान में किसी भी हिस्से में नहीं हो रहे हैं। जो तथ्य और आंकड़े मैंने आपके सामने प्रस्तुत किये, उनसे इसकी पुष्टि हो जाती है।

आपने समय दिया, आपको धन्यवाद।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान (हाजीपुर) : इस पर लिस्ट में मेरा सैकिण्ड नाम है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप जानते हैं कि १९३ के डिस्कशन में अगर मूवर के साथ-साथ आपका नाम आने से ही मौका मिलेगा।

श्री राम विलास पासवान: हमें कोई आपत्ति नहीं है, यदि आप उनको बुलाना चाहते हैं, लेकिन हमने कहा कि हमारा नाम सैकिण्ड है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठिये। प्रोसीजर के मुताबिक आपको मौका मिलेगा, आप इत्मिनान रखिये।

श्री मुनि लाल (सासाराम): उपाध्यक्ष महोदय, आज दलितों के लिए बड़े सम्मान की बात है कि इस सदन में मैं १९९६ से हूं और दलित समस्यापर आज हम वार्ता करेंगे और सदन इस पर सहमति जताएगा।

दलितों पर अत्याचार और शोषण की बात अभी रामजी लाल सुमन जी ने कही। उन्होंने विस्तार से बताया कि शोषण का क्वाण्टम क्या है। लेकिन मैं कहता हूं कि दलितों के शोषण का इतिहास कम से कम पांच हजार वर्षों का है, लेकिन इसका आंकड़ा कहीं नहीं मिलेगा। आजादी के बाद भी इसका आंकड़ा कहीं सही-सही नहीं मिलेगा। मैं दलितों पर अत्याचार पर एक शेर से अपना वक्तव्य शुरू करना चाहता हूं:

‘जमीं का चप्पा-चप्पा कत्लगाहे आदमियत है,

खुदा महफूज रखे, आये दिन कातिल बदल दे।’

भारत के इतिहास में दलितों पर जुल्म करने वाले कितने कातिल आये और चले गये। कितनी तरह के राज आये और चले गये लेकिन किसी ने भी दलितों पर ध्यान नहीं दिया। भारतवर्ष एक वर्ण व्यवस्था का देश है। वर्ण व्यवस्था जब बनी थी तो उसमें बहुत खूबियां थीं। वर्ण व्यवस्था पूर्णतया व्यवसायी आधार पर बना था, कार्यों के आधार पर बना था। उस समय कार्यों का बंटवारा हुआ और गांव अपने आप में स्वावलम्बी बना। एक ही गांव में चमार जूता बनाता था। कुम्हार बर्तन बनाता था और बढ़ई लकड़ी का काम करता था। इसी आधार पर गांव स्वावलम्बी था। आज हम ग्लोबल विलेज की बात करते हैं। उस वर्ण व्यवस्था में गांव अपने आप में स्वावलम्बी था लेकिन कालांतर में दुर्भाग्य से वह वर्ण व्यवस्था टूट गयी। वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में परिणत हो गयी। जब वह जाति व्यवस्था में परिणत हो गयी तो शोषण का इतिहास शुरू हुआ। वर्ण व्यवस्था में चार वर्ण बनाये गये थे जिसमें शूद्र सबसे नीचे रखा गया था। उसे शूद्र कहा गया। आज उसे कोई दलित कहता है तो कोई उसे हरिजन कहता है। इतिहास में इसके बहुत सारे नाम बदले हैं। मैं कहना चाहता हूं कि शूद्रों के साथ भी क्या व्यवहार हुआ ? मैं शूद्र को शूद्र नहीं कहता। यह तीन वर्गों का सेवक शूद्र समाज है। उसने समाज से कुछ लिया नहीं है बल्कि दिया ही है। वह उन सबकी गंदी बस्ती को साफ करता है, उनके कपड़े साफ करता है, जूता बनाता है। उसने समाज की सेवा ही की है। लेकिन उसके साथ क्या बर्ताव किया गया, यह सोचने की बात है। इस समाज ने दलितों के साथ जितना अन्याय किया है, उसका कोई वर्णन नहीं है। किसी भाषा के शब्दकोष में कोई शब्द नहीं है जो इस अत्याचार का वर्णन कर सके।

मैं बड़े दुख के साथ इस बात को कहना चाहता हूं कि दलितों पर कई तरह के अत्याचार हुए हैं जैसे सामाजिक अत्याचार, राजनीतिक अत्याचार और आर्थिक अत्याचार आदि। अभी सुमन जी ने कुछ पहलू रखे हैं। उन्होंने उसे बहुत सही ढंग से रखा है। वह दलित हैं और वे इस दर्द से भी पीड़ित हैं। …( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : मैं दलित ही नहीं, बल्कि इनका रिश्तेदार भी हूं। …( व्यवधान)

श्री मुनि लाल : बड़े प्रिय रिश्तेदार हैं। जंवाई बाबू हैं। …( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने जानबूझकर इनको चुना है क्योंकि ये मेरे ससुर लगते हैं। इनकी बेटी मेरे छोटे भाई, आई.ए.एस. के साथ ब्याही हुई है। इन्हें जान-बूझकर मेरे खिलाफ खड़ा किया है। …( व्यवधान)

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI (RAIGANJ): Mr. Deputy-Speaker, Sir, he was one of the Food Ministers in the Government. He belongs to the Schedule Caste community. This Government did not even allow him to continue!

श्री मुनि लाल : उपाध्यक्ष महोदय, दलितों की समस्या पर वह क्या बात करेगा जो स्वयं दलित नहीं है। जो दलित के दर्द को नहीं समझते हैं। "जाके पैर न परे बवाई, सो क्या जाने पीर पराई।" दलित समाज अत्याचार से भरा पड़ा है। मैं विस्तार से नहीं जाऊंगा क्योंकि हमारे वरिष्ठ नेता श्री राम पासवान जी उस पर बोलेंगे। लेकिन इस जाति का जो शोषण हुआ है, उसके बारे में मैं कहूंगा। आज महिलाओं पर जो अत्याचार हुआ है वह बहुत गंभीर मामला है। इस सदन में कभी किसी ने नहीं उठाया। मैं वर्ण व्यवस्था की बात कर रहा था। आज वर्ण व्यवस्था से पूरा समाज त्रृसित है। कोई कितना बड़ा आदमी है लेकिन उसके दिल में कहीं न कहीं जाति बैठी है। हर मौके पर वह जाति उभर आती है।

माननीय सोनिया जी सदन में बैठी हैं। जब इन्होंने कांग्रेस की कमान संभाली थी तो मेरे जैसे व्यक्ति बड़ा खुश हुआ था। इसलिए जाति व्यवस्था से ऊपर एक व्यक्ति इस सदन में है। जब दलितों का नरसंहार जहानाबाद, बिहार में हुआ तब श्रीमती सोनिया गांधी जी वहां गयी थीं। उन्होंने उस सरकार के प्रतिकूल वक्तव्य दिया था। उस समय बड़ी आशा थी कि एक ऐसी नेता हैं जो दलितों की बात को लेकर चल रही हैं लेकिन जहानाबाद से दिल्ली आते-आते श्रीमती सोनिया गांधी जी का भाषण बदल गया। वह आशा भी क्षीण हो गयी। वह भाषण कैसे बदला, इसके बारे में मैं कुछ कहा नहीं कह सकता लेकिन दलितों के मन में जो आशा जगी थी, वह भी क्षीण हो गयी।

आज जो विपक्ष यहां पर है, कांग्रेस राज ४१ वर्षों तक अक्षुण्ण रहा है। दलित समाज ने एकमुश्त होकर कांग्रेस का साथ दिया लेकिन कांग्रेस से उसे क्या मिला ? दलित समाज की एक बैठक में श्रीमती सोनिया जी ने एक वक्तव्य दिया था।

आज सामाजिक शोषण होता है, दलितों पर अत्याचार होता है। दलित महिलाएं खेत-खलिहानों, उद्योग धंधों, ईंट-भट्टों में किस तरह काम करती हैं, किस तरह उनकी इज्जत लूटी जाती है, जब वे थानों में जाती हैं तो थानेदार क्या करता है, यह सर्ववदित है। बिहार में दलितों के साथ क्या होता है, कितने दलितों का नरसंहार हुआ, यह सबको मालूम है।…( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह (आरा): आप दलितों का आंकड़ा बताइए।…( व्यवधान)मैं जानता हूं कि आप दलितों के कितने हिमायती हैं।…( व्यवधान)इस सरकार में हैं, पूछिए कि कितने मंत्री बनाए गए हैं।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions)*

उपाध्यक्ष महोदय : आप सीनियर मैम्बर हैं, आपको मालूम है। आप बैठिए।

…( व्यवधान)श्री मुनि लाल : समाज से छुआछूत मिटा नहीं है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप उनको ऐड्रैस कर रहे हैं, इसलिए सारा गोलमाल हो रहा है।

…( व्यवधान)MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Muni Lall, please address the Chair.

श्री मुनि लाल : समाज में छुआछूत एक अभिशाप है। आज देश में हर चौथा व्यक्ति दलित है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : यह क्या तमीज़ है, बैठे-बैठे बात करते रहते हैं।

…( व्यवधान)श्री मुनि लाल : दलित समाज का शोषण बरदाश्त करके भी इस समाज के साथ है और रहेगा। हिन्दुत्व की बात होती है। आज देश में यदि सबसे कट्टर हिन्दू कोई है तो वह दलित समाज है। उसका धमार्ंतरण नहीं हुआ। दलित इस समाज का सब तरह का उत्पीड़न सहकर भी आज तक उद्वेलित नहीं हुआ, वह कभी क्रान्ति नहीं लाया। उसने समाज के सभी अत्याचारों को सहन किया। सुमन जी ने जो आंकड़े दिए हैं, वे अधूरे हैं। दलित समाज के लोगों पर कितना अत्याचार होता है, इसका रिकार्ड कहीं नहीं मिलता। अधिकारी आंकड़े दे देते हैं, इससे समस्याओं का निदान नहीं होता। दलितों पर अत्याचार की कहानी सिर्फ सामाजिक ही नहीं है, राजनैतिक भी है। जब देश को आजादी मिली तो दलित लोगों में एक आशा बंधी कि अब उनका उद्धार हो जाएगा, वे भी समाज की मुख्य धारा से जुड़ेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मैं किसी के पक्ष और विपक्ष में नहीं कह रहा हूं लेकिन दलितों का शोषण जितना राजनैतिक दलों ने किया उतना किसी ने नहीं

* Not Recorded.

किया। मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं। सर्कस का मालिक शेर रखता है ताकि ऑडियंस देखे। वह उसे उतना खाना ही खिलाता है जितने में वह जिन्दा रह सके। राजनैतिक दल भी दलितों को प्रोजैक्ट करके रखते हैं कि हमारे यहां दलित हैं। राजनैतिक दल दलित नेताओं को उतनी ही पावर देते हैं जितनी में वह पिंजड़ा न तोड़ सके। जब शेर पिंजड़ा तोड़ने लायक होता है तो शेर को गोली मार दी जाती है या जंगल में छोड़ दिया जाता है। इसी तरह जब दलितों का नेता मजबूत बनता है तो उसे दल के लोग किस तरह निकाल कर बाहर कर देते हैं, इसका उदाहरण भीमराव अम्बेडकर और जगजीवन राम जैसे लोग हैं। किस तरह राजनैतिक परिद्ृश्य हटाए गए। राजनैतिक शोषण होता है और राजनैतिक दल में दल के लोग दलितों को कोई अहमियत नहीं देते।

इसमें राजनीति में इनका नेतृत्व करने वाला कोई पैदा नहीं हुआ। सबसे परेशानी की बात यही है कि इनको सत्ता में भागीदारी नहीं मिलती जिससे ये दलितों का उद्धार करें। इस सदन में राम विलास पासवान जी और रामजी लाल सुमन जी नेतृत्व कर रहे हैं। हमारे यहां भी नेतृत्व करने वाले हैं लेकिन स्वर्गीय जगजीवन राम जी और डा. भीमराव अम्बेडकर जी के व्यक्तित्व जैसा कोई पैदा नहीं हुआ। क्यों? यह एक राजनीतिक षडयंत्र है, राजनीतिक दलों का षडयंत्र है। इस बात से इस सदन को जागरूक होना चाहिए। हमारे दलित भाइयों में समझदारी होनी चाहिए।…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, इस बहस को ये कितनी गंभारता से ले रहे हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता, यदि यहां सदन में प्रधान मंत्री होते, गृह मंत्री होते। मैं नहीं समझता कि वे विषय की गंभीरता को समझते हैं। इतना गंभीर सवाल है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : संबंधित मनिस्टर हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : प्रधान मंत्री जी और गृह मंत्री जी कहां हैं?बुलवाइए उनको।…( व्यवधान)

श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया :उपाध्यक्ष जी, राज्य मंत्री जी बैठे हैं और हम सब गंभीरता से सुन रहे हैं। ऐसे कैसे सुमन जी बोल सकते हैं ?…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : गृह राज्य मंत्री जी हैं और संबंधित मंत्री भी बैठे हैं।

श्री मुनि लाल : दलितों का आर्थिक शोषण भी किस हद तक हुआ है, उसको भी देखिए। …( व्यवधान)

मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अशोक प्रधान) : उपाध्यक्ष जी, सुमन जी भी तो अकेले बैठे हुए हैं। इनके दल के और सदस्य कहां हैं?…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : प्रधान जी, आप मनिस्टर हैं।

श्री मुनि लाल : जब वर्ण व्यवस्था थी तो उस वक्त दलितों का गांवों में परम्परागत रोजगार धंधा था लेकिन जब वर्ण व्यवस्था टूटी और तकनीकी विकास व वैज्ञानिक विकास देश में हुआ तो वह परम्परागत धंधा खत्म हो गया और गांवों में काम नहीं है। जो दलित ७७ प्रतिशत कृषि पर आधारित हैं, उन दलितों के पास आज काम नहीं है। वे कीचड़ में जाकर भी धान बो देते हैं लेकिन जब हार्वेस्िंटग का काम आता है तो हार्वेस्िंटग मशीन से कटिंग की जाती है और उनको कृषि में काम, मजदूरी और ठेकेदारी नहीं मिलती। वे भुखमरी के कगार पर खड़े हैं। सुमन जी ने सरकारी नौकरी में आरक्षण की बात कही है। उदारीकरण की नीति अपनाई गई। उसमें भी आरक्षण समाप्त हो रहा है और जो प्राइवेट कंपनियां आ गईं हैं, उनमें भी आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। मैं सरकार से और प्रधान मंत्री जी से अनुरोध करूंगा कि प्राइवेट कंसर्न में जो एमओयू साइन होता है, उसमे भी क्लॉज लगना चाहिए कि जिस तरह से सरकारी नौकरी में आरक्षण है, उसी तरह से प्राइवेट में भी आरक्षण मिलना चाहिए वर्ना दलितों की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी। जब आर्थक शोषण होता है, गरीबी पराकाष्ठा पर है। ५६ वर्ष की आजादी के बाद भी ७७ प्रतिशत से ज्यादा दलित समाज के लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। उनके बारे में कोई भी सोचता नहीं है। आज दलित समाज केवल वोट-बैंक बना हुआ है। वह मानव समाज नहीं माना जाता। दलितों के बारे में कोई यह नहीं समझता कि ये मानव हैं और इनको भी संरक्षण की जरूरत है। वे समाज के सेवक हैं लेकिन ऐसा नहीं सोचा जाता और उनका शोषण होता है। इसलिए जब तक दलितों के शोषण को नही रोका जाएगा तब तक दलितों का उद्दाऱ नहीं हो सकता। दलितों का इस बारीकी तौर से शोषण होता है और जिस पर मुझे एक शेर याद आ रहा है : -

न दामन पर कोई छींट, न खंजर पर कोई दाग,

तुम कत्ल करो हो या करामात करो हो।

यह एक करामात है कि किस तरह से दलित समाज का कत्लेआम किया जाता है। इस समाज को जब तक जनतंत्र में भागीदारी नहीं मिलेगी तब तक दलित समाज का शोषण और तकलीफें दूर नहीं होंगी।

उपाध्यक्ष जी, दलितों के शोषण को रोकने के लिए सरकार द्वारा कुछ कानून बनाए गये हैं। सविल राइट्स, प्रोटैक्शन ऑफ एट्रोसिटीज ऑल शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइव्ज। लेकिन मेरे ही क्षेत्र के थानेदार को मालूम नहीं है कि इनकी रक्षा के लिए कौनसा एक्ट है, कानून है तो वह कैसे लागू होगा? आज तक किसी भी सरकार ने दलितों के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया है।

" जुल्म सहते हुए इंसानों के मक्तल में, फ़र्दा तसव्वुर से कोई कहां तक बोले।

रेंगते रहने की सजा है जीना, एक दो दिन की अजीयत हो तो कोई सहले"

आंकड़ों पर हम कितना निर्भर करेंगे। मुरैना में जो नवज्योति के साथ जो अत्याचार हुआ, वह आये दिन होता है लेकिन रिपोर्टिंग नहीं होती है। मैं सदन से अपील करुंगा कि इस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए और प्रत्येक राजनीतिक दल, दलित शोषण को मुद्दा बनाकर इसको नेस्तनाबूद करने का प्रयत्न करे।

लेकिन जब तक जाति-व्यवस्था रहेगी, दलित शोषण को दूर करना मुश्किल लगता है।

पिछले ५६ वर्षों में जितनी भी सरकारें आईं, किसी ने दलित शोषण को दूर करने के बारे में नहीं सोचा। उपाध्यक्ष जी, पिछले १० साल में कुछ सरकारें ऐसी भी आईं जो अपने आप को सामाजिक न्याय वाली सरकारें कहती थीं, लेकिन दलित-हितों पर भारी कुठाराघात हुआ और उच्चतम न्यायालय ने उस पर मुहर लगाई। लेकिन जब दलित संगठनों का दबाव बढ़ा तो दो दिन का सेमिनार पार्लियामेंट एनेक्सी बिल्िंडग में हुआ। उसमें माननीय प्रधान मंत्री जी और माननीय उप-प्रधान मंत्री जी भी उपस्थित थे। हमने माननीय प्रधान मंत्री जी से अनुरोध किया कि संविधान में संशोधन करके इस दलित समस्या का निराकरण होना चाहिए और दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए। उसी बात को रखते हुए इसी सदन में संविधान में तीन-तीन संशोधन हुए और दलितों का आरक्षण बरकरार रहा। लेकिन जब तक आरक्षण संबंधी नियम बनाकर उन्हें संविधान की नौंवी अनुसूची में नहीं डाला जाएगा, तब तक इस समस्या का निराकरण नहीं होगा। इसके लिए में पक्ष और विपक्ष दोनों से अर्ज करुंगा, नहीं तो यह आरक्षण भविष्य में रहने वाला नहीं है।

माननीय प्रधान मंत्री जी ने प्रधान मंत्री बनते ही १० साल के लिए आरक्षण तुरंत बढ़ाया। इसके अतरिक्त दलित समाज की तरफ से कहा गया कि मुझे मंत्री परिषद से क्यों हटाया गया। मैं कहना चाहता हूं कि अब तक के ५६ वर्षों में जितनी भी सरकारें आई हैं सबसे ज्यादा दलित मंत्री इस सरकार में हैं।…( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह :मुनि लाल जी, आप विभाग में नहीं जाएं तो भी हम जानते हैं कि आप कैसे हैं, और आप जिस दल में हैं, उसको भी जानते हैं कि वह दल कैसा है।…( व्यवधान)

15.00 hrs.

आपका हिन्दू समाज इनका पोषक है, आप क्या कर रहे हैं?

उपाध्यक्ष महोदय : राम प्रसाद सिंह जी, आप सीनियर मैम्बर हैं और खड़े होकर बहुत सी बातें कह रहे हैं। यदि आप यहां इंट्ररेस्टेड नहीं हैं तो बाहर जा सकते हैं। आप इस तरह बार-बार घड़ी-घड़ी डिस्टर्ब नहीं कर सकते। श्री मुनी लाल जी, आप चेयर को अड्रेस करके बोलिये।

श्री मुनि लाल : उपाध्यक्ष महोदय, मैं प्रधान मंत्री जी और इस सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि उन्होंने तीन-तीन बार एक दलित महिला को उ.प्र. का मुख्य मंत्री बनाया जो किसी सरकार ने आज तक नहीं किया। यह हमारी सरकार और हमारे प्रधान मंत्री जी और उप प्रधान मंत्री की सोच है। जहां तक कुमारी मायावती का प्रश्न है, उनके बारे में बहुत सी बातें कही जाती हैं लेकिन मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि एक दलित महिला के मुख्य मंत्री बनने के बाद, उस सरकार के काम-काज की प्रक्रिया में कुछ गलतियां हो सकती हैं लेकिन उसकी मंशा गलत नहीं है। वह सताई हुई महिला हैं। यदि आज वह सत्ता मे बैठी हुई हैं तो हम क्यों नहीं उसे सहयोग दें? आज उनका तिरस्कार और उनकी भत्र्सना होती है। यह ठीक नहीं है…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record except what Shri Muni Lall says.

(Interruptions)*

श्री मुनि लाल : उपाध्यक्ष महोदय, कुमारी मायावती दलितों की आवाज है, तूफान है। यदि समाज में दलितों का कल्याण नहीं होगा, समाज को दलितों के शोषण से नहीं बचायेंगे,फिर कितनी ही मायावती पैदा हो जायें, यह समाज जर्जर रहेगा…( व्यवधान)

* Not Recorded.

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष जी, इन लोगों ने कुमारी मायावती को उ.प्र. का मुख्य मंत्री बनाया, बहुत-बहुत धन्यवाद लेकिन इनको याद रखना चाहिये कि उ.प्र. में इनका नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा…( व्यवधान)

श्रम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अशोक प्रधान) : ये इस बात की चिन्ता क्यों कर रहे हैं?

उपाध्यक्ष महोदय : सुमन जी, वे यील्ड नहीं कर रहे हैं।

SHRI MUNI LALL : Sir, I am not yielding. माननीय सुमन जी को इस बात का अहसास हो गया है कि बी.जे.पी. ने अपनी पार्टी की कॉस्ट पर एक दलित महिला को उ.प्र. का मुख्य मंत्री बनाया है, दूसरे दल ऐसा क्यों नहीं करते? बी.जे.पी. ने अपने दल का सैक्रिफाइस किया है और एक दलित महिला को सत्ता में बैठाया है। कुमारी मायावती दलितों की आवाज बन गई हैं। जिस समाज में दलित डोला उठाते थे, आज वहां एक महिला डोली में बैठने लायक बन गई हैं। ये लोग एक महिला को बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। बी.जे.पी. ने एक महिला को बरकरार रखा है। जो लोग कुमारी मायावती के विरोध में बोलते हैं, वे दलितों को सम्मानित नहीं कर रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं दलितों की गरीबी के बारे में दो-चार शब्द कहना चाहता हूं। जो दलित सब से ज्यादा पिछड़े हैं..

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप समाप्त कीजिये। आपकी पार्टी के ८-१० लोग हैं। आपको आधा घंटा हो गया है।

श्री मुनि लाल : उपाध्यक्ष महोदय, मैं खत्म कर रहा हूं। जो दलित कृषि आधारित कार्यों में मजदूरी करते हैं, आजादी के बाद सरकार भूमि सुधार अधनियम लाई लेकिन वह भी कारगर सिद्ध नहीं हुआ। राजनीतिज्ञों और ब्यूरोक्रेसी के स्ट्रांग नैक्सस के कारण दलितों को उनकी हिस्सेदारी नहीं मिली है। इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। इस ओर हर दल के लोगों को ध्यान देना चाहिये।

उपाध्यक्ष जी, अंत में यही कहूंगा कि सब हमारे खैरवाही थे लेकिन हमारे दामन पर खून के धब्बे हैं। हमने सब की खैरख्वाही की है लेकिन मेरी भलाई नहीं की। इसलिये मैं अर्ज़ करूंगा कि सदन इस पर विचार करे। दलितों का एक अहम मुद्दा है। जब इस पर एक बार चर्चा हो जाती है तो कंट्रोवर्शियल विषय नहीं कहूंगा और न सरकार की भत्र्सना करना चाहता हूं लेकिन मैं नीति की बात कह रहा हूं।        

यदि एक भी अक्लियत के आदमी पर अत्याचार होता है तो पूरे देश में कम्पन हो जाता है, सदन थरथराने लगता है। लेकिन हजारों दलित मारे जाते हैं, कोई कम्पन नहीं होता, कोई चर्चा नहीं होती। इसलिए यह जो वर्ण व्यवस्था है, जब तक हम इससे त्राण नहीं पायेंगे, तब तक कुछ नहीं हो सकता।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे बोलने का समय दिया। अंत मैं यही कहूंगा कि दलितों की समस्या बहुत गंभीर है और मायावती जी जैसी हजारों दलित जब पैदा होंगी, तब इस समाज का क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा समाज को लगाना चाहिए। इसी के साथ मैं अपना वक्तव्य समाप्त करता हूं।    

श्री राम विलास पासवान: उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहता हं कि आपने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को डिस्कशन के लिए लिया है और मैं समझता हूं कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिसमें हम लोग थोड़ा पार्टी पोलटिक्स से अलग हटकर कुछ बुनियादी समस्याओं के बारे में बातचीत करें तो ज्यादा लाभदायक होगा, नहीं तो यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोपों में खत्म हो जायेगा। पूरे विश्व में डिसक्रमिनेशंस हैं। पूरे संसार में अलग-अलग प्रकार के डिसक्रमिनेशंस हैं। आप देखें कि पूरे विश्व में चार प्रकार के डिसक्रमिनेशंस हैं। एक डिसक्रमिनेशन रेस के नाम पर है। दूसरा गोरा-काला के नाम पर है। पूरे विश्व में चार तरह के लोग हैं। कोई गोरा है, कोई रंगीन है, जैसे हम लोग हैं, कोई ब्लैक है, कोई मंगोलियन टाइप का है और कोई व्हाइट है। लेकिन जो व्हाइट लोग हैं, वे अपने आपको सुपीरियर मानकर चलते हैं। जैसे इंग्लैंड, अमरीका आदि देशों के लोग हैं। एक डिसक्रमिनेशन रेस के नाम पर होता है। दूसरा जैन्डर के नाम औरत और मर्द के नाम पर होता है और स्वाभाविक रूप से जो मर्द हैं, वे अपने आपको सुपीरियर समझते हैं। पूरे विश्व में इस मामले में एशियन कंट्रीज थोड़ा प्रोग्रैसिव है। इसमें भारत, बंगलादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि हैं। यहां महिलाएं सर्वोच्च पदों पर पहुंची हैं। लेकिन अमरीका जैसे देश में जहां वाशिंगटन से लेकर बुश तक ७० राष्ट्रपति हुए हैं, वहां एक भी महिला अभी तक राष्ट्रपति नहीं बन पाई है। इसका मतलब है पूरे संसार में पुरुष प्रधान मैन्टेलिटी है, वे लोग राज कर रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, तीसरा डिसक्रमिनेशन रिलीजन के नाम पर है। जहां अल्पसंख्यक लोग हैं, वे सशंकित रहते हैं और जो बहुसंख्यक हैं वे अपना वर्चस्व मानकर चलते हैं। हम जिस हिन्दूवाद का नारा भारत में लगाते हैं, हमारे भाई पाठक जी गुजरात से हैं। सबसे ज्यादा गुजरात के लोग विदेश में रहते हैं। लेकिन जो हिन्दू गुजरात में रहते हैं, यदि वहां भी उसी तरीके से गोरे-काले की बात शुरू हो जाए तो उनकी क्या हालत होने लगती है, वह हम अच्छी तरह से समझ सकते हैं। इसलिए जो डेवलप्ड कंट्रीज हैं, उनका एक अलग नियम होता है।

उपाध्यक्ष महोदय, ११ सितम्बर को जब अमरीका में घटना घटी थी तो उस घटना पर अमरीका के राष्ट्रपति कितने डरे थे। वे दो घंटे तक हवाई जहाज में घूमते रहे। चूंकि वे डरे हुए कि व्हाइट हाउस पर भी हमला हो सकता है। जब वह नीचे आये तो टेलीविजन पर दिखाई दिये और वह बहुत गुस्से मे थे। उन्होंने कहा कि या तो अमरीका रहेगा या टैरेरिज्म रहेगा। या तो ओसामा बिन लादेन रहेगा या बुश रहेगा। दूसरे शब्दों में उन्होंने यह भी कह दिया कि हमारी लड़ाई ओसामा बिन लादेन से है। हमारी लड़ाई कोई अल्पसंख्यक हिन्दू या मुसलमान से नहीं है। चूंकि वहां हिन्दू-मुसलमान के नाम पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। हमारे मुस्लिम भाई दाढ़ी कटा लें, सब हिन्दू-मुसलमान एक ही हैं। हिन्दू-मुसलमान-सिख से हमारा कुछ मतलब नहीं है। अभी मैं पढ़ रहा था, एक सिख की हत्या हुई, दो महीने के अंदर उसे फांसी दे दी गई। लेकिन लाश नहीं दिखाई गई। किसी टी.वी. पर लाश नहीं दिखाई गई। चूंकि वे इस बात से डरे हुए थे कि कहीं लाश दिखा दी गई तो कहीं गोरे-काले के बीच रॉइट्स हो सकते हैं।

इसी तरह से जो औरत-मर्द, व्हाइट-ब्लैक या रिलीजन का मामला है, उसमें चौथा मामला भारत में हैं या इसके आसपास के देशो में है। दूसरे देशों में अमीर-गरीब हैं, गोरे-काले हैं, लेकिन जाति का जहर भारत में है।

यहां उसका विकृत रूप है। कोई धर्म इससे अछूता नहीं है। हम कितनी ही गाली दे दें कि यह मुसलमान बाबर की औलाद हैं, इनकी औलाद हैं, उनकी औलाद हैं मगर बाबर जब देश में आया था तो देश में कौन राज कर रहा था? इब्राहिम लोदी राज कर रहा था। इब्राहिम लोदी भी मुसलमान था। इब्राहिम लोदी से पहले खिलजी वंश था। खिलजी वंश से पहले तुगलक वंश था। तुगलक वंश से पहले गुलाम वंश था। गुलाम वंश से पहले मोहम्मद गौरी था। यहां कितने मुसलमान लोग आए थे बाबर के साथ? लगभग १२०० लोग आए थे और आज कितने मुसलमान हैं? आज हिन्दुस्तान, बंगलादेश और पाकिस्तान तीनों को मिला दें तो ४५ करोड़ मुसलमान हैं। ४५ करोड़ मुसलमान १२०० की औलाद नहीं हैं। इसी में से गए हैं। वहां भी हमने देखा है, वहां भी सैयद है, वहां भी अंसारी है, वहां भी सब लोग हैं और इतना ही नहीं, जब जब इस देश में धर्म परिवर्तन की लहर चली है तो सबसे पहले धर्म परिवर्तन में दलित वर्ग के लोग गए हैं और गए हैं तो सम्मान के लिए गए हैं। इस देश में यदि कोई दलित है, पिछड़ा हुआ है, इकोनॉमिकली, सोशली, एजुकेशनली और रिलीजियसली जो सबसे पिछड़े लोग हैं, वही दलित हैं। आज हम इनको दलित कहते हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने इनको अनुसूचित जाति और जनजाति का नाम दिया था। गांधी जी उनको हरिजन कहते थे। हरिजन से पहले उनको अछूत कहा जाता था। अछूत का मतलब होता है जिसको कोई छू न सके। जो कहते हैं कि चार वर्ण हैं, मैं कहता हूं कि चार नहीं पांच वर्ण हैं। यदि सिर्फ ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तक ही रहते तो मामला इतना कठिन नहीं होता, लेकिन शूद्र के बाद भी एक और वर्ण बना जिसको अंत्यज्य कहा गया, जिसे अछूत कहा गया, जिसे कोई छू नहीं सकता है और यह सारी बीमारी की जड़ तब चली जब कह दिया गया कि इनको खाने का अधिकार नहीं है, इनको रहने का अधिकार नहीं है, इनको अच्छा कपड़ा पहनने का अधिकार नहीं है। कुत्ता, बिल्ली और मैना को मारने में जितना पाप लगता है उतना ही शूद्र को मारने में पाप लगता है। यह कोई पार्टी का मामला नहीं है।

राजस्थान में चकबारा में तालाब में पानी पीने के लिए आंदोलन करना पड़ा और फिर दलितों पर अत्याचार हुआ। तमिलनाडु में पेशाब पिलाया गया। चौधरी ओमप्रकाश चौटाला हमारे साथी हैं। देवीलाल जी हम लोगों के नेता हैं और हरियाणा की एक पृष्ठभूमि रही है। …( व्यवधान)

DR. V. SAROJA (RASIPURAM): Hon. Deputy-Speaker, Sir, no such incident has taken place in Tamil Nadu. … (Interruptions)

SHRI RAM VILAS PASWAN : I am referring to the newspapers. If you want, I can give you the names of places where it has happened. … (Interruptions) There was an incident on the 5th September, 2002 in Kondampatti village in Dindigul district जहां पेशाब पिलाया गया। On 22nd May, 2002, in Chinnam village, Trichy district में दो दलितों मुरुगेसन और रामास्वामी को पाखाना खाने के लिए मजबूर किया गया। So, please do not say anything like that. I do not want to go into controversies. … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Ram Vilas Paswan, it would be better if you do not run into controversies. This is a very serious matter.

… (Interruptions)

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : तमिलनाडु में सरकार किसकी है?…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आठवले जी, आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है। आप बैठिये।

(Interruptions) *

श्री राम विलास पासवान: मैं किसी सरकार पर आक्षेप नहीं कर रहा हूँ। एक व्यवस्था है और व्यवस्था यह है कि आज जो काम करता है उसकी इज्ज़त नहीं है। जो कम काम करता है उसको ज्यादा पैसा मिलता है, जो ज्यादा काम करता है उसको कम पैसा मिलता है। जो जूता बनाता है, उसके बेटे के पांव में हवाई चप्पल तक नहीं है। जो कपड़ा बनाता है, उसके बेटे के सिर पर कपड़ा नहीं है। जो महल बनाता है, उसके अपने रहने के लिए झोंपड़ी नहीं है। जो सबकी गन्दगी साफ करता है, वह सफाई मजदूर सबसे गंदी जगह रहता है। जो सबको अनाज खिलाता है, उस किसान का बेटा भूखे पेट सो जाता है। रात में वह आता है और माँ से कहता है कि माँ रोटी दो। बिहार में आदिवासी इलाके में चले जाइए। रात में बेटा कहता है कि माँ रोटी दो, तो माँ कहती है कि बेटा कल सवेरे तुमको रोटी मिलेगी। उसके बाद भी जब बच्चा रोना

* Not Recorded

बंद नहीं करता तो बच्चा कहता है कि माँ पेट जल रहा है, कुछ तो रोटी दे दो। माँ कहती है कि बेटा सो

जाओ, कल सवेरे तुमको रोटी मिलेगी। उसके बाद भी वह रोना बंद नहीं करता तो माँ उसको थप्पड़ मार देती है। बच्चा रोते रोते सो जाता है। सवेरे बच्चा माँ से पूछता है कि माँ, मैंने तो रात में तुमसे रोटी मांगी थी, तुमने थप्पड़ क्यों मारा था? माँ के पास उसका कोई जवाब नहीं होता।

उपाध्यक्ष महोदय, हम व्यवस्था से लड़ना चाहते हैं। पार्टी पालटिक्स इस देश में रहेगी। इस देश को आजाद हुए ५२ साल हो गए हैं। यह ५२ साल से चलता आ रहा है और आरोप-प्रत्यारोप लगते रहेंगे, लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि जब तक सत्ता परिवर्तन के साथ व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई नहीं करेंगे तब तक कुछ होने वाला नहीं है।

श्री ओम प्रकाश चौटाला जी, हमारे नेता हैं। मैं उनका बहुत आदर करता हूं। उन्होंने प्रत्येक मरने वाले दलित को पांच-पांच और दस-दस लाख रुपए दिए। हमारे यहां तो हम दलित के मरने पर एक या दो लाख रुपए तक नहीं दे पाते हैं, वहां हरियाणा में उन्होंने इतनी सहायता की, यह प्रसंसनीय है, लेकिन हरियाणा जैसे राज्य में जहां से स्वामी विवेकानन्द सरस्वती जैसे महान् सन्त ने आर्य समाज की शुरूआत की, आप आर्य समाज की पुस्तकों को पढि़ए, उसमें कितने कठोर शब्दों में लिखा है और कितने सरल शब्दों में कहानियों के माध्यम से स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समझाया है कि कैसे एक जाट का बच्चा भूखा रो रहा था और एक पंडित का बच्चा गाय का दूध पी रहा था और किस प्रकार से उन्होंने दलितों की सहायता करने की कथाएं समझाई हैं और यह भी देखिए कि यदि सबसे कम मंदिर किसी धर्म के हैं, तो वे हरियाणा में हैं और वहां पांच दलितों को जिन्दा जला दिया जाता है, यह अपने आप में शर्मनाक घटना है। माननीय मुख्य मंत्री, ओम प्रकाश चौटाला जी ने उन्हें सहारा दिया, इसकी हम प्रशंसा करते हैं। …( व्यवधान)

डॉ. जसवन्त सिंह यादव (अलवर): आप अपने समाज में देखिए कि अनुसूचित जाति के लोग हरिजनों में शादी नहीं करते और हरिजन, धानकों में और धानक …( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Ram Vilas Paswan, are you yielding?

SHRI RAM VILAS PASWAN : No, Sir.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Whatever the hon. Member is saying will not go on record and only the speech of Shri Ram Vilas Paswan will go on record.

(Interruptions)*

* Not Recorded

श्री राम विलास पासवान: उपाध्यक्ष महोदय, मुझे समझ में नहीं आता कि माननीय सदस्य ऐसा क्यों कह रहे हैं। मैं तो स्वयं कह रहा हूं कि हमें व्यवस्था से लड़ने की जरूरत है। यह चट्टान है। एक के ऊपर एक चट्टान की तरह चढ़ी हुई व्यवस्था है। जहां कहीं भी इस प्रकार की बात होती है, वहां हमें उससे लड़ने की आवश्यकता है।

मैं मायावती जी की बात कहता हूं। उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार करने पर अत्याचारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने का एक्ट बना हुआ है। उसे मायावती जी ने खत्म कर दिया। उनसे पहले जब उत्तर प्रदेश सरकार ने उस एक्ट को समाप्त करना चाहा, तब हम सब इस एक्ट को खत्म नहीं करने के बारे में बोले थे और हम सब एक हो गए थे, लेकिन मायावती जी ने उसे समाप्त कर दिया और अब केवल मर्डर के केसे में ही वह एक्ट प्रभावी होगा। लाल मुनि जी, आपकी सब चीजों को खत्म कर दिया। जो सही चीजें थीं, जिन्हें खत्म किया गया है, उसके खिलाफ बोला जाएगा। मायावती कहती हैं कि मैं दलित महिला हूं, यदि दलित महिलाओं पर एट्रोसिटीज होती हैं, तो मैं देखूंगी। इसका क्या मतलब है। मैं इस कंट्रोवर्सी में नहीं जाना चाहता हूं। मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि हमारी लड़ाई व्यवस्था परिवर्तन के बारे में है।

उपाध्यक्ष महोदय, बाबू जगजीवन राम, हमारी पार्टी के नहीं थे। उन्होंने बाद में कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी थी। ६, कृष्णा मैनन मार्ग पर उनके बंगले को उनका स्मारक बनाने का मामला बना। एक मकान देने से आपकी प्रतिष्ठा गिर रही है। आप इसे मूंछ की लड़ाई बनाए हुए हैं। १९९० में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी, श्रीमती सोनिया गांधी जी, श्री जार्ज फर्नान्डीज आदि सभी नेताओं ने लिखकर दिया कि ६ कृष्णा मैनन मार्ग को बाबू जगजीवन राम जी का स्मारक स्थल बना दिया जाए। जब मैंने अटल जी की चिट्ठी पढ़ी तो मैंने विश्वनाथ प्रताप सिंह जी से उसी समय कहा कि चलो, अब इसे जल्दी खाली करते हैं और मैं १२ जनपथ पर रहने चला गया। १९९६ से वह मामला चल रहा है। हर पार्टी के लोगों ने स्पीकर को लिख कर दिया। आपने कह दिया कि हम नहीं छुएंगे, लेकिन ६ कृष्णा मैनन मार्ग स्थित उस बंगले की बिजली काट दी गई, पानी काट दिया गया। वहां कुछ नहीं है। …( व्यवधान)

१५.१९ hrs. (Shri Devendra Prasad Yadav in the Chair)

सभापति महोदय, इसमें शेम-शेम की बात नहीं है। मैं पूछना चाहता हूं कि इस तरह की मनोवृत्ति क्यों बनती जा रही है।

मैं १९७७ में पहली बार चुनाव जीत कर आया। नया-नया पहली बार सांसद बनकर आया था। उस समय मैं जितने वोटों से चुनाव जीता था, उतने वोटों से हिन्दुस्तान में तो क्या कोई विश्वभर में नहीं जीता होगा। यदि विश्व में सबसे अधिक वोटों से जीतकर आने का रिकॉर्ड किसी ने बनाया है, तो वह राम विलास पासवान है। उस समय हम लोग ट्रेझरी बैंचों पर बैठते थे। बेलछी की घटना हुई। मैंने सबसे ज्यादा सरकार की मुखालिफत की। मैंने हडि्डयों को वहां से बीनकर लाने और यहां सदन पटल पर रखने का काम किया। मैं चाहता, तो मैं भी मंत्री बन जाता, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। उस समय चौधरी साहब हमारे नेता थे, लेकिन उस समय भी हमने दलितों के हित में हडि्डयां लाकर सदन के पटल पर रखने का काम किया।

उस समय बहुत लोगों को गुस्सा आया।…( व्यवधान)

मैं सोनिया जी से कहना चाहता हूं कि आप बड़ी पार्टी की नेता है, एससी, एसटी के ऊपर अत्याचार का जहां-कहीं भी मामला हो, उसमें आप अपनी पार्टी के नेताओं की बात मत सुनिए। सरकार तो सरकार होती है, कहीं भी एनडीए की सरकार नहीं लिखा होता है, सिर्फ भारत सरकार लिखा होता है और वह नियम कायदे के मुताबिक चलेगी। जहां कहीं भी आपका अपना राज हो या आपके द्वारा समर्थित राज्यों में जहां-कहीं भी दलितों के ऊपर जुल्म एवं अत्याचार होता है वहां आप ध्यान दें। हर जगह लोग टैक्नीकल मामला उठाते हैं, उसमें नहीं जाना चाहिए। वहां हमारे साथी झारखंड के बैठे हुए हैं। मैं झारखंड और दूसरे मुद्दों की तरफ नहीं जाना चाहता हूं, लेकिन वहां १२ प्रतिशत एससी एवं एसटी के लोग हैं। एससी कोआपरेटिव का वहां एक संगठन था। हमारे पास वहां से चिट्ठी आई है - "अनुसूचित जाति सहकारिता विकास निगम,"जो पहले से काम कर रहा था, उसे खत्म कर दिया गया। वहां संजय पासवान जी गए थे, उन्होंने वहां जाकर उसे ठीक किया है। अगर हम उस बात को यहां कहने लगें तो आप कहेंगे कि यह पार्टी पोलटिक्स कर रहे हैं। उनसे आप पूछिए कि उन्होंने गलत किया है या सही किया है। एससी, एसटी से संबंधित पार्लियामेंटरी फोरम मुंबई गया था। वहां जो कस्टम एक्साइज़ विभाग है, वहां एससी, एसटी फोरम के सामने लोगों ने आकर शिकायत की कि हमारे साथ इनजस्टिस हो रहा है तो उस पर सीबीआई बैठा दी गई। उसके घर पर छापामारी की गई। वह आफिसर सस्पैंड है। कल केरल का मामला था, मैं सोनिया जी से कहना चाहूंगा कि आप कुछ मत कीजिए, यह १९७५ का मामला है। ये लोग कितना भी डराएं, १९७५ से एससी, एसटी को मिलना चाहिए, जो उनसे छीना गया है। उनसे जो छीना गया है, वह उन्हें दिया नहीं गया, यह मामला १९७५ से चल रहा है, आज से नहीं है। हाईकोर्ट ने दो-दो बार कहा है कि ट्राइबल को उनका अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक नहीं दिया गया है। हम आपसे इतना ही कहना चाहते हैं, कोई ट्राइबल नहीं कहता है कि हमारी जो जमीन छीन ली है उसे हमें लौटा दें, वह इतना ही कह रहे हैं कि उसके बदले में हमें दूसरी जमीन दे दें। वहां जो मंत्री जी ने एग्रीमेंट किया है, उसे लागू करवा दीजिए। बहुत कुछ लागू हो गया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है, किसी को मौका नहीं देना चाहिए, चाहे इस पक्ष का हो या उस पक्ष का हो। इसलिए मैंने कहा कि राजनीति कीजिए लेकिन जो समाज का सबसे कमजोर वर्ग है, उस पर राजनीति करने से क्या फायदा है।

महोदय, मैंने उस दिन प्रधानमंत्री जी से कहा कि कुल ४० हजार करोड़ रुपए की सम्पत्ति में से, सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ३० हजार करोड़ रुपए की बेची जा चुकी है। वनिवेश की हालत सही है या गलत है, वह अलग मुद्दा है, पोलटिकल मुद्दा है, यह होना चाहिए या नहीं, लेकिन अगर ३० हजार करोड़ रुपए की संपत्ति बेची जा चुकी है तो उसमें एससी, एसटी का साढ़े २२ प्रतिशत हिस्सा कहां चला गया। कल तक उसमें नौकरी मिलती थी तो साढ़े २२ प्रतिशत एससी, एसटी को मिलती थी और २७ प्रतिशत मंडल कमीशन के लोगों को मिलता था। अब वे प्राईवेट सैक्टर में चले गए तो वहां रिजर्वेशन नहीं होगा, वहां कौन करेगा। इसलिए यदि आप कोई संस्थान प्राईवेट सैक्टर को देते हैं तो वहां भी रिजर्वेशन को लागू कराने का काम करें। यहां तीन तरह का सिस्टम है। हमारी विधान सभा और लोक सभा में कोई शिकायत नहीं रहती है, कयोंकि वहां देर-सवेर डिसकशन हो जाता है और कानून भी पास हो जाता है, लेकिन अड़ंगा एग्जीक्यूटिव में लगता है, जहां कार्यान्वयन होता है और वहां से भी जब पास हो जाता है तो तीसरा अड़ंगा न्यायपालिका में लगता है, वहा एससी, एसटी का कोई आदमी नहीं है, इसलिए वहां कैसे न्याय मिलेगा। तभी मैंने कहा कि हर स्तर पर लड़ने की आवश्यकता है। यहां जो सारी की सारी चीज हो रही है, हम जो डिसकशन कर रहे हैं, इसमें हम लोगों को कंक्रीट सुझाव भी देने चाहिए। हम जब कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी, होम मनिस्टर को बुलाइए। उरांव जी का हम अपमान नहीं करते हैं, विनोद खन्ना जी और स्वामी जी के प्रति हमारा कोई अनादर नहीं है। पार्लियामेंट्री सिस्टम में यह है कि लोग एमपी, नेता को चुनते हैं, नेता प्रधानमंत्री हो जाता है और वह केबिनेट बनाता है। प्रधान मंत्री ईमानदार है तो केबिनेट ईमानदार है और प्रधान मंत्री बेईमान है तो केबिनेट बेईमान है और केबिनेट, जो सरकार होती है वह यदि ईमानदार है तो एडमनिस्ट्रेशन ठीक रहता है। अंततोगत्वा प्रधान मंत्री जी के हाथ से सारी चीजें हो जाती हैं।

इसलिए जब भी कोई सीरियस डिस्कशन हो तो प्रधानमंत्री को रहना चाहिए, जब भी कोई सीरियस डिस्कशन हो और प्रधानमंत्री नहीं रहें तो डिप्टी प्राइम मनिस्टर किसलिए बनाये जाते है, डिप्टी प्राइम मनिस्टर पोस्ट के लिए तो नहीं बनाया जाता है। उनके बैठने से गम्भीरता रहती है, इसलिए हम आपसे कहना चाहेंगे, हमें मालूम नहीं है, हमारे लोग बताएंगे तो बताएंगे, लेकिन दुलीना की घटना पर पूरे हरियाणा के ऊपर कालिख पोतने का काम किया है। हरियाणा बहुत अच्छा स्टेट है, इसलिए मैं आपसे कहना चाहूंगा कि कोई भी आदमी सरकार की तरफ से जवाब दे, पता नहीं, स्वामी जी देंगे या कौन देंगे, हमें मालूम नहीं है, लेकिन आप बताइये। अखबारों में बार-बार आता रहा कि विश्व हिन्दू परिषद के एक नेता स्वामी परमहंस को पुलिस ने यह मामला दिया, हमारे भाई ने ठीक कहा कि यह जांच का मामला नहीं है, हम लोगों ने जेल जाने का काम भी किया है। उस गांव बादशाहपुर के एक त्यागी ने इस घटना की निन्दा कर रहा है, वह जेल गया है, उस गांव में भारद्वाज गांव का प्रधान है, सिर्फ बीर सिंह शैडयूल्ड कास्ट का है, पूरा का पूरा गांव एक तरफ है। फिर पुलिस के द्वारा पैसा मांगा गया और जब पैसा नहीं दिया गया तो वहां का जो कैलाश ठेकेदार था, उसके पास पांच हजार रुपया था, दूसरे के पास दस हजार रुपया था, तीसरे के पास ३९५० रुपया था, उनको धाने में ले जायागया और मारते-मारते दो लोगों को तो वहीं मार दिया गया और जब देखा कि मामला हाथ से बाहर जा रहा है तो स्वामी परमहंस को टेलीफोन कर दिया कि आप इसे कोई रंग दो। उसने जाकर रंग दे दिया के ये जिंदा गाय की दिन-दहाड़े खाल खींच रहे थे, इसलिए इनको जलाया गया है। मैं सरकार के खिलाफ नहीं बोल रहा हूं।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : I am not allow you to speak. Why are you standing up?

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : ये गलतबयानी कर रहे हैं, यह मनगढ़न्त कहानी है।

सभापति महोदय : आप अपना स्थान ग्रहण करिये, आप आसन की बिना अनुमति के खड़े हो जाते हैं, जबकि आप पुराने सदस्य हैं।

श्री राम विलास पासवान: मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि चीफ मनिस्टर ने कहा कि गलतफहमी में लोग मारे गये। गलतफहमी का मतलब क्या होता है, कोई मुसलमान था तो ठीक था?मतलब दलित था तो गलत हो गया और मुसलमान होता तो ठीक होता। उस विवाद में जाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन इतनी बात तय है कि कोई भी आदमी दशहरे कि दिन शाम के चार बजे थाने की बगल में जाकर जिंदा गाय को इस तरह से नहीं मार सकता है। आप गाय को कहते हैं कि हमारी माता है, गाय अगर आपकी माता है तो गाय का दूध सब पिएंगे और जब गाय मर जायेगी तो दलित के कन्धे पर जाकर फेंकने का काम करेंगे और नारा लगाएंगे कि गाय हमारी माता है।

MR. CHAIRMAN: Please address the Chair, Shri Ram Vilas Paswan.

श्री रामदास आठवले : गाय हमारी माता नहीं है।

श्री राम विलास पासवान: I stand corrected. आठवले जी, आप ठीक कह रहे हैं, मैं आपसे सहमत हूं। गाय किसी की मां नहीं है, गाय का दर्जा पशुओं में अच्छा हो सकता है। लेकिन यदि आप मानते भी हैं कि गाय हमारी मां है तो फिर उस मां को हमारे कन्धे पर मत फेंकने का काम किया करो।

सफाई मजदूर के सम्बन्ध में कहा गया। मैं दो लाइन कहकर अपनी बात खत्म करूंगा। सफाई मजदूर कमीशन यहां बना हुआ है। उसकी रिपोर्ट पर बहस होनी चाहिए। शैडयूल्ड कास्ट्स शैडयूल्ड ट्राइब्स कमीशन बना हुआ है, माइनोरिटीज कमीशन बना हुआ है, महिला आयोग बना हुआ है, इन कमीशनों की

रिपोर्ट के ऊपर अलग से बहस होनी चाहिए। आज किसी चीज पर कुछ नहीं हो रहा है, कम से कम साल में एक बार तो बहस हो जाये। जो सफाई कर्मचारी हैं, वे सीवर के नीचे जो गंदा नाला बहता है, उसमें जाकर काम करते हैं। कोई नोर्मल आदमी क्या पाखाना उठा सकता है? हमने कानून बना दिया कि सिर पर पाखाना उठाने का सिस्टम खत्म हो गया है, लेकिन आज वह खत्म नहीं हो पाया है। पिछले दिनों मैं पटना में था तो २० हजार लोग वहां सिर पर पाखाना उठाने काम काम कर रहे हैं। यह सिस्टम हर राज्य में चल रहा है। यदि कोई पाखाना उठाएगा तो नोर्मल आदमी पाखाना नहीं उठाएगा। अगर कोई पाखाना उठाएगा तो वह इतनी तेज शराब पिएगा कि कम से कम उसकी दुर्गन्ध नहीं आये। उसका असर उसके परिवार पर पड़ता है। संसार के हर कोने में रात में झाड़ू-बुहारू किया जाता है और वह सवेरे अपने बाल-बच्चों को देखता है, लेकिन हमारे यहां जो मोर्निंग का प्राइम टाइम होता है, उसमें पति-पत्नी झाड़ू लगाने का काम करते हैं और उनका बच्चा सड़क के किनारे बगल में बैठा हुआ देखता रहता है तो क्या वह परिवार कभी आगे आ सकता है? कहते हैं कि यह पार्ट टाइमर है, दो-तीन घण्टे काम करता है, उसके बाद पूरे दिन भर बैठा रहता है। तुम उससे काम लो, कौन बैठने को तैयार है। हम लोग कितने घंटे काम करते हैं, लेकिन वे परमानेंट कभी नहीं हो पाता है। हम लोगों के न चाहते हुए भी शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स, सफाई कर्मचारी की जगह पर दूसरे लोग बहाल होते हैं।

हम नहीं रह सकते। हम भी रेल मंत्री थे। चूंकि काम के नाम पर आप किसी जाति को बहाल नहीं कर सकते हैं। हकीकत यह है कि जो सफाई कर्मचारी नहीं है चाहे वह दलित वर्ग का हो या ऊंची जाति का हो, वह काम के नाम पर बहाल तो हो जाता है लेकिन वह सफाई का काम नहीं करता, पाखाना उठाने का काम नहीं करता। ये सारी समस्याएं हैं, इन पर हमें गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए।

मैं एक-दो बातें कहना चाहूंगा कि रिजर्वेशन जो संवैधानिक अधिकार है, आज प्राइवेटाइजेशन के कारण खत्म हो रहा है। उसे प्राइवेट सैक्टर में जोड़ना चाहिए। इसके बारे में हर पार्टी के लोगों ने पार्लियामैंट्री फोरम के माध्यम से प्रधान मंत्री जी से मांग की है। दूसरा, यह कानून भी बनना चाहिए कि चाहे कोई भी अधिकारी हो, यदि वह योग्य उम्मीदवार के रहने के बावजूद भी बहाली नहीं करता तो उसे दंडित किया जा सके। मैं कहना चाहता हूं कि हमें इन सब चीजों से ऊपर उठकर, सत्ता से ऊपर उठकर यह सोचना चाहिए कि व्यवस्था में परिवर्तन कैसे हो ? जब तक व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होगा तब तक इस देश में चाहे दलित वर्ग के लोग हों चाहे समाज के किसी भी वर्ग के लोग हों, उनका कल्याण नहीं हो सकता। उस द्ृष्टिकोण से हमको इस बहस को आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। आपने मुझे बोलने का समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह (वैशाली): आप इस सरकार से क्या अपेक्षा कर सकते हैं ? …( व्यवधान)

श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) :सबसे ज्यादा तो आपके बिहार में है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप आगे बैठकर टोका-टाकी मत कीजिए।

...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except what Shri Muniyappa says.

(Interruptions) *

*NotRecorded.

SHRI K.H. MUNIYAPPA (KOLAR): Thank you, Mr. Chairman, for giving me this opportunity.

I would like to remind the august House, and particularly the BJP-led NDA Government, the pathetic conditions of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the country under the rule of the NDA Government.

Under the leadership of Mahatma Gandhi, India fought for freedom. At that time, irrespective of the caste and creed, Hindus, Muslims, Christians and all others fought for freedom. Many people sacrificed their lives.

I would like to bring to the attention of the House the sacrifice made by a small village, my native place, called Kambalahalli in Sirilugatta Taluka of Kolar District. There were fifty houses in that village and 40 people took part in the freedom struggle. In 1939, my father joined them in the freedom struggle. They were jailed for six months in the Central Jail of Bangalore. The NDA Government and the BJP do not know the sacrifices made by the Scheduled Castes and Scheduled Tribes for the freedom of the country. Many people sacrificed their lives.

The programmes launched by Shrimati Indira Gandhi have been stopped by this Government on the pretext of renaming them. I would like to inform the House that Shrimati Indira Gandhi opened the eyes of the weaker sections of the society by launching the 20-point programme. The weaker sections were freed from their debt. Banks in rural areas were opened to take care of the welfare of the farming community, agricultural labour, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. Today, the NDA Government is closing the banks in rural areas and shifting them to urban areas. This is the contribution made by the NDA Government to the farming community, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes people.

Pandit Jawaharlal Nehru once said that this country would not be able to become strong enough to compete at the international level until the last person in the society does not come up to the level of the forward community socially, economically and educationally.

These are the words expressed by the freedom fighters and the senior leaders who fought their lives in the freedom struggle.

Indiraji, at one session, also said that until and unless the last person gets a 2-square meals and a shelter, there is no meaning of freedom. From the time of Pandit Jawaharlal Nehru till the time of Rajiv Gandhi, the ideology of Mahatma Gandhji has been taken into consideration. They have followed and implemented the ideology of Mahatma Gandhi and developed this country like anything. Under their regime, the Scheduled Caste and Scheduled Tribe people have developed like anything.

Mr. Chairman, Sir, I would also like to quote that during the regime of Shrimati Indira Gandhi, opportunities were given and the ways were opened for the Chief Ministers like Shri D. Sanjivayya in Andhra Pradesh, Shri Jagannath Paharia in Rajasthan; and Indian National Congress President Shri Jagjiwan Ram. This is the ideology of the Indian National Congress.

Recently, our Indian National Congress Party President Soniaji has given a way in Maharashtra for the Chief Minister Shri Sushil Kumar Shinde. That is what the Congress is doing.

But what is the NDA headed by the BJP is doing? Now, I would quote a simple example. The Government issued a DoPT circular in 1997, after the Congress Government, in regard to SC&ST. All the Members of Parliament irrespective of party lines had supported it unanimously. But when there was a direction given by the Supreme Court in this regard, the SC&ST Forum represented before the hon. Prime Minister. We asked that the DoPT circular be withdrawn. We asked that a direction should go to all the State Governments. The Amendment was passed in this House unanimously. Our thanks to all the political parties. It was not only the BJP which did it but it was done unanimously by all the parties. The 82nd Amendment was passed by this House unanimously.

But what is happening today regarding its implementation? It is only on the record. There is no implementation. There is no direction to the States; there is no direction to the Chief Ministers or the Chief Secretaries of the States to implement it. Sir, till today, it is only on paper. It is only the lip sympathy that has been shown by the NDA Government to the SC&ST people. Sir, the Amendment was supported and passed unanimously by the CPI(M), CPI, SP and others. But it has not been implemented so far.

If it is not implemented then what is the use of this DoPT circular? The SCST Forum has requested to put this matter in the 9th Schedule. But they have not agreed to it. Again, after the Constitution Amendment, the people went to the Supreme Court on the same issue. So, what is the supremacy of the Parliament? I seek a clarification.

Sir, a very important debate is going on. But it is very unfortunate that even the hon. Minister of Social Justice and Empowerment, and the hon. Home Minister are not present in the House. Only the hon. Minister of Tribal Affairs is sitting here. This is the seriousness of this Government!

Sir, 30 per cent of our population belong to the SCST comprising 22 per cent from SC category and eight per cent from ST category. So, 30 crore people of this country are suffering from atrocities. But nobody is there to look after their interests. This shows as to how much this NDA Government headed by the BJP is interested and concerned about the SCST people!… (Interruptions)

Ashok Pradhanhji, please sincerely take this up. Kindly tell your Prime Minister and the Cabinet. You are also a Minister of this Government. Is this the way to help these people?

Sir, I would like to inform this august House that when Shri Rajiv Gandhi was there, the backlog of vacancies meant for SC&ST people was filled up quickly. He had given the instructions to all the States that ‘within a year we have to complete the backlog of SC&ST people in the service.’ So, thousands and thousands of these people had been included in the service and their posts were filled up.

After that, it was stopped. Now, lakhs of vacancies are there for SCs and STs. Are there any steps taken by this Government to fill the vacancies? Let them come out as to how many people have been inducted and how many people have been recruited to clear the backlog and to fill up the posts. They have no voice to say all these things.

After Shri Rajiv Gandhi, no one has filled up the posts till today. This shows that the Government is not in favour of SCs and STs. I am not talking about atrocities. मन में आना पड़ेगा।This is a matter on which intention has to come from within. One may be the Member of Parliament, but we all have to have conscience. It cannot be made with the help of rules. You are not in a position to formulate any rules or Acts to protect the SCs and STs. Action against untouchability was taken by the Government of the Indian National Congress. Action against atrocities was taken by the Government of the Indian National Congress. You have not come forward to protect 30 per cent of the people today. What are the steps taken by you to protect people from these atrocities? You can cite me one single example.

I have mentioned about the DOPT circulars. No instructions were issued till today. Shri Pradhan is present here; Shri Jual Oram is here; they have no interest. They are not strong enough to talk to the authorities; they are controlled by Financial Advisors in the respective Departments. Dr. Jatiya is also here; they are Ministers, but they have nothing to do with these things. They are controlled by the Financial Advisors or the bureaucracy not to implement things. What can they do? They cannot come up openly because they are in the Government. I know their problem. I am working in the Consultative Committee attached to the Ministry of Welfare. When Shri Sitaram Kesari was a Minister in the Ministry of Social Justice and Empowerment, we fought for it and we identified 48 districts where girls had a low literacy of 3-5 per cent. On that day, we had decided to start residential schools in each district to develop educationally, the Scheduled Caste and Scheduled Tribe girls. Out of 48 districts, in how many districts they had started it? We have no information on that. I have requested them to give information in the Consultative Committee, but there is no proper response. This is the way, the NDA Government is functioning.

I do not want to mention anything about atrocities ondalits. When there is no programme for development of Scheduled Castes and Scheduled Tribes, where is the question of protection for them? Shri Jual Oram is here; he is very keen; he is dynamic; and he wants to do something for the poor people. But there is no opportunity. They are controlled by the people from behind the scenes. He is not able to sanction even a small project for the last six months. When this is not done, what is the use of speaking on atrocities? I appeal to the House; we have to follow Gandhian principles. If the nation is to be strong and strong at the international level, the common citizen or the last person of the Scheduled Caste and Scheduled Tribe should be economically developed. This is the duty of the Government – State or the Centre. We have to follow the ideologies of Gandhi. Until and unless we do it, we cannot come forward. There is no proper education. They are not able to come up. They are not able to organise themselves. The Governments have to give proper education and then only, they can survive educationally. We are talking on the issue of go maatha. I agree; I am a pure vegetarian; I am a Gandhian; I am a secular man. But you are taking advantage of this. So many States have banned this. India is a secular country.

Please do not forget that India is a secular country. We have to move together. Hindus, Muslims and Christians, all fought together for the freedom of this country. Not only Hindus but also all Muslims and Christians had sacrificed their lives for the freedom of this country. All have to live together in this country.

Baba Sahib Ambedkar has given us the Constitution. It is not for the welfare of the Scheduled Caste people alone but for the people of the weaker sections as well. They have to come up in life. As per the provisions of the Directive Principles of the Constitution, we have to protect the interests of the weaker sections. I think, you have forgotten the Buddhism which has been there for the last thousand years. Manu Dharmashastra is the creator of Hinduism. Before that, there was no creed and people were happy during those days. I am a Hindu. I think you have forgotten the Manu Shastra and the Hinduism. Manavta,humanity is supreme. You must come out of it. Otherwise, recent elections in some of the States have shown you the results. Where is yourHindutva card? Manavta card has played its trick. People of this country, in Himachal Pradesh, Meghalaya and Tripura, have proved… (Interruptions)

सभापति महोदय : आप लोग सदन में व्यवस्था बनाए रखें, बैठे-बैठे न बोलें।

SHRI K.H. MUNIYAPPA : I am not against Hinduism. But, please do not play this Hindutva card. It is not correct on your part. Do not forget that the Indian National Congress has got 14 to 15 States. This Government seems to have forgotten the Gandhian ideology. We, the Indians cannot just be the Hindus, Muslims or the Christians. We are Indians first. We have to live together and unitedly fight together for the security of this nation.

I do not want to mention just one incident. There are a number of incidents of atrocities committed on Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The Government should make up its mind. The Gandhian principles will survive. People are coming up and you cannot stop them. You cannot ignore 30 per cent of the population of this country. You should make proper laws to protect them. You can educate them that we are all one human being. Various Atrocities Acts are being misused. One just cannot physically handle them and put them behind the bar. You can make use of the atrocities Acts. These Scheduled Castes are made the scapegoats. The majority community people are using the weapon of atrocity on the Scheduled Caste people. I do not appreciate it. We have to move together. We should follow the Gandhian ideology.

Finally, I would like to inform the august House that a day will come when the Indian National Congress, headed by Shrimati Sonia Gandhi, will come to the rescue of this country.

Under the leadership of Shrimati Sonia Gandhi, the Indian National Congress would come to power. The Congress Party would save all the people of the country whether it is Hindus or Muslims or Christians.    

SHRI SHIVRAJ V. PATIL (LATUR): Sir, I just wanted to bring it to the notice of this august House that the Treasury Benches are empty. We are discussing the atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes and only one Minister is sitting here… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN : Why are you standing? Please sit down.

… (Interruptions)

SHRI SHIVRAJ V. PATIL : This is a telling commentary on the seriousness of the Government on this issue. The people belonging to Scheduled Castes and Scheduled Tribes are suffering and this is the kind of interest shown by the Members of the Ruling Party. We object to it, and we complain about it. I think, what is happening in this country is happening because of this attitude of the Government.… (Interruptions)

श्री राम विलास पासवान: सभापति जी, मेरा पाइंट ऑफ ऑर्डर है।

सभापति महोदय : आपका क्या पांइट ऑफ ऑर्डर है?

श्री राम विलास पासवान: सभापति जी, यह मामला एस.सी. की एट्रोसिटीज़ से संबंधित है। इसके लिये हाउस में दो मंत्री - होम मनिस्टर होना चाहिये, नहीं तो फिर एस.सी.एस.टी. का अलग डिपार्टमेंट है, जिसके मंत्री डा. सत्य नारायण जटिया हैं, उन में से कोई रहना चाहिये था। श्री उराम ट्राइबल वैलफेयर के मनिस्टर हैं। होम के कैबिनेट मनिस्टर को यहां होना चाहिये था। हम टैक्नक्लिटी में जा सकते हैं कि श्री उराम कैबिनेट रैंक के मनिस्टर हैं लेकिन विषय की गंभीरता को देखते हुये यही कहूंगा कि यदि हम कोई काम इंपलीमेंट करें, ये कुछ नहीं कर सकते। हमने पहले भी देखा है, इसलिये आग्रह करूंगा कि होम मनिस्टर को यहां मौजूद रहना चाहिये था।

जनजातीय कार्य मंत्री (श्री जुएल उराम) : सभापति महोदय, सरकार की ओर से गृह राज्य मंत्री नोट्स ले रहे हैं।

सभापति महोदय : मंत्री जी, आप बैठिये। श्री पासवान जी ने जो पांइट ऑफ ऑर्डर उठाया है, वह पांइट ऑफ ऑर्डर नहीं बल्कि पाइंट ऑफ इनफौर्मेशन हो सकता है। फिर भी यहां चार-चार मनिस्टर्स मौजूद हैं- मनिस्टर ऑफ स्टेट फार पार्लियामेंटरी अफेयर्स, स्टेट मनिस्टर फॉर होम, ट्राइबल अफेयर्स के मनिस्टर आदि।

SHRI SHIVRAJ V. PATIL : Sir, it is not the question of a Minister… (Interruptions) It is a question of the representation of the people belonging to a particular party… (Interruptions)

सभापति महोदय : प्लीज, आप लोग बैठिये।

श्री राम विलास पासवान: सभापति महोदय, मैं आपसे जानना चाहता हूं कि यदि क्वैश्चन रेलवे मनिस्टर का हो, क्या कोई दूसरा मनिस्टर जवाब दे सकता है?

सभापति महोदय : पासवान जी, आप बैठिये। टैक्निकली यह बात ठीक है कि मनिस्टर्स बैठे हुये हैं…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान: सभापति महोदय, पूरा अपोजीशन सदन में बैठा हुआ है, लेकिन संबंधित मंत्री यहां नहीं है।…( व्यवधान)

श्री शिवराज वि.पाटील: जब हम बोलते हैं तो वे सुनते नहीं है और जब दूसरे बोलते हैं तो वे यहां सुनने के लिए नहीं बैठते हैं।

सभापति महोदय : विषय बहुत गंभीर और महत्वपूर्ण है। उस पर पार्लियामैन्ट्री अफेयर्स मनिस्टर शायद आप कुछ बोलना चाहते हैं तो बोलें, अन्यथा मैं श्री मोहन रावले को बुला रहा हूं।

…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : I am on my legs. Please take your seats.

… (Interruptions)

श्री रामदास आठवले :सामाजिक न्याय मंत्री यहां नहीं है, उन्हें बुलाइये।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing, accept what Shri Mohon Rawle is saying, would go on record.

(Interruptions)*

सभापति महोदय : आपका कुछ भी रिकार्ड पर नहीं जायेगा।

...( व्यवधान)

सभापति महोदय : लक्ष्मण सिंह जी, आप अपना आसन ग्रहण करिये। कुछ भी रिकार्ड पर नहीं जा रहा है, प्लीज आप बैठिये।

* Not Recorded.

...( व्यवधान)

सभापति महोदय : मनिस्टर खड़े हैं, आप उन्हें सुन लीजिए, आप उन्हें बोलने दीजिए।

श्रीमती रेणुका चौधरी (खम्मम) : हमने पुकारा है, तो खड़े हैं।…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान: यह ट्राइबल्स पर बहस नहीं हो रही है, दलितों पर बहस हो रही है। यहां संबंधित मंत्री नहीं हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : माननीय मंत्री डा.संजय पासवान कुछ बोल रहे हैं। आप बैठिये।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में राज्य मंत्री (डॉ. संजय पासवान) : सभापति महोदय, इस सरकार ने नौ मंत्री दलित समाज से बनाये हैं और मैं स्वयं यहां मौजूद हूं, उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है। एक रामविलास पासवान दूसरे पासवान को नहीं देख पा रहे हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : रावले जी, आप बोलिये।

...( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing, accept what Shri Mohon Rawle is saying, would go on record.

(Interruptions)*

श्री राम विलास पासवान: आप होम मनिस्टर को बुलाइये, नहीं तो इस बहस का कोई फायदा नहीं है, हम लोग जाते हैं।

१५.५९ hrs.

( Shri Ramvilas Paswan then left the House.)

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : आप सामाजिक न्याय मंत्री को बुलाइये।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Ramdas, please take your seat.    

* Not Recorded.    

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण मध्य) :सभापति महोदय, अभी कांग्रेस के माननीय सदस्य श्री मुनियप्पा जी बोल रहे थे, वह कह रहे थे कि हमें नाज है कि श्री सुशील कुमार शिंद महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री बने। मैं सदन को बताना चाहता हूं कि आज कांग्रेस बाबासाहेब डा. अम्बेडकर का नाम ले रही है, दलितों के बारे में कह रही है। लेकिन मैं दक्षिण मध्य मुम्बई से चार बार चुनकर आया हूं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : श्री रावले जी को छोड़कर कोई बात रिकार्ड में नहीं जायेगी।

16.00 hrs.

श्री मोहन रावले : महोदय, जिस क्षेत्र से मैं चुनकर आता हूँ, मैं चार बार वहां से चुनाव जीतकर आया हूँ। उसी क्षेत्र से बाबासाहेब अंबेडकर ने चुनाव लड़ा था और कांग्रेस वालों ने उनके विरोध में एक उम्मीदवार खड़ा किया था। …( व्यवधान)कांग्रेस के लोगों को उनका नाम लेने का कोई हक नहीं है। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : You should not try to provoke other Members.

श्री मोहन रावले : ये लोग जो कह रहे हैं, मैं उनके सामने अपनी बात रखना चाहता हूँ। हमें भी अभिमान है। महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री दलित हैं, उन पर हमें अभिमान है। यहां बालयोगी जी को जब आसन पर बैठाया तो कांग्रेस ने ही विरोध किया था। उस समय कहां गया था इनका दलित प्रेम? बालयोगी जी क्या दलित नहीं थे? दलितों पर अत्याचार पर चर्चा हो रही है लेकिन मैं यह नहीं चाहता हूँ कि …( व्यवधान)मैं उस क्षेत्र से चुनकर आता हूँ जहां से बाबासाहब अंबेडकर ने चुनाव लड़ा था। उनके खिलाफ कांग्रेस का कैन्डीडेट था। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Rawale, please address the Chair. Why do you address other Members?

श्री मोहन रावले : आदरणीय शिवराज पाटिल जी यहां बैठे हैं। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record except Shri Mohan Rawale’s speech.

(Interruptions) *

* Not Recorded.

श्री मोहन रावले : जब बाबा साहब अंबेडकर ने इलेक्शन लड़ा था तो कांग्रेस ने उनको हराया था। इनको कोई हक नहीं है कि बाबासाहब अंबेडकर का नाम लें। …( व्यवधान)शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी ने जितने दलितों को चुनकर लाया है, उतना विपक्ष के लोगों ने नहीं लाया है। हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा दलित लोगों को शिवसेना ने चुनकर दिया है। आप इतिहास देखिये। ये चाहें तो मैं इनको किताब दिखा सकता हूँ। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप चेयर को ऐड्रैस कीजिए।

श्री मोहन रावले : महोदय, मुझे पांच बजे की फ्लाइट से जाना भी है। …( व्यवधान)

आप इतनी घटिया राजनीति न करें। वोटों के लिए आपके द्वारा यह राजनीति शुरू की गई है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप चेयर को ऐड्रैस कीजिए।

श्री मोहन रावले : ये चाहें तो मैं किताब लाकर इनको दिखा सकता हूँ। उसके बाद या तो ये माफी मांगें नहीं तो मैं माफी मांग लूंगा। अगर मैं गलत हुआ तो मैं लखित में माफी मांगूंगा। यह कड़वा सत्य है जो इनको अच्छा नहीं लग रहा है। शिवराज पाटिल जी यहां बैठे हैं। हम उनका सम्मान करते हैं, मैडम का सम्मान करते हैं, लेकिन इनको पता है कि बाबासाहब अंबेडकर के खिलाफ इन्होंने कांग्रेस का उम्मीदवार खड़ा किया था और वे इलैक्शन हार गए थे। …( व्यवधान)क्या वाक आउट कर रहे हैं? इनका दलित प्रेम देख लीजिए कि ये सदन से बाहर जा रहे हैं। दलितों की बात हो रही है और ये बाहर जा रहे हैं। …( व्यवधान)

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा श्रम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री विजय गोयल) : अध्यक्ष महोदय, शिवराज पाटिल जी ने जो प्रश्न उठाया था, मैं बताना चाहता हूँ कि क्योंकि विषय था - दलितों पर अत्याचार, गृह राज्य मंत्री यहां बैठे हैं, संजय पासवान जो सोशल वैलफेयर विभाग में राज्य मंत्री हैं, वह भी यहां बैठे हैं, ट्राइबल के मंत्री भी बैठे हुए हैं और अभी भी सदन में सत्ता पक्ष के सदस्यों की संख्या विपक्ष के सदस्यों से कहीं ज्यादा है। आज आठ मंत्री सरकार के एस.सी. और एस.टी. से संबंधित हैं और ४६ से ज्यादा सदस्य हमारे हैं जो विपक्ष से कहीं ज्यादा हैं। इसलिए यह कहना कि सरकार को चिन्ता नहीं है, गलत है। कांग्रेस के नेताओं में विषय के प्रति किस प्रकार की गंभीरता है इससे उसका भी पता चलता है। …( व्यवधान)

श्री मोहन रावले : हमारे देश में सबको बराबर न्याय देना सरकार का कर्तव्य है। अगर किसी भी दलित समाज के भाई या बहन पर अत्याचार होता है तो दोषी को कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए।    

…( व्यवधान)

सभापति जी, महाराष्ट्र के बारे में हमारा अनुभव है कि वहां राजनीतिक फायदा उठाने के लिए एट्रोसिटीज एक्ट का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे ही वहां इलैक्शन होने होते हैं वैसे ही एट्रोसिटीज एक्ट का दुरुपयोग किया जाता है। कांग्रेस वालों ने हमारे महाराष्ट्र के एक-एक गांव के एक-एक बच्चे तक पर एट्रोसिटी एक्ट के अन्तर्गत केस चला रखे हैं। मैं कहना चाहता हूं कि इस एक्ट का राजीनीतक इस्तेमाल बन्द होना चाहिए।…( व्यवधान)

श्री कांतिलाल भूरिया (झाबुआ): दलितों के ऊपर जो बड़े-बड़े लोग अत्याचार करते हैं, आप उनकी वकालत कर रहे हैं। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Nothing will go on record except what Shri Mohan Rawale says.

(Interruptions)*श्री मोहन रावले : सभापति जी, जब महाराष्ट्र में चुनाव हुए थे, तो शिव सेना और भाजपा पार्टियों की ओर से अधिक से अधिक दलित समाज के लोग जीत कर आए थे और ज्यादा से ज्यादा मंत्री बने थे। मैं महाराष्ट्र के बारे में बताना चाहता हूं। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record.

(Interruptions)*श्री मोहन रावले : सभापति महोदय, मराठवाड़ा विद्यापीठ का नाम डा. बाबा साहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विद्यापीठ रखने का प्रस्ताव शिव सेना प्रमुख, माननीय बाला साहेब ठाकरे ने बहुत वर्ष पहले दिया था, लेकिन कांग्रेस पार्टी के लोगों ने उसे नहीं माना और वोटों की राजनीति के चलते वह उस समय नहीं हो सका क्योंकि ये लोग दलितों में झगड़ा कराने में विश्वास रखते हैं, लेकिन १५ वर्ष के बाद माननीय बाला साहेब ठाकरे के उसी प्रस्ताव को माना गया और उस विद्यापीठ का नाम डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर मराठवाड़ा विद्यापीठ रखा गया।

सभापति महोदय, जिस क्षेत्र से मैं चुनकर आता हूं, वह ऐसा क्षेत्र है जहां से बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव लड़ा था। …( व्यवधान)

* Not Recorded.

श्री कांतिलाल भूरिया (झाबुआ): सभापति जी, मैं मोहन रावले जी की जानकारी के लिए बता देना चाहता हूं कि मध्य प्रदेश सरकार ने इन्दौर के निकट महू, जो माननीय बाबा साहेब अम्बेडकर जी का जन्म स्थान है, वहां एक विद्यापीठ की स्थापना की है, जहां हजारों बच्चे विद्याध्ययन कर रहे हैं। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Rawale, please address the Chair.

… (Interruptions)श्री मोहन रावले : सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूं कि इस एक्ट का इस्तेमाल ढाल की तरह होना चाहिए, तलवार की तरह नहीं।

महोदय, स्व.जी.एम.सी. बालयोगी जी को जब पहली बार इस सदन के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित करने का हमने फैसला किया, तो कांग्रेस पार्टी के लोगों ने विरोध किया था। उसके बाद वे निर्विरोध चुनकर आए। इन्हीं लोगों ने उन्हें अपोज किया था। …( व्यवधान)आज आपने श्री राम दास आठवले और श्री प्रकाश अम्बेडकर जैसे लोगों को अलग-अलग कर दिया। …( व्यवधान)

श्री रामदास आठवले : कांग्रेस पार्टी ने हमारे टुकड़े-टुकड़े नहीं किए। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record except what Shri Rawale says.

(Interruptions)*श्री मोहन रावले : सभापति महोदय, बिहार में ज्यादा से ज्यादा हत्याएं दलितों की होती हैं। तब ये क्यों चुप होकर बैठ जाते हैं। …( व्यवधान)

दलितों की हत्या हो रही है, हमें इसका दुख है। हम उसका समर्थन नहीं करते हैं।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : रावले जी, अब आप समाप्त करिए।

श्री मोहन रावले : महोदय, मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि सुशील कुमार शिंदे जी, जो अभी भी लोक सभा के मेम्बर हैं, वह महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री बने, उसकी हमें बहुत खुशी है। हम उनका बहुत आदर करते हैं। महाराष्ट्र में अनेक लोगों के ऊपर अन्याय एवं अत्याचार हुए हैं। मैंने शुरू में ही कहा कि अगर कानून बने तो किसी एक को न्याय देने के लिए और दूसरे पर अन्याय एवं अत्याचार के लिए नहीं बननना चाहिए।

* Not Recorded.    

महोदय, महाराष्ट्र में अनेक लोगों पर अत्याचार हुए, अनेकों केस दर्ज किए गए। मेरा यह कहना है कि एक तो यह एक्ट खत्म किया जाए और जो दलितों के ऊपर अत्याचार हुए, उसकी इतनी कड़ी सजा होनी चाहिए कि उनके हाथ-पैर काट देने चाहिए।…( व्यवधान)महाराष्ट्र में शिवसेना के कार्यकर्ता के ऊपर जो केस दर्ज हुए, उसके ऊपर भी विचार किया जाए, उसे वापस लिया जाए। धन्यवाद।…( व्यवधान)

श्री रामानन्द सिंह (सतना): महोदय, हमें भी इस विषय पर बोलने दिया जाए, मैंने भी अपनी पार्टी की तरफ से नाम भिजवाया है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : मेरे पास जो लिस्ट है, मैं उसी के मुताबिक नाम ले रहा हूं। जब आपका नाम आएगा तो आपको बुलाया जाएगा। अभी आप बैठ जाइए, भाषण मत करिए।

श्री सुबोध राय (भागलपुर): सभापति महोदय, दलितों पर अत्याचार की घटना सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्याओं में से एक है और यह पूरे समाज तथा राष्ट्र के लिए बहुत बड़ा कलंक है। सवाल यह है कि इस कलंक को धोने की चिन्ता किसे है और किस ने इस रास्ते पर चलने का सबसे पहले प्रयास किया तथा किस तरह से किया। यह बात बिलकुल सही है कि बिहार में दलितों पर अत्याचार होता है। वहा बराबर रणवीर सेना के माध्यम से, बड़ी-बड़ी जो शर्मनाक घटनाएं हुई हैं, उसने पूरे राष्ट्र और बिहार के समाज को झकझोरने का काम किया है, लेकिन यह बात भी सही है कि जब दलितों के उत्थान और उनके सम्मान का प्रश्न आया तो बिहार ही सबसे पहला राज्य है, जहां बाबा अम्बेडकर के नाम पर मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालय का नामकरण किया गया। बिहार ही सबसे पहला राज्य है, जहां आदिवासी नेता तिलका मांझी जी के नाम पर भागलपुर विश्वविद्यालय का नामकरण करके उन्हें सम्मान देने का काम किया गया, लेकिन सामंती व्यवस्था, सोच-समझ और जिस तरह की हमारी सामाजिक स्थिति है, उस मानसिकता के चलते आज सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार जारी हैं। पिछले ५६ सालों से तरह-तरह के कानूनों के बावजूद, संविधान में व्यवस्था के बावजूद उनके ऊपर अत्याचार की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। भारत के जो राज्य सबसे ज्यादा उन्नत, समृद्ध और विकसित होने का दावा करते हैं, उनमें ये घटनाएं आज सबसे ज्यादा बढ़ रही हैं, इसलिए किसी के खिलाफ कोई बात नहीं है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु की घटना हो या मध्य प्रदेश की हो, यह बात किसी पर जाहिर नहीं है, तमाम आंकड़े बताते हैं।

इन सारे राज्यों में जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, उसने जाहिर कर दिया है कि किस तरह से लगातार तमाम कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद ये घटनाएं बढ़ती रही हैं। १९९९ की रिपोर्ट के अनुसार यू.पी. में ६१२२ दलितों पर अत्याचार की घटनाएं हुई हैं, राजस्थान में ५६२३ घटनाएं हुई हैं, मध्य प्रदेश में ४६६७ घटनाएं हुई हैं। पूरे देश में जितनी घटनाएं हुई हैं, उसका कुल ६५.४ प्रतिशत हैं। २००० के आंकड़ों के मुताबिक कुल १,६१,१३१ घटनाएं हुई हैं। स्पेशल कोर्ट में, हरिजन थानों में जो दलितों पर अत्याचार की घटनाएं पेंडिंग हैं, लम्बित हैं, उसमें मात्र १२,९५६ का ही निष्पादन हुआ है। जहां तक दोषियों पर अत्याचारियों पर कार्रवाई करने का सवाल है तो कुल ९८२ व्यक्तियों के खिलाफ ही मुकदमे में कार्रवाई की गयी लेकिन अभी तक मंजिल बहुत दूर है। दलितों पर अत्याचार करने वालों को सीधे फांसी की सजा दी जाये, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाये और उनकी सारी सम्पत्ति जब्त करके उस इलाके के दलितों में बांटने का काम किया जाये।

आज तक भूमि सुधार को टालने का जिस तरह से काम किया गया है, आज बड़ी संख्या में दलित भूमिहीन हैं, गरीब हैं, चाहे वे शहर में हों या देहात में हों, चारों तरफ वे गंदी बस्तियों में रहने वाले लोग भीषण से भीषण नारकीय स्थिति में रहने वाले हमारे दलित भाई-बन्धु, उनकी महिलाएं और बच्चे हैं।

१६.१७ hrs. (द्ध. ठ्ठन्त्दठ्ठद्धठ्ठठ्ठद घ्ठ्ठदड्डड्ढठ्ठ त्द ण्ड्ढ ण्ठ्ठत्द्ध)

हम जब उनकी बस्तियों में जाते हैं तो उनके पास बैठ नहीं सकते हैं, क्योंकि उनके यहां बैठने का कोई इन्तजाम नहीं है। उनकी इतनी ज्यादा बदतर स्थिति है, स्कूल की हालत बदतर है, कोई अस्पताल नहीं, अगर किसी तरह का सामाजिक कार्यक्रम होता है तो उसके बारे में परिस्थिति नहीं है।

जहां तक आरक्षण का सवाल है, आप देखिये कि आरक्षण की नीति लागू रहने के बावजूद भी सिर्फ यूनिवर्सिटी लेवल पर जो ३४५० सीटों पर दलित और आदिवासियों की नियुक्ति हुई, लेकिन बहुत बड़े पैमाने पर सीटें खाली रखी गईं। उसी का नतीजा है कि यह मानसिकता काम कर रही है कि वर्तमान केन्द्र सरकार को चार साल बीत गये, लेकिन अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति कमीशन की रिपोर्ट की अनुशंसाओं पर कोई बहस नहीं हुई, न उसकी अनुशंसाओं को लागू करने के लिए कोई कदम आज तक उठाया गया है। यह क्या जाहिर करता है, आप साफ समझ सकते हैं कि किस तरह से उपेक्षा की बातें हो रही हैं। मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि आज हमारे यहां जो समस्या है, वह इतनी भयावह है कि उसे रोकने के लिए, उसके निदान के लिए तथा जो अनुशंसाएं एस.सी. एस.टी. कमीशन द्वारा की गई हैं, उनको लागू करने के बारे में सरकार को संजीदगी से प्रयास करना चाहिए। आज हमारे आदिवासी भाई जंगल से खदेड़े जा रहे हैं, उनके ऊपर अत्याचार हो रहा है, भू-स्वामियों की ओर से उनके ऊपर अत्याचार हो रहे हैं।

जंगल माफियाओं की ओर से या जो नव धनाढय तबके के लोग हैं, जो ठेकेदार हैं, वे आदिवासी इलाकों की, हरिजन इलाकों की जमीनों को हड़पकर काम्पलैक्स खड़ा करने की बात कर रहे हैं। उस पर बड़े-बड़े फार्म बनाने की बात कर रहे हैं। इस तरह से निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों के माध्यम से दलितों पर बहुत बड़ा हमला करने की योजनाएं लगातार कार्यान्वित की जा रही हैं। इसलिए उस पर पाबंदी लगानी चाहिए। भूमि सुधार का कार्यक्रम पूरी मुस्तैदी से देश मे लागू करके तमाम भूमिहीन मजदूरों को, खेतीहर मजदूरों को लाभ मिलना चाहिए। चाहे रेलवे की भूमि हो, चाहे जंगल की जमीन हो चाहे परती जमीन हो चाहे सीलिंग से फाजिल जमीन हो, उन तमाम जमीनों पर हमारे जो दलित भाई हैं, जो आदिवासी हैं, उनका अधिकार दिलाने के बारे में सरकार को ज्यादा से ज्यादा प्रयास करना चाहिए। लेकिन दुख की बात है कि भारत सरकार की जो स्थिति है। ...(व्यवधान)

सभापति महोदय : अब आप समाप्त कीजिए।

...(व्यवधान)

श्री सुबोध राय : भारत सरकार ने जो नीति अख्तियार की है, उससे जाहिर हो गया है कि जो बड़े-बड़े संपन्न वर्ग हैं, जो गरीबों के प्रति अत्याचार करने वाले लोग हैं, यह उनकी सरकार है। इसलिए उनके बारे में ज्यादा चिंता करती है। हम मांग करते हैं कि इस बारे में जो कमीशन की रिपोर्ट आयी है, उसको एक-एक जिले में रिव्यू किया जाना चाहिए। सर्वदलीय बैठकर करके इस कमीशन की अनुशंसाओं को लागू करने के लिए तत्काल प्रभावशाली कदम उठाने चाहिए।    

DR. MANDA JAGANNATH (NAGAR KURNOOL): Mr. Chairman, Sir, I thank you very much for giving me an opportunity to participate in this discussion. I feel that, when such an important issue relating to the killing and rape of thousands of oppressed people in this country is being discussed in the House, at least, the Deputy-Prime Minister should have been present in the House.

Sir, we have organised a Special Session of Parliament to celebrate the Golden Jubilee of our Independence with pride and remembered the aspirations of our forefathers who struggled for freeing India from the clutches of foreign rule. The Father of the Nation, Mahatma Gandhi thought of wiping away the last tear from the eyes of every citizen of India, Pandit Jawaharlal Nehru thought of ‘Destiny with Tryst and Dr. B.R. Ambedkar thought that the weaker sections of the society would join the mainstream of the country from thousands of years of social injustice once the country achieved freedom. Have we really achieved the goals thought of by our forefathers? If we look at our achievements, as the time passed, the aspirations of our founding fathers lie shattered and, to be frank, their souls must be bleeding with agony and they must be feeling sorry for the prevailing state of affairs of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes in our country.

Sir, atrocities on dalits are on the increase. As the society is getting civilised, casteism is growing. Society has become jealous of the upcoming of the weaker sections.

When we look at implementation of the constitutional guarantees towards the dalits, one has to bow his or her head in shame. On one pretext or the other, the constitutional rights meant for the weaker sections are violated wilfully. The successive Governments are showing a lukewarm attitude whenever these are brought to the notice of the concerned authorities in so far as the implementation of the constitutional guarantees are concerned. That is the situation even after 55 years of our Independence. Murders, rapes and social boycotts are committed unabated because the successive Governments are not showing much concern as is being shown to the lives of some of the animals which our society thinks ‘more sacred than the lives of the dalits’. This is the situation in our country. It is very shameful.

As far as the statistics relating to crimes maintained by the National Crime Records Bureau under the Ministry of Home Affairs are concerned, there is an increase in the incidence of crime against the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes in successive years. The number of cases registered in 2000 were 29,645 while in the year 2001, the figure was 29,683. But actually, the cases that were not registered could definitely be three or four times more than the registered ones because most of the cases of atrocities go unregistered. It is so because of various reasons, such as, socio-economic, fear and terror created by the crime abettors and apathy shown by the police officials in registering such cases.

The Acts passed by the Parliament to safeguard the interests of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes are also not properly implemented. The Protection of Civic Rights Act, 1955 and the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 – No. 33 of 1989 – are just lying on the papers. Their implementation is very negligible. In fact, sometimes, these are rather misused by the feudal and upper caste people in settling scores against each other by making the innocent dailts as scapegoats.

The district administration, many a time, instead of registering the cases, does not pay heed to the problems of such people. The police people do not even go to the places where the atrocities had been committed. I have come across IPS officers who happened to be Additional SPs in districts. Some of them do not know anything about the PCR Act and the SC & ST (Prevention of Atrocities) Act. They were just asking me where it had been written. It is very clearly mentioned in the Act that whenever an atrocity has been committed on the people belonging to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, and the information is received, the police personnel of the DSP or ASP level should immediately go to that particular place. Rather they asked me to show them where it had been written. It is very much mentioned in these Acts. Such is the condition with the police officials in the districts.

Some of the police people do not even know the provisions of the Acts. Some of them, even though they know about such provisions, do not bother to take action as had happened at Jhajjar in Haryana where the police had played a spectator’s role when the dalits were lynched.

As per the provisions of the above-mentioned Acts, if a police person or any other officer who has been entrusted an investigation in a case of untouchability and atrocity and not attending properly, he should be deemed to be abetting the crime. No action is initiated against such type of officers. No accountability is fixed by the officer concerned with investigation of offences against the dalits. If such an official does not act immediately and it is found that it was his duty, he should be deemed to have abetted in that act. Hence, action should be taken immediately against such type of negligent officers.

In Andhra Pradesh, a number of rape cases are committed. In one particular case, the Judge felt that the rape was committed because of ‘lust for sex’ rather than thinking that the woman was a dalit woman. I wonder if it is lust for sex. Why are only dalit women chosen? Why are not women in one’s family chosen for committing a rape? They are also women. Be it a dalit woman or a woman in an upper caste family, the anatomy of their bodies is the same.

This very clearly shows that the rape against the Dalitwomen are committed because they are unprotected in all the ways and the abettor or the accused gets away without any punishment.

I support the hon. Deputy Prime Minister’s observation made some time back that if all parties agree, the Government is ready for death sentence for those who commit rape.

The judgements in such type of rape cases come against the Dalits because the witnesses are purchased by Upper Caste people by money or by intimidation, and the witnesses are made hostile. As there are very few number of judges from lower courts up to High Courts and the Supreme Court belonging to weaker sections, the judgements are not given on the merits of the cases. Unless there are SC/ST/OBC judges in proportionate number of judges from lower courts to the Supreme Court on population basis, the judgements will not be favouring the Dalits in most of the cases.

If you look at the judiciary, the entire judiciary is full of non-SC/ST/OBC Judges . The statistics say that out of 650 judges, the number of SC/ST judges is 15 and the number of OBC judges is 35. In the Supreme Court, out of 26 judges, the number of SC/ST judges is one and it is nil as far as OBC judges are concerned. In the Allahabad High Court, out of 70 judges, the number of SC/ST judges is three and the number of OBC judges is one. In the case of Delhi High Court there are no SC/ST or OBC judges. In these circumstances, it is very difficult to get justice from the judiciary for the Dalit people. So, I demand that there should be proportionate representation of judges in the judiciary from all sections of the society, including SC/ST/OBCs on population proportion. As we all know, the Government is planning to have a Judicial Commission, I would request the Government to include this clause in the proposed Judicial Commission as a guideline in recruitment of judges from lower courts to the Supreme Court.

With regard to the police apathy towards the Dalits, I would say that some of the police people do not even know the provisions of the Acts and some o them even though they know the provisions, do not bother to take action. Take, for instance, the Jhajjar Incident in Haryana where the police played the spectator’s role when the Dalits were lynched. Though it was a dead cow, rumours were spread that these people have lynched a living cow. The police was there as spectators along with the mob that gathered there and lynched these Dalit persons. In such types of cases, immediate action should be taken against such type of negligent officers. They should be immediately removed from the service and criminal cases to be booked against such officers.

Finally, I would like to say that if the Government wants to stop such types of atrocities against Dalits, the Government should come out with more stringent laws like death sentence for people who commit rape.

Severe and immediate action should be taken against those officers who neglect their duties in respect of cases of atrocities on SC/ST people.

As I said earlier, a clause should be included in the proposed Judicial Commission with regard to recruitment of judges in the Courts on population proportion to SC/ST/OBC so that there is a sincere and effective implementation of Constitutional rights of the Dalits in letter and spirit. An Act has to be made and put in the Ninth Schedule of the Constitution.

Then the reservation has to be extended to the private sector also.

There should be adequate compensation and rehabilitation of the victims of atrocities on a long-term basis rather than merely giving one or two lakh rupees as compensation. These meagre sum will not help them for their whole life, so there should be a long-term procedure and the Government has to see that they are rehabilitated properly.

Incentives should be given to those who marry the rape victims.

There should be a programme for Dalits in a big way like the Andhra Pradesh Government have taken up to create awareness among the common masses about the untouchability and acts concerning the Dalit aspects through the country by the Government of India.

The subject matter of atrocities should be brought under the Home Ministry rather than putting it under the Social Welfare Ministry.

Finally, the Government should empower the SC/STs in all the fields.

श्री थावरचन्द गेहलोत (शाजापुर): माननीय सभापति जी, लम्बे समय बाद दलितों पर अत्याचार विषय को लेकर इस सदन में चर्चा हो रही है। जब यह विषय बीएसी में तय हुआ कि इस विषय पर सदन में चर्चा कराई जाए, तो मेरी जिज्ञासा हुई कि लाइब्रेरी में जाकर पता लगाऊं कि पहले इस विषय पर कब चर्चा हुई, निष्कर्ष क्या निकला और क्या कार्रवाई हुई? मुझे ताज्जुब हुआ कि सन् १९८४-८५ के बाद कभी भी इस प्रकार की चर्चा, दलितों के संबंध में नहीं हुई। मैं यह लाइब्रेरी से जो जानकारी मिली, उसके आधार पर कह रहा हूं।…( व्यवधान)अलग-अलग विषयों के माध्यम से, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव या स्थगन प्रस्ताव के माध्यम से चर्चा हुई हो तो अलग बात है, लेकिन इस प्रकार से पहले कभी भी चर्चा नहीं हुई।…( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: आपको जानकारी नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं है कि चर्चा नहीं हुई। इसी सदन में नियम १९३ के अधीन चर्चा हुई है।

श्री थावरचन्द गेहलोत : यह जो चर्चा कराई जा रही है, इसके लिए मैं सरकार को…( व्यवधान)

SHRI PRIYA RANJAN DASMUNSI : I would like to put it on record that this discussion has not been initiated by a Member from the Government side. A Member of the Opposition Party gave a notice for this discussion, which has been accepted by the Business Advisory Committee. The hon. Member must know that.… (Interruptions)

श्री थावरचन्द गेहलोत : पहले आप मेरी बात तो पूरी सुन लें। यह चर्चा कराई जा रही है, इसके लिए मैं सरकार को, सभी दलों को और विशेषकर आसंदी को धन्यवाद देना चाहता हूं। बीएसी में यह विषय आया और इस विषय पर नियम १९३ के अंतर्गत चर्चा कराई जी रही है। …( व्यवधान)मैं इस अवसर पर यह भी कहना चाहता हूं कि यह सरकार इस बात के लिए भी धन्यवाद की पात्र है कि शायद पहली बार एनडीए की सरकार में ११ मंत्री अनुसूचित जाति और जनजाति के बनाए गये हैं। इससे पहले शायद ही कभी इतने मंत्री बनाए गये हों।…( व्यवधान)बहुत सारे माननीय सदस्य कह रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी के साथ अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों की संख्या कम है। मैं यह भी कहना चाहता हूं कि वर्तमान में सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों की संख्या भारतीय जनता पार्टी और एनडीए सरकार के साथ है। यह भी चर्चा में आया कि इस सरकार का रुख या रुचि अनुसूचित जाति, जनजाति और दलितों वर्ग के लोगों के हित-संरक्षण में नहीं है। मैं कहना चाहता हूं कि इस सरकार ने अनुसूचित जाति, जनजाति और दलित वर्ग के लोगों को न्याय दिलाने के लिए जो आरक्षण १९९६-९७ से समाप्त हो गया था, बैक-लॉग बहुत ज्यादा हो गया था और आरक्षण में जो छूट नौकरियों के लिए हमें दी जाती थी, उस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनजर प्रतिबंध लगा दिया गया था, इस प्रकार के जो पांच कार्यालयीन आदेश डीओपीटी के माध्यम से जारी हुए, उनमें से तीन को वापस लिया गया और आरक्षण में जो छूट दी जाती थी, उस छूट को बहाल कर दिया गया। साथ ही जो ५० प्रतिशत से अधिक बैक-लॉग पर भर्ती करने पर रोक लग गयी थी, उसको भी बहाल कर दिया। अगर ७५-८० प्रतिशत भी बैक-लॉग है तो भी भर्ती करने का आदेश किया गया है।…( व्यवधान)

सभापति महोदय, भारत के संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दलित वर्ग के हितों का संवर्द्धन करने के लिये, जिनका शोषण हो रहा है, जो पीड़ित थे, उनका दुख-दर्द दूर करने के लिये कुछ व्यवस्थायें कीं और कानून बनाये गये। इसके लिये संविधान के अनुच्छेद ३३८ के अंतर्गत अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का प्रावधान किया गया। मेरी जानकारी के अनुसार अभी तक उसके ७-८ प्रतिवेदन इस सदन में तो नहीं आये, लेकिन माननीय राष्ट्रपति जी को दिये गये हैं। उनमें से ४-५ प्रतिवेदनों पर इस सदन में चर्चा हुई है, शेष पर आज तक चर्चा नहीं हुई है। मै आपके माध्यम से उन प्रतिवेदनों के बारे में कहना चाहूंगा कि इस सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग का केवल एक आयोग बनाया था। उस आयोग पर काम का ज्यादा भार था। समस्यायें अधिक होने के कारण समयावधि में उनका वह निराकरण नहीं कर पा रहा था, प्रतिवेदन तैयार करके संबंधित स्थान पर पहुंचते नही थे। इसलिये इस सरकार ने अनुसूचित जाति क लिये अलग आयोग बनाया और अनुसूचित जनजाति के लिये एक अलग आयोग बनाया। यह इस सरकार का ऐतिहासिक कदम है। यह आयोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिये बहुत जरूरी था। इस कार्य में सभी माननीय सदस्यों का सहयोग रहा है। चूंकि यह दो तिहाई बहुमत से यहां पास हुआ है, इसलिये हम सब इसके लिये बधाई के पात्र हैं। हमने अपने कर्तव्य का पालन किया है। इसके लिये हम सब को धन्यवाद देना चाहते हैं। परन्तु इच्छा शक्ति के कारण इस सरकार ने यह कदम उठाया है।

सभापति महोदय, आज सदन में दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर चर्चा की जा रही है। मैं जानना चाहता हूं कि ये अत्याचार क्यों हो रहे हैं, इन अत्याचारों के मूल में क्या है? उन पर प्रहार करने की आवश्यकता है। यदि प्रहार नहीं करें तो इस संबंध में चर्चा एक बार नहीं, अनेक बार कर लें, ये अत्याचार कम होने के बजाय बढ़ते ही जायेंगे। इसके लिये अनेक कानून बने हैं, प्रावधान बने हैं लेकिन उन प्रावधानों पर ईमानदारी से अमल नहीं किया जा रहा है। यही एक बहुत बड़ा कारण है। मैं भी आंकड़ों में जा सकता हूं। मेरे पास भी कुछ वर्षों के आंकड़े हैं। एट्रोसिटीज एक्ट बना है। अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति, दलित वर्ग के लोगों पर अन्याय, अत्याचार, उनकी हत्यायें, उनके साथ बलात्कार और मारपीट की घटनायें होती रहती हैं। जब उन घटनाओं की एफ.आई.आर. की जाती है, चार्जशीट होती है, उसके बाद सजा होती है या बरी होते हैं, यदि उन आंकड़ों को देख लें तो दिखाई देगा कि निश्चित रूप से कानूनी प्रक्रिया में सुधार करने की आवश्यकता है। यदि १९९८ के आंकड़ों को देखा जाये तो मालूम होगा कि ६८६८ मामले रजिस्टर्ड हुये, जिनमें २९१५ चार्ज-शीटेड हैं, २४० कनविक्टेड और अक्विटल १६०० हैं। इसी प्रकार से १९९९ में ६८३८ रजिस्टर्ड, चार्ज-शीटेड ३९२१, सजा पाने वाले २३६ और एक्विटल २३५९ हैं। श्री कैलाश मेघवाल ने ९.८.०२ को प्रश्न संख्या ३९१५ द्वारा पूछा था तो उन्हें बताया गया कि २००१, २००२ में कुल मिलाकर जो एफ.आई.आर. दर्ज हुई या चार्ज शीटेड हुये, उनमें से केवल आधे लोगों को ही सजा हुई, बाकी सब बरी हो गये। इससे यह निकर्ष निकलता है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और दलित वर्ग के लोग गरीब हैं, उन्हें अच्छा वकील नहीं मिलता है, उसके पक्ष में तर्क-वितर्क नहीं होता है या अन्यान्य कारणों से न्यायालय प्रभावित होते हैं और अपराधी बरी हो जाते हैं। अब यह नहीं माना जा सकता कि ये रिपोट्र्स गलत हैं। मैं कहना चाहता हूं कि देश के ४-५ प्रान्त ऐसे हैं जहां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व दलित वर्ग के लोगों के साथ अपराध की सर्वाधिक घटनायें होती हैं। उनमें सर्वोपरि उत्तर प्रदेश का स्थान है, दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश, तीसरे स्थान पर राजस्थान और चौथे स्थान पर बिहार व गुजरात आदि हैं।

जो डेढ़ हजार अपराध प्रति वर्ष से अधिक की संख्या वाले प्रांत हैं, उनमें आखिर ये अपराध क्यों होते हैं। सरकारें बदल जाती हैं, मुख्य मंत्री बदल जाते हैं। इन प्रांतों की संख्या की द्ृष्टि के हिसाब से देखें तो इनमें कुछ कमी भी हो जाती हैं, परंतु सर्वाधिक अपराध, अत्याचार और अन्याय की घटनाएं इन प्रांतों में क्यों होती हैं। इसके मूल में जाने की आवश्यकता है और अगर हम मूल में जायेंगे तो देखेंगे कि जातिवाद निरंतर बढ़ता जा रहा है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो। जातिवाद बढ़ता जा रहा है और इसीलिए अपराधों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। इस जातिवाद पर प्रहार करने की आवश्यकता है। मुझे एक बहुत बड़े संत का कथन याद आता है - प्रत्येक व्यक्ति दिन में अपनी कार्य प्रणाली के कारण चारों वर्णों में प्रवेश करता रहता है। उन्होंने कहा कि चाहे कोई ब्राहमण है, क्षत्रिय है, वैश्य है या शूद्र है, वह जब सुबह सोकर उठता है और जब तक वह स्नान-ध्यान नहीं करता है, तब तक वह शूद्र है और स्नान-ध्यान के बाद अगर पूजा-पाठ करने लग जाए तो ब्राहमण बन जाता है। वही व्यक्ति थोड़ी देर के बाद दुकान पर जाकर बैठ जाता है या व्यापार करता है तो वह वैश्य हो जाता है और अगर उसी को कहीं क्रोध आने लग जाए और अगर वह एक प्रकार का द्ृश्य प्रदर्शित करने लग जाए तो समझ लो कि वह क्षत्रिय हो गया। इस प्रकार से चारों वर्ण प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति में होते हैं और इस प्रवृत्ति को रोकने की आवश्यकता है। आदमी शूद्र कम से कम बना रहे, इस दिशा में अगर हमने कुछ पहल करने की कोशिश की तो इस समस्या का निदान हो पायेगा, अन्यथा नहीं होगा।

सभापति महोदय, मैं एक बात अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों और सवर्ण जाति वर्ग के लोगों से भी कहना चाहता हूं। आप जानते हैं मैं मध्य प्रदेश की किस जाति से हूं - मैं अनुसूचित जाति वर्ग का हूं। मुझे एक बार अपने मौहल्ले के मेहतर समाज के व्यक्ति के यहां शादी में शामिल होने का निमंत्रण मिला। यह १९६८ की बात है। मैं उस शादी में गया और पंगत में बैठकर भोजन किया। मेरी जाति के लोग कहने लगे कि यह क्या है, आप उनके यहां जाकर बैठ गये और आपस में खुसर-फुसर करने लगे। फिर कहा कि इसे जाति से बाहर करो। यह प्रवृत्ति अगर अनुसूचित जाति वर्ग के लोगो में है, जो १५०, २०० या ४०० का एक समूह है, अगर उसमें यह प्रवृत्ति है तो हम भेदभाव मिटाने की अपेक्षा कभी नहीं कर पायेंगे। क्योंकि अगर हम अपनी जाति से नीचे वालों के साथ बैठकर भोजन करना पसंद नहीं करते हैं तो हमें किसी भी उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठकर भोजन करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।

मैं एक बात और कहना चाहता हूं और सवर्ण वर्ग के सदस्यों से निवेदन करना चाहता हूं कि वे इसमें बुरा न माने। मैं जगन्नाथ हूं, चर्मकार जाति का हूं। आपके ३३ करोड़ देवी-देवताओं को मानता हूं। आपके मंदिर, आपके धर्म रक्षा के लिए, आप जिस धर्म को मानते हैं, उसकी आन-बान और शान के लिए लड़ने-भिड़ने के लिए मैं सबसे आगे हो जाता हूं। परंतु आप मुझे अपने चूल्हे-चौके तक नहीं आने दें, मुझे मान-सम्मान नहीं दें, मुझसे छूआछात करें। परंतु अगर मैं दूसरे दिन अपना नाम जॉर्ज रख लूं, मेरे पिता जी का नाम वही रामलाल हो और मैंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया तो आप दूसरे दिन मुझे अपने चूल्हे-चौक तक आने की अनुमति दे देते हो और सम्मान के साथ आइये, मसीह जी कहते हो। रामचंद्र चर्मकार हो और दूसरे दिन वह अपना नाम रहीम खां लिखा ले, पिता जी का नाम वही हो, जो मेरे पिता का नाम है रामलाल, परंतु मैं दूसरे दिन धर्म परिवर्तन करके आ गया तो आप कहेंगे आइये, खां साहब। चूल्हे-चौके तक बैठने की प्रवृत्ति उससे परिलक्षित होती है और ऐसा वातावरण जब देखने में आता है तो आदमी को लगता है कि अगर नाम बदलने से उसे मान-सम्मान मिलता है तो नाम बदल लो और धर्म परिवर्तन कर लो। यह प्रवृत्ति आज समाज में बढ़ती जा रही है। इसे रोकने की आवश्यकता है। यदि इस प्रवृत्ति को रोकने का काम नहीं किया गया तो इस देश में आज नहीं तो कल दो वर्ग बन जायेंगे और उसके बाद वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा हो जायेगी।…( व्यवधान)अगर आप मेरे भाषण को राजनीतिक परिद्ृश्य में देखना चाहते हैं…( व्यवधान)

श्री रामदास आठवले : इन्हें बताइये।

सभापति महोदय : रामदास जी, आप बैठिये।…( व्यवधान)

श्री थावरचन्द गेहलोत : सभापति महोदय, मैं गैर-राजनतिक भाषण कर रहा हूं और अगर मुझे राजनतिक भाषण देने के लिए प्रेरित किया जाता है तो मैं यह कहने कि लिए तैयार हूं भारतीय जनता पार्टी पहली पार्टी है जिसने श्री जगजीवनराम जी को प्रधान मंत्री बनाने का प्रयास किया, परंतु सामने बैठे हुए लोगों ने उन्हें प्रधान मंत्री बनने नहीं दिया।

अगर राजनीतिक भाषण सुनना चाहते हैं तो मैं कहना चाहता हूँ कि अंबेडकर जी को इस सदन में अगर किसी ने नहीं आने दिया तो सामने बैठे हुए लोगों ने नहीं आने दिया। अंबेडकर जी को चुनाव में हराने का काम सामने वाले लोगों ने किया। …( व्यवधान)मैं गैर राजनीतिक बात करना चाहता हूँ। मैं दलितों पर चर्चा कर रहा था। यदि से उधर के लोगों द्वारा राजनीतिक भाषण दिया जाएगा तो मैं भी कहने के लिए तैयार हूँ और मैं भी कह सकता हूँ …( व्यवधान)

सभापति महोदय : आठवले जी, आप बैठिये। आपको बोलने की अनुमति नहीं है। आप जो कुछ कह रहे हैं, वह रेकार्ड में नहीं जाएगा।

(Interruptions) *

श्री थावरचन्द गेहलोत : सभापति महोदय, मैं कहना चाहता हूँ कि गांधी जी की कांग्रेस जिन्होंने दलितों के हितों के संरक्षण के लिए काम किया, वह देश की आज़ादी के बाद १९४८ में समाप्त हो गई। कोई कांग्रेस आज बची है तो वह हरिजनों और सवर्णों में आपस में झगड़ा कराने वाली बची है। …( व्यवधान)मुझे राजनीतिक भाषण करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : गेहलोत जी, आप समाप्त करें।

श्री थावरचन्द गेहलोत : मैं दो मिनट में अपनी बात समाप्त करूँगा।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आठवले जी, आप व्यवधान नहीं करें। आपकी बात रिकार्ड में नहीं जा रही है।

(Interruptions) *

* Not Recorded.

श्री थावरचन्द गेहलोत : सभापति महोदय, मैं इस अवसर पर यह भी कहना चाहता हूँ कि देश को आज़ादी दिलाने वाले महापुरुषों ने यह कल्पना की थी कि आगामी दस वर्षों में, संविधान लागू होने के दस वर्ष बाद, इस देश से छुआछूत का वातावरण मिट जाएगा, अमीरी और गरीबी के बीच की खाई खत्म हो जाएगी और दलित, शोषित, पीड़ित वर्ग के लोग बराबरी का दर्जा हासिल कर लेंगे, परंतु दुर्भाग्य की बात है कि ५६ वर्ष देश को आज़ादी प्राप्त किये हो रहे हैं और ५२ वर्ष के आसपास भारत का संविधान लागू हुए हो गए, मगर उनकी मंशा पूरी नहीं हुई। अगर वह मंशा पूरी नहीं हुई और उसके लिए अगर किसी ने पाप किया है, कोई पापी हो सकता है तो वह उधर बैठे हुए लोग हो सकते हैं, हमारी सरकार नहीं हो सकती है। इस सरकार ने एक नहीं, अनेक काम अनुसूचित जाति और जनजातियों के हित के लिए किये हैं और मैं कहता हूँ कि हमारी पार्टी ही ऐसी पार्टी है जिसमें वर्ण व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है। …( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN : Shri Shamsher Singh Dullo. I have called another Member.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Nothing will go on record except what Shri Shamsher Singh Dullo says.

(Interruptions)*

सभापति महोदय : कांतिलाल जी, आप बैठिये। चौधरी जी, आप बैठिये।I have called Shri Shamsher Singh Dullo.

… (Interruptions)

MR. CHAIRMAN: Nothing is going on record except what Shri Shamsher Singh Dullo says.

(Interruptions)*

* Not Recorded

श्री शमशेर सिंह दूलो (रोपड़): सभापति जी, मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया।…( व्यवधान)

MR. CHAIRMAN: Shri Ramdas Athawale, you can speak when your turn comes.

… (Interruptions)

श्री शमशेर सिंह दूलो :सभापति जी, हिन्दुस्तान के जिन करोड़ों दलित लोगों पर जो अत्याचार हो रहे हैं उनके बारे में आज इस सदन में चर्चा हो रही है। कहा जाता है कि हिन्दुस्तान ऋषि-मुनियों का देश है। आज कौन लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने यहां जाति-पाति की प्रथा शुरू की और देश को कलंकित किया ?

सभापति जी, जो अपने आपको सुपीरियर हिन्दुस्तानी कहते हैं, मनुवादी लोग, जिन्होंने इस समाज को बांटा और वे लोग जिन्होंने हिन्दुत्व की बात कही तथा इन हिन्दू राष्ट्र का नाम लेने वालों ने इस समाज को जाति-पांति में बांटा। इसी की प्रतक्रिया हुई कि सदियों से हम लोग गुलाम होते रहे, कभी मुसलमानों के, कभी अंग्रेजों के और उसी गुलामी में हम लोगों ने और हमारे पूर्वजों ने संघर्ष किया कि जो हिन्दुस्तान सदियों से गुलाम रहा, उसे आजाद करने में क्या हम दलितों का हाथ नहीं था। हमारे पूर्वजों ने इस मुल्क की आजादी के लिए बहुत कुर्बानियां दीं। इसमें पंजाबियों का भी बहुत बड़ा रोल था। हिन्दुस्तान की हर स्टेट के फ्रीडम फाइटर ने आजादी प्राप्त करने के लिए अपनी जान लगा दी, जिसकी वजह से हम आजाद हुए, लेकिन मुझे बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि ५६ साल की आजादी के बाद जो थोड़ा बहुत विकास हुआ, उससे पूरे समाज की संतुष्टि नहीं हुई, क्योंकि समाज के जो नीचे के तबके को लोग हैं, उनको विकास में हिस्सा नहीं मिला, वे गरीब के गरीब रह गए, वे ऊपर नहीं उठ पाए।

सभापति महोदय, जो संपन्न लोग थे, जो राजनीति से जुड़े लोग थे, वे मंत्री बन गए, कुछ लोग आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बन गए और इस प्रकार उनको अच्छी नौकरियां मिल गईं बाकी को क्या मिला? हिन्दुस्तान के गरीबों को आप आज भी देखें, तो उनकी वही खराब स्थिति है। यहां कहा जाता है कि हिन्दुस्तान में कोई भूखा नहीं सोता है, लेकिन मैं कहता हूं कि गावों में जाकर देखिए कि आज भी कितने लोग भूखे सोते हैं, कितने बीमार हैं, उनके खाने एवं बीमारी के इलाज के लिए कोई प्रबन्ध नहीं है। रहने को मकान नहीं है।

महोदय, मैं दलितों पर अत्याचार के बारे में कहना चाहता हूं। महात्मा गांधी जी, पं. जवाहर लाल नेहरू जी एवं और दूसरे नेता आजादी लाए। डाक्टर बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान बनाया। हिन्दुस्तान में आज भी शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब पर अन्याय हो रहा है, चाहे वह पालटिकली हो, सोशिली, इकनौमिकली हो या एजूकेशनली हो, आज सबसे बड़ा अन्याय साइकौलौजीकली हो रहा है। यहं जो स्टेटस देखा जाता है, वह बर्थ से देखा जाता है। इसके अलावा और कोई मापदंड नहीं है। आदमी चाहे कितना भी बड़े से बड़ा बन जाए, उसका स्टेट्स उसकी जाति से देखा जाता है। इस एटीटयूड को चेंज करने और ऐसी मानसिक प्रवृत्ति में परिवर्तन करने की सख्त जरूरत है।

महोदय, आजादी से पहले ही जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के लिए पाकिस्तान मांग लिया, लेकिन देश के शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स ने उस समय देश का साथ दिया और हिन्दुस्तान में रहना स्वीकार किया। उन्होंने अपने लिए अलग से देश की मांग नहीं की। उन्होंने हिन्दुस्तान में रहना इसीलिए स्वीकार किया कि भारत उनका देश है। लेकिन आज उन्हीं के साथ अन्याय हो रहा है।

महोदय, मैं देख रहा हूं, यहां इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है, लेकिन प्रधान मंत्री, उप प्रधान मंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति सदन में मौजूद नहीं हैं। हमारे लोगों का तो सिर्फ नाम लिया जाता है कि हमने नौ मंत्री शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब के बना दिए, लेकिन उन्हें कोई अधिकार नहीं दिए, उन्हें कोई पावर नहीं दी। हमारी नेता सोनिया गांधी जी ने जिस प्रकार से दलित समाज के

श्री शिंदे को मुख्य मंत्री बनाया, वैसे आप अपनी तरफ देखिए कि आपने कितने मुख्य मंत्री बनाए। यदि कांस्टीटयूशन में रिजर्वेशन नहीं होता, तो कोई एक-दो व्यक्ति ही यहां आ सकता था। जो आज इतनी संख्या में सांसद यहां हैं, वे नहीं आते। डॉ. अम्बेडकर ने जिस संविधान को बनाया और उसमें आरक्षण की व्यवस्था की, उसके कारण, उनकी मेहरबानी से इतनी संख्या में लोग सदन में आए हैं। मैं एन.डी.ए. सरकार में बैठने वालों से पूछना चाहता हूं कि आपने कितने दलितों को मुख्य मंत्री या उप मुख्य मंत्री बनाया। मैं दलितों पर अत्याचारों की ही बात कर रहा हूं। …( व्यवधान)और आपने क्या परिवर्तन किया ?

17.00 hrs.

अजित जोगी जी को बनाया है। सोनिया जी ने एससी के दो मुख्य मंत्री बनाए हैं - एक अजित जोगी जी को बनाया और बैकवर्ड क्लास के अशोक गेहलोत जी को राजस्थान का मुख्य मंत्री बनाया। महाराष्ट्र में शिंदे जी को भी बनाया। आप एससी का नाम लेते हैं, लेकिन काम उनका करते हैं, जो सुपीरियर हैं।

महोदय, मेरे भाई ने कहा कि डीओपीटी लेटर विदड्रा कर लिया गया। यहां सर्वसम्मति से अपोजिशन वालों ने भी युनेनिमसली रेज्योल्यूशन किया था, कांस्टीटयूशन में जो अमेंडमेंट हुआ है, वह अकेले आपने नहीं किया, सभी लोग चाहते थे। लेकिन ज्यादा जिम्मेदारी उनकी होती है, जिनका राज है, जिनके पास शक्तियां होती हैं। आप नाम एससी का लेते हैं, लेकिन काम दूसरों का करते हैं। अगर अमेंडमेंट्स की हैं तो उन्हें लागू भी करवाएं। ये कहां लागू हो रही हैं? आज सुप्रीम कोर्ट का जज हिन्दुस्तान में कोई एससी जाति का नहीं है। हाई कोर्ट में, जितने सूबे हैं, डिस्टि्रक्ट सैशंस जज कितने हैं, वहां कोई नहीं है। इनकी २५ प्रतिशत आबादी है और ये कहते हैं कि ११ वजीर बना दिए हैं। क्या आपने रेश्यो के मुताबिक बनाए हैं। ८५ के करीब मंत्री हैं, इनमें से एससी के कितने हैं, यह सोचने वाली बात है। एससी, एसटी कमीशन की रिपोर्ट को यहां डिसकशन के लिए लाया जाना चाहिए। लोगों को पता होना चाहिए कि इसमें क्या प्रोबलम है। बाल्मीकि समाज है। राम को भगवान कहने वालों से मैं पूछना चाहता हूं कि बाल्मीकि जी ने सदियों पहले रामायण लिखी। सीता को माता कहा जाता है और लव-कुश को उन्होंने अस्त्र-शस्त्र की ट्रेनिंग दी। सीता जी को जब बनवास दिया, घर से निकाला गया तो बाल्मीकि जी ने उन्हें प्रोटेक्शन दिया था। आप राम को भगवान कहते हैं और बाल्मीकि को भगवान नहीं मानते, यह सोचने वाली बात है। उसे कहते हैं कि शुद्र है। बाबू जगजीवन राम जी की भी यहां बात करते हैं। जब कभी मंदिर में माथा टेकने चले जाते थे तो ये लोग उसकी मूर्ति को गंगा जल से धोते थे। हमारे दस गुरू हैं। मैं पंजाब से आया हूं और मैं गर्व से कह सकता हूं कि हमारे यहां जात-पांत नहीं है, आपके यहां है। आपने अलग बस्तियां बसाई हुई हैं। हमारे गुरू गोविंद सिंह जी ने बहुत कुर्बानियां दी हैं। हिन्दुस्तान के दलितों ने, चाहे पाकिस्तान, चाइना या किसी के साथ भी लड़ाई हुई, आपको पता होगा कि किन लोगों ने उस समय अपनी जानें दीं। उसमें ज्यादातर एससी, एसटी के ही हैं।

महोदय, आज मैं फख्र के साथ कह सकता हूं कि वहां किन लोगों ने लड़ाई लड़ी है। लड़ाई हम लड़ते हैं और उसका लाभ आप लेते हैं। हमें भी अपना हिस्सा चाहिए। देश का फंड है, आपकी प्लानिंग और आपका बजट बनता है। आपने क्या २५ प्रतिशत एससी के लिए रखा है, नहीं रखा है। स्टेट के कंपोनेंट प्लान में जो पैसे जाते हैं, उसमें भी कागजों में एससी, एसटी का नाम होता है, परन्तु प्रेक्टीकली उन तक पैसा नहीं पहुंचता।

…( व्यवधान) आप बैठिये, आप चाहे कुछ भी कर लो, ये आपको वजीर नहीं बनाएंगे। भूमि सुधार कर जमीन को शैडयूल्ड कास्ट्स के लोगों में बांटना चाहिए ताकि हर गरीब को जमीन मिल सके। आपने सरकारी कारखानों को प्राइवेटाइज कर दिया, डिसइन्वैस्टमेंट कर दिया, सरकारी जायदाद प्राइवेट सैक्टर में दे दी तो अब क्या किसी को कोई रिजर्वेशन में नौकरी मिलेगी?

सभापति महोदय : कृपया समाप्त करिये, आपके दल के और लोग बोलने वाले हैं।

श्री शमशेर सिंह दूलो : मैं सच्ची बात कहना चाहता हूं, उसमें शैडयूल्ड कास्ट्स, शैडयूल्ड ट्राइब्स का हिस्सा कहां गया, डिसइन्वैस्टमेंट में सब घपला हो गया, बाल्को जैसी यूनिट इन लोगों ने बेच दी और देश को भी ये लोग बेचना चाहते हैं। सर्विसेज में आरक्षण के लिए एक्ट होना चाहिए, कानून बनना चाहिए कि किसी भी आफिस में अगर रिजर्वेशन लागू नहीं होगा तो उसे सजा मिलनी चाहिए, ऐसा प्रावधान होना चाहिए। २० सूत्री कार्यक्रम में इन्दिरा गांधी जी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण इसलिए नहीं किया था कि जनता का ५५ हजार करोड़ रुपया देश के करोड़पति बड़े-बड़े इण्डस्टि्रयलिस्ट्स के ऊपर बकाया रहे। शैडयूल्ड कास्ट्स के लोगों को अगर बैंक से १० हजार रुपये लोन लेना होता है तो उसे नहीं दिया जाता।

मैंने रिजर्वेशन के लिए एक्ट की बात की, कमीशन की रिपोर्ट की बात की, लैंडलैस लोगों की बात की, आप देखें कि इस बजट का २५ प्रतिशत हिस्सा शैडयूल्ड कास्ट्स को अलग से मिलना चाहिए। बाबू जगजीवन राम जी का स्मारक उनकी कोठी पर नहीं होगा, सरकार ने उस पर कब्जा कर लिया है और कोठी का पानी और बिजली काट दिया है। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि "The idea that one is born superior to another has no meaning in Vedanta.

MR. CHAIRMAN : I am calling another Member now. Please resume your seat.

...( व्यवधान)

सभापति महोदय : शमशेर सिंह जी, आपके अन्य साथियों के लिए समय नहीं बचेगा, इसलिए समाप्त करिये।

श्री शमशेर सिंह दूलो : गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी अर्ज किया है कि मानस की जात, सब एक ही पहचाने। जस्टिस कृष्ण अय्यर ने कहा है कि "We want that judges and administrators who understand and share tears and tyranny of the dalits must guide us. It is a job of every institution of governance to eradicate the caste discrimination."

MR. CHAIRMAN: Please resume your seat.

श्री शमशेर सिंह दूलो :सभापति जी, मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आपने मुझे बोलने का मौका दिया। मैं सरकार से निवेदन करूंगा कि आप मानसिक संतुलन को बनाना चाहिए और सिस्टम में

इम्प्रूवमेंट लाना चाहिए, क्योंकि यह आपका मसला नहीं है, यह पूरे देश का मसला है, इसलिए कि करोड़ शैडयूल्ड कास्ट्स और शैडयूल्ड ट्राइब्स के लोगों के साथ अत्याचार हो रहा है, ज्यादतियां हो रही हैं। हर जगह पर, सर्विसेज में और पोलटिकली भी हम देश के हिस्सेदार हैं, हम गुलाम नहीं हैं, इसलिए हम चाहते हैं कि हमें आजाद भारत में आजादी मिले।            

श्री रतन लाल कटारिया (अम्बाला) :सभापति महोदय, आज यह महान सदन देश के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग पर होने वाले अत्याचारों के ऊपर चर्चा कर रहा है।

दलितों के ऊपर जो सदियों से अत्याचार होते आये हैं, उनमें मुख्य रूप से पांच तरह की कैटेगरीज के अन्दर दलितों के ऊपर अत्याचार होते हैं।

जिसके अंदर फस्र्ट केटगिरी में Murder of Scheduled Castes and Scheduled Tribes. सैकिंड केटेगिरी मेंGrievous injuries. थर्ड केटेगिरी में Rape of Scheduled Caste and Scheduled Tribe women एंड फाइव केटेगिरी मेंOther offences है। देश में एक वर्ष के अंदर वभिन्न राज्यों में लाखों की संख्या में इस प्रकार की घटनाएं होती हैं। समय-समय पर सारा देश पार्लियामैंट के अंदर तथा राज्य की विधान सभाओं में इस विषय पर डिसकशन करता है। आज आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में पिछले लगातार पांच वर्षों से हम इन वर्गों के कल्याण के लिए एक के बाद एक कदम उठा रहे हैं। कई बार हमने सभी राजनैतिक दलों के सांसदों की बैठक बुलाकर इस समाज की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए, जो भी कठिनाइयां पैदा हो रही हैं, उनको दूर करने की कोशिश की है।

मैं यह प्रार्थना करना चाहूंगा कि यह एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिसे हमें राजनीति से ऊपर रखना चाहिए। मुझे याद आ रहा है कि १९८० में जब देवली और सादुलपुर में दलितों के ऊपर अत्याचार की घटनाएं हुई थीं, उस समय आज के लोकप्रिय नेता, देश के नेता आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने देवली से लेकर सादुलपुर तक पैदल यात्रा की थी। आज दलितों के ऊपर होने वाले अत्याचारों को लेकर केन्द्र सरकार गंभीर है। यद्यपि यह मुद्दा राज्य सरकारों का है लेकिन आज देश की एकता और अखंडता के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। आज से चार-पांच साल पहले जब बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे में ५० दलितों का नरसंहार हुआ तो देश के वभिन्न नेता वहां दलितों को दिलासा देने के लिए गये थे। उस समय मैडम सोनिया जी भी बिहार के दलितों को सांत्वना देने के लिए गयी थी। पिछले आठ-दस वर्षों में बिहार के अंदर दलितों पर जो अत्याचार की आंधी आयी है, उस आंधी को देखते हुए मैडम सोनिया जी ने कहा था कि अब राबड़ी सरकार को जाना चाहिए। …( व्यवधान)

१७.१३ hrs. (Dr. Raghuvansh Prasad Singh in the Chair)

वह मुद्दा राष्ट्रपति जी तक भी गया लेकिन दिल्ली आते ही मैडम सोनिया जी का रूख बदल गया। श्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के साथ फिर प्यार की पींगे कांग्रेस ने बढ़ा ली। आज बिहार में दलितों के ऊपर जो नरसंहार हो रहा है। …( व्यवधान)उस शासन में एक के बाद एक कत्ल हो रहा है। …( व्यवधान) कभी ५० लोगों का कत्ल हो जाता है तो कभी ३० लोगों का कत्ल हो जाता है। लेकिन अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए वहां पर राबड़ी सरकार को जिंदा रखा जा रहा है। …( व्यवधान)

श्री कांतिलाल भूरिया :आप यू.पी. में क्या कर रहे हैं? …( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: सभापति महोदय, इतनी महत्वपूर्ण बहस हो रही है। प्रतिपक्ष की नेता सबको सुनने के लिए बैठी हैं लेकिन जिसकी तारीफ हो रही है, वे यहां नहीं हैं। न तो प्रधान मंत्री जी यहां हैं और न वित्त मंत्री हैं। कोई भी नहीं है। कल जब प्राइवेट मैम्बर में काऊ स्लाटर पर बहस हो रही थी तब सारा हाउस खचाखच भरा था लेकिन आज जब दलितों का स्लाटर हो रहा है तो कोई हाजिर नहीं है। इससे सरकार की छवि साबित होती है कि उनकी इसमें कितनी हमदर्दी है। …( व्यवधान)

श्री कांतिलाल भूरिया :सभापति जी, इस सरकार की गंभीरता को देखिये। आज दलितों पर चर्चा हो रही है तो सारे पलायन कर गये हैं।

श्री रतन लाल कटारिया: इस महान सदन के अंदर मैं जैसे कह रहा था कि दलितों पर होने वाले अत्याचारों को हम राजनीति से प्रेरित होकर नहीं लेना चाहिए। मैं हरियाणा प्रदेश से आता हूं। वहां झज्जर जिले के तुलीना गांव के पास दलितों के साथ एक बहुत बडा कांड हुआ। लेकिन उस समय भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समति की बैठक मुम्बई में चल रही थी। हमारे अध्यक्ष श्री वैंकेया नायडू जी ने हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री हर्षवर्धन जी को कहा कि आप मौके पर जाइये । हमने तुरंत वहां जाकर सारी स्थिति का मुआयना किया।

प्रधान मंत्री जी ने सार्वजनिक रूप से हरियाणा के मुख्य मंत्री श्री ओम प्रकाश चौटाला को आदेश दिए कि आप इस मामले में कार्यवाही करें। इसके तुरंत बाद देश के उप प्रधान मंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी जी द्वारा कलप्रिट्स को पकड़ने के लिए सारी बातें की गई जिसका परिणाम यह हुआ कि वहां दलित परिवारों को दस-दस लाख रुपये दिए गए और उनके परिवार के लोगों को नौकरी दी गई। एक कमीशन बनाया गया जिसके अंतर्गत हरियाणा प्रदेश में सारी कार्यवाही हुई। हम चाहते हैं कि यहां भी दलितों के ऊपर…( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: अगर सोनिया गांधी जी वहां नहीं जाती तो आपकी सरकार नहीं हिलती, दब जाती।…( व्यवधान)सोनिया जी गईं, उसके बाद यह हुआ।…( व्यवधान)

श्री रतन लाल कटारिया: उप प्रधान मंत्री जी ने मामले की संवेदनशीलता को समझा और राज्य सरकार को इस पर तुरंत कार्यवाही करने के आदेश दिए। प्रधान मंत्री जी ने सार्वजनिक रूप से कहा और मुख्य मंत्री ने उसे गंभीरता से लिया और उस पर तुरंत कार्यवाही की गई। मुख्य मंत्री ने ठीक कार्यवाही की।

अभी कर्नाटक के हमारे मित्र श्री मुनियप्पा बोल रहे थे कि सत्ता पक्ष कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है। कर्नाटक में पिछले तीन सालों में there were 4,000 cases of atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes, but not even a single person has been convicted during the last three years. … (Interruptions)

SHRI K.H. MUNIYAPPA: Sir, that is wrong. … (Interruptions)

श्री रतन लाल कटारिया: मैं आंकड़ों के साथ यह बात कहना चाहूंगा कि कर्नाटक के अंदर…( व्यवधान)

सभापति महोदय : आप बोल चुके हैं।

SHRI K.H. MUNIYAPPA : This is not correct. It should be corrected. … (Interruptions)

सभापति महोदय : कृपया आप बैठिए।

…( व्यवधान)SHRI K.H. MUNIYAPPA : One atrocity took place in February, 2000 in which seven people died. Shrimati Sonia Gandhi visited; she instructed the Chief Minister; they constructed 100 houses; and they have been rehabilitated. They constructed 100 houses for their livelihood and they have given 100 milch-cows. It has been done under the direction of Shrimati Sonia Gandhi. This is what the Karnataka Government has done. I agree that the figure is 1,000 and not 4,000.

श्री रतन लाल कटारिया: मेरे पास एक कटिंग हैं जिसमें लिखा हुआ है ---

There has not been a single conviction in Karnataka during the last three years regarding cases pertaining to atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes. …( व्यवधान)

श्री प्रकाश यशवंत अम्बेडकर: यह सिर्फ कर्नाटक की नहीं पूरे हिन्दुस्तान की हालत है।…( व्यवधान)

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा (धन्धुका): पहलेअगर कड़ी कार्यवाही की गई होती तो आज दलितों पर जो परम्परा चालू है, वह चालू नहीं रहती।…( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: पंडित जी और इंदिरा जी जब दलितों को सपोर्ट करते थे तो आपकी सरकार…( व्यवधान)इसलिए समाज की ऐसी हालत हुई है।…( व्यवधान) आर.एस.एस. का नियम था क ब्राहमण जब एक पंक्ति में खाएगा तब उसमें कोई शैडयूल्ड कास्ट का व्यक्ति नहीं बैठ सकता।…( व्यवधान)इसलिए आज भी आर.एस.एस. के पांच प्यारों में कोई दलित व्यक्ति नहीं है।…( व्यवधान)

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : आर.एस.एस. और दलितों के कारण कांग्रेस…( व्यवधान)

श्री प्रियरंजन दासमुंशी: आर.एस.एस. में पांच प्यारों के अंदर एक भी दलित व्यक्ति का नाम बताइए। गोलवर्कर से लेकर आज तक एक भी दलित व्यक्ति का नाम बताइए।…( व्यवधान)

सभापति महोदय : प्रोसीडिंग में श्री कटारिया के सिवाए और किसी की बात नहीं जाएगी। कृपा कर आसन ग्रहण कीजिए।

...( व्यवधान)... (कार्यवाही वृत्तान्त में सम्मिलित नहीं किया गया।)

श्री रतन लाल कटारिया: मैं निवेदन करना चाहूंगा कि जब राम विलास पासवान जी इस पर चर्चा कर रहे थे तो उन्होंने वीएचपी की तरफ उंगली उठाई। मैं हरियाणा प्रदेश के अंदर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते बड़ी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि झज्जर के अंदर न तो विश्व हिन्दू परिषद का कोई काम है और न कोई इस तरह के कमेंट वीएचपी की तरफ से आए बल्कि टॉप से लेकर बॉटम तक हमारे सभी सांसदों ने झज्जर कांड की निंदा की है और इस महान सदन के अंदर भी हम इस कांड की आज भी निन्दा करते हैं जिससे हरियाणा का नाम सारी दुनिया के अंदर कलंकित हुआ है। लेकिन उसके बारे में जो कार्यवाही हुई है, उसकी हम प्रशंसा करते हैं।

सभापति महोदय : अब कंक्लूड कीजिए।

श्री रतन लाल कटारिया: अभी तो मैंने शुरु भी नहीं किया है और अभी तो ये लोग ही मेरे समय में बोल रहे हैं। अब यह दलितों के ऊपर जो ज़ीरो प्रतिशत ईक्विटल का आ रहा है कि कोई भी किसी को कंविक्शन नहीं हो रहा है।…( व्यवधान)यह जो कन्विक्शन निल की रिपोर्टें आ रही हैं, इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य सरकारें जो भी एडवोकेट इन केसेज में हायर करती हैं, उनकी अंडरस्टैंडिंग आउटस्टैंडिंग नेचर की नहीं होती। हमारा निवेदन है कि एमीनेंट एडवोकेट्स को एनगेज किया जाना चाहिए ताकि फैसले हों और उनमें कन्विक्शन हो। इसी तरह से एट्रोसिटीस प्रोन एरियाज जो हैं, जैसे कि झज्जर की घटना है कि ऐसी जगह पर पुलिस चौकी थी कि अगर आदमी भी उसको धक्का मारे तो वह चौकी ही गिर जाए। कोई इस किस्म की बिल्िंडग नहीं थी जिसके अंदर उन पांच लोगों को रखा जाता। लोग आए और सारा तोड़ दिया। इसीलिए हम चाहते हैं कि इस प्रकार के जो सेंसटिव एरियाज हैं, वहां पर इस प्रकार के पुलिस स्टेशन्स बनाए जाने चाहिए जहां पर इमीजिएट फोर्स का इंतजाम हो और जो स्पेशल कोट्र्स के अंदर मामले चल रहे हैं, उनके ऊपर भी प्रोपर ध्यान दिया जाना चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि विक्टिम्स के पास आने जाने के लिए किराया तक नहीं होता, वह पेशी पर नहीं पहुंच सकता। हमारा कहना है कि विक्टिम्स को डेली एलॉउंसेज दिये जाने चाहिए ताकि रिजल्ट अच्छा आ सके। इसी तरह से दि रूल ऑफ लॉ का इम्पलीमेंटेशन ठीक तरह से होना चाहिए। भीमराव अम्बेडकर जी ने जो संविधान बनाया है, हम किसी से आसमान के तारे नहीं तुड़वा रहे हैं, हम कोई विशेष बातें नहीं मांग रहे हैं। हम सिर्फ यह कह रहे हैं :- the law of land should be implemented and every guilty person, howsoever powerful he may be, should be punished. हमारी यह मांग है कि चाहे कोई भी व्यक्ति कितना ताकतवर हो, भारत की दंड प्रक्रिया के अन्तर्गत उसको दंड मिलना चाहिए। कोई भी इस प्रकार का जालिम नेचर का व्यक्ति कानून के शिकंजे से बचकर नहीं निकलना चाहिए। यहां पर यह मांग आई कि ६, कृष्णा मेनन मार्ग, जो बंगला है उसको रेस्टोर किया जाना चाहिए। बाबू जगजीवन राम ने १९३५ से लेकर जब तक वह रहे, उन्होंने इस समाज के लिए कल्याणकारी कार्य किए हैं, इसलिए हम इस बात का समर्थन करते हैं। इसी तरह से जो एक्ट है, प्रोटैक्शन ऑफ सविल राइट्स १९५५ और उसके बाद जब यह ठीक तरह से काम नहीं कर सका तो उसके बाद दूसरा १९८९ का जो एट्रोसिटीस एक्ट प्रीवेंशन का आया, उस एक्ट को प्रभावी बनाने के लिए आज हमें अपनी इम्पलीमेंटेशन की मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त करना चाहिए। इसी तरह से आज जो एट्रोसिटीस बढ़ रही हैं, उसका मुख्य कारण यह है कि बाबा भीमराव अम्बेडकर जी ने देश के सामने जो संविधान प्रस्तुत किया, उसमें कहा है : ‘Today, we have got political freedom but until and unless we get economic freedom and social freedom, यह जो हमारी आजादी है, पोलटिकल फ्रीडम हमने कितनी गेन की है, वह खतरे में पड़ जाएगी। इसी तरह से मुख्य कारण यह है कि देश की आबादी में एससीएसटी का २६-२७ प्रतिशत तक बढ़ गया है।

यह बात ठीक है कि आज उनमें मंत्री भी हैं। लेकिन जो शैडयूल्ड कास्ट के लोग चाहते हैं कि उनकी मलिट्री के अंदर भर्ती होनी चाहिए, चाहे उन्हें एजूकेशन की, कद की छूट न मिले। वे चाहते हैं कि अगर जीने का अधिकार नहीं मिला है तो मरने का अधिकार तो दे दो। वे आर्मी में आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इस बारे में हम माननीय राष्ट्रपति महोदय से मिल भी चुके हैं।

आज जो शैडयूल्ड कास्ट के बच्चे ९० प्रतिशत से अधिक नम्बर लेकर आ रहे हैं, वे चाहते हैं कि उन्हें भी आईएएस, आईपीएस, प्रोफैसर बनना है लेकिन आंकड़ों के अनुसार इन पदों पर शैडयूल्ड कास्ट और शैडयूल्ड ट्राइव्ज के बच्चों का नाम नहीं है। इसी प्रकार से कैबिनेट सैक्रेट्री के पद पर भी जो उनमें योग्य उम्मीद्वार हो, जो नीचे से आईएएस है वे भी इस पद पर आयें। उनके आने में किसी प्रकार का रोड़ा नहीं अड़ाया जाना चाहिए। मेरे पास लोग ऐसे केस लेकर आते हैं और देश में सैंकड़ों केस ऐसे हैं जहां पर कोई अनुसूचित जाति या जनजाति का बच्चा आगे बढ़ने वाला है तो उसकी एसीआर में छोटा सा अड़ंगा लगा देते हैं जिससे उनकी प्रमोशन वर्षों तक रुकी रहती है। हम चाहते हैं कि इन सारे मामलों को सरकार देखे। हम माननीय प्रधान मंत्री जी से भी इस विषय में अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं।

हम माननीय प्रधान मंत्री जी का इस बात के लिए धन्यवाद करना चाहते हैं कि जो माननीय देवगौड़ा जी के कार्यकाल में डीओपीटी के माध्यम से पांच ओएमएस जारी हुए थे, उनमें से तीन वापस ले लिये गये हैं। चौथा शैडयूल्ड कास्ट के इंट्रैस्ट में है और पांचवां बकाया रहता है, हम माननीय प्रधान मंत्री जी से मिलकर मांग करेंगे कि उसको भी वापस लिया जाए ताकि देश के पिछड़े, शोषित और दलित समाज को उसका हक मिल सके। हम आज संकल्प लेते हैं कि हिंदुस्तान की एकता और अखंडता के लिए, भारत को विश्व में एक अग्रणी राष्ट्र बनाने के लिए अग्रसर रहेंगे।

शैडयूल्ड कास्ट और शैडयूल्ड ट्राइव्ज के लोग इस देश की रीढ़ की हड्डी हैं और अगर इसे कोई कमजोर करने की कोशिश करता है तो वह देश को कमजोर करता है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।

SHRI DALIT EZHILMALAI (TIRUCHIRAPPALLI): Mr. Speaker, Sir, at the outset, I wish to thank the hon. Speaker and the Leaders of the Parties as well as the Members of the BAC who have very kindly agreed to allow this much of time for discussing this subject. Of course, we should have discussed this matter in the last Session itself but I am happy that we are, at least, now discussing this subject with the cooperation of all the Parties.

The unanimous opinion of all the Parties in Parliament, of course, has to be recognized. They are very much concerned about the welfare and the protection of dalits and the tribals in this country. Several speakers have spoken very eloquently but I have come to say a few words on this subject. Neither I belong to the Ruling Party nor to the principal Opposition Party. My Party keeps equi-distance from both the sides and both the groups consider us as their rivals. It does not matter but as you and everybody know that I am a born untouchable. I have brought up in such a situation that I have faced, undergone, and experienced horrible experiences in this society, which is based on the value system of complete inequality.

There is a graded system, there is the Vedic system, there is the caste system. This is the foundation on which this country is being ruled. I am unable to say that I have today come up to this stage and is standing before you because of this system. Dr. Babasaheb Ambedkar, the father of the Indian Constitution was even denied an opportunity to make his last statement in this House. He was the architect and the tallest intellectual of this country after the great Lord Buddha. People recognise it. People all over the world have so far never repudiated this claim. Dr. Babasaheb Ambedkar gave the Constitution to the largest democracy in the world.

Sir, the Deputy-leader of the Congress Party, Shri Shivraj Patil was rightly concerned and angry about the vacant seats in the Treasury Benches when the Members from the Opposition Parties as well as other Members are expressing their views on this subject in this august House. Fortunately, there has been an introspection and now the people who claim to have won freedom for this country seem to be filling up the seats and are listening to the views that are being expressed. Though it is too late, yet they are listening.

Sir, somebody referred about the number of Members from the Reserved Constituencies represented in this House are much more in the Treasury Benches. If that is a fact, then the Congress Party, which has ruled this country for 45 to 50 years would have to consider the reasons as to why these ordinary and unthinking people have switched over to that side in a such a short time. Forty-five to fifty years in the history of a free nation is not a very long time. But then so much of a political change has taken place within these five decades. But we hardly see any social change. The society is not changing and we know very well that it will not change. According to Dr. Ambedkar, if you have a closed mindset, then nothing will change. Change would only come through those people who are neglected, agonised and are suffering.

Sir, according to some Survey, in this country in one hour at least 100 women are being raped; thousands of houses are being burnt down and in one week several villages are wiped out. This is according to the statistics collected by a Commission consisting of a handful of ten to fifteen persons. People sitting in this capital city are not able to compile the figures that have been provided by the State Governments. That is the position.

That is the position even after these several decades.

While opening the debate, our friend Shri Ramji Lal Suman was referring to a Conference that was held in Durban, South Africa. I was very much present in that Conference. Some other hon. Members were also there sponsored by the Government. Hon. Members Shri Ramdas Athawale, Shri Prakash Ambedkar, Shri Pravin Rashtrapal were also there in that Conference. Our Government was represented in Durban by a junior Minister to say that there was no discrimination, no atrocity, no injustice, and nothing wrong happening in this great country. The theme of the Conference was against racism, anarchism, intolerance and geno-phobia. The Conference was organised by the United Nations. The UN Human Rights Chairman Mr. Rabinson was also there.

MR. CHAIRMAN : Please conclude.

SHRI DALIT EZHILMALAI : Nobody from my Party other than me is going to speak. Please allow me some more time. I have to narrate so many things. I have never spoken in this House before. I had not even given my maiden speech in the last Lok Sabha. The moment I entered the Lok Sabha last time, I was made a Minister and I was keeping quiet. So, you can be considerate to me. I think my friends Shri Shivraj Patil and his colleagues will also allow me to speak.

MR. CHAIRMAN: There are 26 Members in the list.

SHRI DALIT EZHILMALAI: The UN Secretary-General Mr. Kofi Annan came to the mike and was speaking to the audience. He said that he suffered so much of inequality and racist problems. He himself is black and therefore he needs no second-hand information. He was asking about the problems giving a chance to the audience. Shri Prakash Ambedkar raised some question about the prevailing conditions in this country. He said it was a matter of statement; there was nothing that he could answer. Then I asked him in the mike, as the Secretary-General of the UN where he stood. Did he stand against the discrimination against the oppressed people? Oppression is very much visible. There are around 400 million oppressed people in our country. Somebody said that there are about 25 per cent SC people and 10 per cent ST people, making it to 35 per cent of our total population. They are all suffering the discrimination day in and day out. The chastity of a woman is not protected. The life is not safe. There is no security of employment. Even students in the hostels of Delhi University were dragged out, bundled up and beaten. Therefore, my country is languishing in such a situation. I asked him to respond as the Secretary-General of the United Nations. He did not say anything because he was expecting somehow to go about it and simply to get something more for his good service to the white people and the western people. It does not matter. I know very well. If I have to go up, I have to behave like a slave enjoying the slavery. Therefore, the system in this country is going on like this. The terms and terminologies do not matter. Statistics on the conditions apart, atrocities on these people and the problems will go on unending.

It all began long back. Our friend was referring to the declaration of Baba Saheb Ambedkar on the first day of the Republic, the 26th January 1950, that we ourselves can now claim that we are a political democracy. But if we do not achieve the social equality and economic democracy at the earliest possible time, it will be very difficult to keep up the structure on which this pyramid is made up. So, the earlier, the better. If it is not done, the structure itself will be blown up into pieces. Those were the prophetic words of Dr. Baba Saheb Ambedkar.

I come from Tamil Nadu where the reform movement and rationalist movement began from Periyar in close association with Baba Saheb Ambedkar, followed by Anna. Then, rationalists like MGR came and today a lady Chief Minister is ruling my State.

MR. CHAIRMAN: Please conclude.

SHRI DALIT EZHILMALAI : I have not come to the regional affair at all.

Whether it was Pipra or Belchi, Madam Indira Gandhi was very kind. She was very good. She had an elephant on which she traveled to Belchi in 1977. In 1978 when the Marathwada caste war began in Maharashtra where Baba Saheb Ambedkar belongs to, it took ten to fifteen years to change the name of a university.

We have hundreds of universities in this country. There is no equal and no parallel to this one. You cannot equate anybody with the tallest personality of Dr. Ambedkar. But this cursed country was never prepared to do it. Even today, the recognition of the erudite scholar is in question. Dr. Ambedkar himself is a history. Talking in Parliament, he said that we have built up a temple of democracy with so much of labour. What to do? Unfortunately, the devils have taken possession of it. Now, it is for us to drive out the devils and break down the temple. That was what he said.

As you all know, there was an attack on Parliament on 13th December. Several Watch and Ward people were killed on the spot. We saluted them and we accorded our salute to them. There was an inspector named Mr. Nanak Chand amongst the several people who were killed. He belonged to Haryana. Immediately after hearing the death of Mr. Nanak Chand, his mother was shocked. His mother was living in a calm, remote and useless place next to the ghettos. India is divided into two. One is for the touchables and the other is for the untouchables. Wherever you go, you come across a colony called the Ambedkar Colony. Invariably, it is a place where untouchables live. Mr. Nanak Chand’s house was in Haryana, living like that. That mother lost her son in the protection of this great Parliament. We all salute him. When she was trying to place a stone in the memory of his son, that place was denied and she was just chased away for all the service and sacrifice of her son’s life. Even in death, dignity is denied.

Dr. Ambedkar was a Member in the Rajya Sabha. He was very much worried during his late times. He was openly crying seeing the faces of the people. He was saying that if these Members opened up their mouths, much of the misery, problems, agony, the pain and pinch of the people would have been solved long back. But persons who prefer to go to Parliament, who get nominated after getting party tickets and contesting elections become lame ducks that they cannot even talk about such poor people. They do not bother about anything. Therefore, Dr. Ambedkar clearly said that the party was responsible for all this chaos beginning from 1917 when Montek Chelmsford visited India. He goes on enumerating that in 1918, the South Brough Committee was there, in 1927 the Simon Commission came and 1932 was a historic time. It was before 70 years as this year is 2003. In 1932, there was a crisis in the whole country. There was a man, a person who claimed to fight for the freedom of the people. But Dr. B.R.Ambedkar was worried about the untouchables, the tribals and the women.

Then was an agreement between the British and Dr. Ambedkar. The British conceded to it, the Christians agreed to it and the conscious people agreed to it. They came up with an award called the Communal Award, giving protection, giving safety, giving some due honour for the untouchables who are indigenous people and sons of this soil. That was resisted by the Congress Party and the Congress leader. Everybody including Shri Shyama Prasad Mukherjee, Dr. Madan Mohan Malaviya was there. There was no difference between that side and this side. But everyone together was there to resist the rights of the untouchables. So, from 1932 till his death in 1956, Dr. Ambedkar was so conscious.

If there were somebody who have to be remembered all the time in the footsteps of Dr. B.R. Ambedkar, it was Periyar, and Anna who propagated the rationalism and fought against injustice. … (Interruptions)

One can become a Councillor; one can become an MLA; one can become a Member of Parliament; one can become a Minister in the Cabinet; and can become a President of India. It is possible. When the President of India goes to Paris and stays in the Palace, in France, the country which faced the revolution long back, 200 years ago, from there a message comes, ‘untouchable pollutes the Palace, the French Palace. He has become the President of India. But even after that the pollution goes along with him wherever he goes.

Therefore, Mr. Chairman, Sir, what the dalits and the tribals in this country today demand is not some doll or help or sympathy or somebody’s mercy. No, certainly not. Shri Ram Vilas Paswan was saying that we were the builders; we were the workers and we are the sufferers. We are starving all the time. Therefore, we do not want anybody’s mercy or sympathy. What we want is the net. We know how to fish.

Therefore, Mr. Chairman, today what the dalits need is the reclamation of human personality. Nothing less than that and nothing more than that. What we need is the reclamation of human personality. You can recognise the people in Africa; you can recognise the people in Nairobi; you are very much concerned about Afghanistan; and you are certainly bothered about Baghdad. You are worried about everybody else in the world, but you are not concerned about your own neighbour who is living close by and who is living nearby. What is it all about? In the world platform, if not today, on some day you will have to answer. This country has to answer. … (Interruptions)

The other day, all the MPs consisting of Scheduled Caste/Scheduled Tribe Forum went to meet the Prime Minister. At that time I asked him a simple question. … (Interruptions) I told him: ‘We have seen several Prime Ministers. They have made promises and their promises remained only in paper. But you have not promised anything so far. Have you got any idea of doing something instead of promising? Can you do something? What is that have you

to do?’. I asked him: ‘Can you think of distributing surplus wastelands?’. … (Interruptions)

No, he did not promise. I know this. I was listening to him. I only put the question to the Prime Minister. He did not respond. He completely kept silence. Therefore, the same position is continuing even today. I do not want to mention the names of all the former Prime Ministers who had promised something but broke their promises later. But that should not continue.

Therefore, my only appeal to the Government as well as to all our colleagues is that, allow untouchables to live a decent live, recognise them as human beings. In this direction, I would like to say what is happening in my State. My State is the State where the rationalist movement gained momentum. … (Interruptions) It is a social disease. We have to come out of this. The liberation of dalits or the emancipation of dalits cannot be separated. This is a combined issue.

Sir, in my State, Madam Jayalalitha, who is ruling the State now, has spotted dalit girls from the higher secondary and higher levels and she gave them cycles to support them. … (Interruptions) The children from the remote villages will ride the cycles and go to schools and colleges. This is the position. … (Interruptions) Thank you very much.                    

SHRI A. KRISHNASWAMY (SRIPERUMBUDUR): Sir, I thank you for the opportunity given to me to participate in this discussion.

The DMK Party in Tamil Nadu has got a very lengthy history in the development of the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people in the State of Tamil Nadu. Even our party’s policy is against God. We are not against God as such. The point is that we are against the upper caste people who handle the affairs relating to God worship. Our eminent leader Periyar E.V. Ramasamy was against that aspect.

It is not only that. We are against the practice of untouchability. The respectable leader Periyar E. V. Ramasamy is called as Vaikom Veerar because he fought in the land of Kerala, in Vaikom, against the practice of untouchability. Our respectable leader Arignar Anna was the follower of Periyar. He toured everywhere in the State of Tamil Nadu and conducted inter-caste marriages to eradicate untouchability. Today, our respected leader, hon. Dr. Kalaignar M. Karunanidhi, who was the former Chief Minister of Tamil Nadu, has high regards for Dr. B.R. Ambedkar. He arranged to construct the first Memorial Hall in the State of Tamil Nadu. It is not only that. He named the Law University as Dr. Ambedkar Law University. Earlier, he fought for the cause of Maharashtra also. To change the name of the Marathwada University into that of Ambedkar University, he fought. From Tamil Nadu, we sent lakhs of telegrams to the then Governor.

Sir, we see that every year we discuss the atrocities committed on the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people. But the number of atrocities is not coming down. Day by day, the atrocities are increasing. The atrocities are not increasing on the physical plane alone. They are increasing orally and on the mental plane. They are also increasing in the official circles. So, the atrocities are taking place everywhere. To avoid this, to frame the cases, we are having the PCR Wing. It is there particularly in Tamil Nadu. As an advocate, I know about the PCR Wing. We can see the PCR Wing functioning in a small room having an Inspector and a DSP. Whenever we make a complaint, the Inspector will not register the case. To file an FIR, it will take one week’s time. Within one week, the accused person will get in touch with the higher officers and by giving some bribe, he will come out of the case. This is what is happening.

Today, I have gone through the Chennai edition of The Hindu. The news item says that one of the IPS officers has told that the State Government has given instructions not to register cases by the PCR. In the year 1989, they brought into effect the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe (Atrocities) Act. This Act is a very powerful Act. Any assault on the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people can be dealt with by this Act. The authorities concerned can register a case against any person uttering insulting words in respect of the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people under Section 10, Sub-Section 3 of the Act. But the police people do not register the case because the accused person will not get the anticipatory bail in that particular case. So, the police officials themselves are not registering the case, particularly in this type of a case. So, I would urge upon the hon. Minister to find out a new solution as to how to charge those people who are insulting the Scheduled Caste and the Scheduled Tribe people.

There should be some reforms in the PCR Wing. Then only we can take action against such people. We have to start a special course for those people who conduct trials in cases relating to atrocities committed on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. This Government has opened many Fast Track Courts. Similarly, we have to open Special Courts to try the cases relating to atrocities on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes in every district in the country, for speedy trial of cases.

Sir, in Tamil Nadu, there are two villages, namely Papparapatty and Keeripatty. In these two villages, in the election to the panchayat, the Scheduled Castes were not allowed to file nomination papers. With much effort from several leaders, in the recent elections they were allowed to file nominations and they won in the election. But immediately after winning, the upper caste people forced them to resign their posts and till today these posts are lying vacant because the upper caste people do not want a person from the Scheduled Caste to be the President of that village panchayat. In this connection, I urge upon the Government to intervene immediately through the Election Commission of India and see that the people belonging to the Scheduled Castes get elected to these posts.

Sir, in the State of Madhya Pradesh, a dalit woman was raped because she contested and won an election to a panchayat by defeating a person belonging to an upper caste. I read about this incident in the newspaper. Then, the people belonging to the Scheduled Castes are not allowed to worship in temples even today. In my constituency, in a place called Gummidipoondy, the Scheduled Caste people were not allowed to enter into a temple. So, they went to the Police Station and lodged a complaint, but the police officials refused to register the case.

With regard to promotion in services, the Scheduled Castes are suffering very much. In the year 2000, this Government brought an Amendment to the Constitution to fill up the backlog of vacancies in promotion, but we are regularly getting several complaints from the Scheduled Castes that they are not getting promotions even after the Bill has been passed by Parliament. I would request the hon. Minister to look into the matter and do the needful. Justice Shri Balakrishnan from Kerala was the Chief Justice of the Madras High Court earlier and he has not been promoted as a Supreme Court Judge for more than two years now because if a person belonging to the Scheduled Caste is promoted as a Supreme Court Judge at a young age, then he would be the Chief Justice of the Supreme Court for more than five years. This was not acceptable to the people belonging to the upper castes and so his promotion was delayed.

Sir, there is a person, namely Shri Chellapathy belonging to my constituency. Today, I received a complaint from him. He is aged about 45 years and he has been promoted as the Deputy Chief Engineer in the Integral Coach Factory at Chennai, but the General Manager of the Integral Coach Factory made some adverse remarks in his Confidential Report and so he is not being regularised in his present post, because if adverse remarks are made in the Confidential Report of a person, he cannot be regularised according to rules. Since he is belonging to a Scheduled Caste, the General Manager of the Integral Coach Factory is not willing to regularise him and he is being insulted.

So far as reservation to the Scheduled Castes are concerned, the Government should take some serious steps immediately to fill up all the vacant posts in Government service. During the tenure of the Government led by D.M.K., the then Chief Minister of Tamil Nadu, Dr. Kalaignar passed an order that the posts reserved for the Scheduled Castes would not lapse even after a certain period and only people belonging to the Scheduled Castes would be appointed to those posts so that they can enjoy the benefits given to them under the Constitution.

18.00 hrs.

In BHEL at Tiruchirappalli, one Shri Manikam has not been promoted from the rank of DGM to that of GM. Not only that, even in the Judiciary, there are several Judges. But the Judges belonging to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes are very few in the Judiciary. It is a long-pending demand. These Judges should also be appointed as per our policy about reservations.

In Tamil Nadu, the staff in the Indian Overseas Bank has been victimised since they belonged to the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. To eradicate untouchability and to avoid such discrimination in that State, the then Chief Minister Dr. Kalagnar Karunanidhi brought forward a new scheme, called ‘Samadhuvapuram’.

सभापति महोदय : अगर सदन की सहमति हो तो सभा की कार्यवाही एक घंटा बढ़ा दी जाती है क्योंकि २६ मैम्बर और बोलने वाले हैं। अगर सभी माननीय सदस्य संक्षेप में बोलेंगे तो सभी सदस्य इस डिबेट में हिस्सा ले सकेंगे वर्ना कठिनाई होगी।

SHRI A. KRISHNASWAMY : Samadhuvapuram is a colony where people belonging to all the communities are living together. To eradicate untouchability and discrimination, the then Chief Minister started that scheme in every district. But today, the present Government has removed that scheme which helped the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

I would like to put it in my own words: Vision 2020 for India. We welcome it. In that vision, proper care should also be taken about the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes.

Shri Ram Vilas Paswan said about ‘two-tumbler system’ in my State. In Kudapetty village of Dindigul district, one Shri Murugesan and another person, Shri Karuppiah, had been compelled to take urine and stool. It is very shameful.

I would like to request the hon. Minister to provide for reservation in all the categories, including Judiciary and also in the private sector.

Today, the world-famous game is cricket. Fifty-six years have passed since our Independence, but no person belonging to the Scheduled Castes has played this game. This game has been treated as a game meant for the upper castes. We too watch it on TV. We fire crackers. So, in the interest of national integration, a Scheduled Caste person should also be there in such a cricket team.

SHRI DALIT EZHILMALAI : Sir, I represent Tiruchirappalli in this House. Our friend has referred to an incident. … (Interruptions) Let me put the record straight.

सभापति महोदय : आप दो बार नहीं बोल सकते। इनका रिकार्ड में कुछ नहीं जायेगा।

...( व्यवधान)*

*NotRecorded.

*SHRI S. AJAYA KUMAR (OTTAPALAM): Sir, this House witnesses session after session, discussions regarding SC/STs, heated arguments regarding the atrocities committed against them and the ways and means to mitigate their feelings. But the fact remains that the number of such incidents is on the rise year after year. National Commission for SC/ST has prepared a report. It says that between 1989 and 1991, 2116 dalits were killed. 60565 cases were registered regarding atrocities against them. But between 1994 and 1996, 98349 cases got registered out of which 38483 cases were incidents against SC/STs. During 1995 to 2000, 3449 dalits were brutally murdered. 1034 dalit women were raped. This shows that each day about 100 dalits are attacked in one way or other. But why is this rise in atrocities against dalits despite these discussions voicing our concerns, despite the laws safeguarding the interest of dalits and despite the various Commissions on SC/STs? Let us look into the statistics. In our country in three States the data shows that the violence against the dalits is consistently showing a steep slide. These are the States where land reforms were implemented and the credit goes to Kerala, Bengal and Tripura. So the need of the hour is not words, not compassionate speeches but action. I would like to know whether this Government has the will to give land to these landless SC/ST people. I would like to know from them through you Sir, whether this BJP led Government would show such a gesture.

Instead of doing such positive things, what are they doing today? We have an array of religions and beliefs in our country. The BJP led Government is playing politics to continue in power by inciting volatile communal feelings, by pepping up pseudo-national feelings and playing one against another in the name of religion. Let me know whether this Government would give land to the dalits, to the SC/ST people. Moreover the disinvestment policy of this Government has resulted in the denial of reserved employment opportunities to these discriminated groups. I would like to know whether this Government would take steps to ensure job reservation in these disinvested organisations also. Instead of taking such positive steps this Government is using temples and mosques to continue in power. Sir, even today in many States and rural areas the SC/ST people are denied entry to temples and other places of worship. In the construction of your temples, your Ram temples – you exploit the services of dalits who are never even considered for becoming a priest in those temples. Will the VHP or the BJP ever consider a Sanskrit dalit scholar who could recite all the so called Sanskrit shlokas as your priest in your Ram temple in Ayodhya? Will you ever show the courage and magnanimity to do that? Something next to impossible! On the other hand they will sponsor the lynching of five tribals in the State of Haryana. In a nutshell, this Government clandestinely propagate the ideals of ‘Manu’. In Andhra and Tamil Nadu, untouchability still exist in its own various manifestations. But we the people of Kerala could say it with pride that we have grown above all such casteist discriminations. This was made possible by the land reform of the revolutionary Communist governance of Kerala which came to power through ballot in 1957. Unfortunately in the last 2 years the atrocities against SC/STs in the State is on the rise. We are ashamed to state that in the last one year about 100 dalits got killed in our State. Our Prime Minister in his visit to Kerala hailed it as God’s own country. It is not only a land of Gods, ours is a land of struggles too. Through these struggles we wiped away the social evils like untouchability from our society. But the existing Government in Kerala under the banner of Congress

… (Interruptions)

SHRI KODIKUNNIL SURESH (ADOOR): Mr. Chairman, Sir, he is misleading the House. … (Interruptions) What he says is totally wrong. He is misleading the House. … (Interruptions) Sir, how can you allow him to speak like this? This allegation is totally false. … (Interruptions)

SHRI S. AJAYA KUMAR: I do agree that Congress with a legacy of about 45 years of ruling experience has done a lot to the overall development of this country. It was a party which made a dalit as the President of this country for the first time. It was a party which let a Scheduled Caste person to be the Speaker of this House. It had a dalit as its party president. At the same time I am constrained to say that the Antony Government has brought shame to that party by killing a Tribal in a police firing perhaps for the first time in the history of this country. No waters can ever wash off the stains of such a heinous crime from the robes of Congress party. This happened in Muthanga in Wynad in Kerala. The tribals who have been on a struggle for a piece of land had encroached into forest land and have been living there for about 40 days. Without any provocation the Antony Government gave a green signal to the forest officials to evict them through any means. In the ensuing struggle these tribals were fired at and brutally murdered by the police forces. The Congress Minister of SC/ST in Kerala Shri Kuttappan himself had said in a press briefing that about 5 dalits were killed in the incident. Later their bodies were charred and buried by the police. A lot of tribals are still missing. Among those 141 missing, even infant babies are there. About 40 children below the age of 15 are put behind bars. Even then demand for a judicial probe is denied.

SHRI KODIKUNNIL SURESH : Sir, 10 women were raped in West Bengal, which is ruled by the Left Front. What is your reaction to that? … (Interruptions) If your Government is always the champion of women, what is your reaction? Why are you keeping quiet? … (Interruptions)

SHRI S. AJAYA KUMAR: Hence I would like to urge upon the Congress President Mrs Sonia Gandhi and Mr Shivraj Patil to intervene and to make Mr Antony to order for a judicial enquiry into the matter. At the same time the Central

Government should immediately look into the matter and the hon. Minister for Tribal Affairs Shri Jual Oram should see to it that a Joint Parliamentary Committee is constituted and they visit Nuthanga to enquire into the incident.

With these words, I conclude.  

*Translation of the speech originally delivered in Malayalam.      

श्री शीशराम सिंह रवि (बिजनौर): माननीय सभापति जी, आज पूरे सदन में दलितों की समस्याओं के ऊपर काफी समय से चर्चा चल रही है। इस चर्चा में भाग लेने के लिए आपने मुझे मौका दिया, उसके लिए मैं आपका ह्ृदय से आभारी हूं। मेरे से पूर्व सभी सम्मानित सांसदों ने देश के दलितों पर, प्रदेशों में वभिन्न स्थानों पर अनेक प्रकार की घटनाओं का विवरण दिया है। इस विवरण से सदन यह जरूर महसूस करता है कि वास्तव में इस दुनिया में सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देश भारत में दलितों को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए, उनको सम्मान मिलना चाहिए और उनकी आर्थिक सम्पन्नता को बढ़ावा मिलना चाहिए। यह पूरे सदन की भावना है।

जब यह देश आजाद हुआ तो इस देश की आजादी में दलितों को बराबरी पर लाने के लिए उस समय संविधान सभा के अध्यक्ष और हमारे भगवान डा. अम्बेडकर ने दस साल में दलितों को बराबरी का दर्जा देने का काम किया। उसके लिए उन्होंने चाहता था कि दस वर्षों में हम आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से इनको बराबरी पर ले आएंगे। परंतु उस समय कोई भी सरकार ने इसके लिए प्रयास नहीं किया। १९५० और १९६० के बीच में कांग्रेस सरकार ने दलितों के हितों के लिए कोई भी कदम नहीं उठाया। एक कदम यह उठाया कि एक तिहाई भूमि पर सहकारी फार्मिंग सोसाइटी के नाम पर टाटा, बिड़ला और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने अपने नाम पर करके उस पर कब्जा कर लिया। वह इसलिए किया कि कहीं वह ग्राम समाज की भूमि, जो बंजर और बेकार थी, दलितों में न बांट दी जाए और वे उस पर मेहनत करके धनवान न हो जाएं, हमारी बराबरी पर न आ जाएं। अम्बेडकर जी ने कहा था कि कितने भी कानून पास करते रहो, यदि शासक की नीयत सही नहीं है, तो नीतियां कितनी भी बनती रहें, उससे काम चलने वाला नहीं है।

१९६५ में उस सहकारी फार्मिंग सोसाइटी के रजिस्ट्रेशन पर पाबंदी लगा दी गई। पूरे देश में सभी राज्यों में एक आम किसान को ६० बीघा, १२ एकड़ से ज्यादा भूमि रखने पर सीलिंग लागू कर दी गई। उन फार्मिंग सोसाइटीज के नाम पर कोई भी सीलिंग या उनके कर से बचने की रोकथाम के लिए कोई भी तरीका लागू नहीं हुआ। यदि सभी राजनीतिक दल मिलकर और यह पूरा सदन तय करे कि इन फार्मिंग सोसाइटीज को जो फर्जी नाम पर इतनी भूमि लिए बैठी हैं, उसको खत्म करके वह भूमि दलितों में, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों में बांट दी जाए तो मैं समझता हूं कि इससे इनकी गरीबी दूर हो जाएगी। दुनिया में अगर कोई सबसे बड़ा रोग है तो वह गरीबी है। गरीबी मिटाने के लिए हम लोगों को संकल्प लेना पड़ेगा। कांग्रेस पार्टी की पूर्व सरकारों ने दलितों का उत्थान करने के नाम पर एक साइकल देने की, एक सिलाई मशीन देने की और कच्चा मकान बनाने की बात कही थी। उस समय न तो एस.आर.वाई. थी, न ज.आर.वाई. थी और न ही इंदिरा आवास योजना थी। १९७७ के पहले ऐसी कोई भी योजना नहीं चली। १९७७ में जनता पार्टी की सरकार आई। उसने अंत्योदय योजना चलाई और बड़े पैमाने पर दलितों का विकास किया। परंतु कांग्रेस पार्टी ने उस सरकार को ढाई साल भी रहने नहीं दिया इसलिए कि कहीं यह सरकार पांच साल या दस साल चल गई तो यह सरकार इस देश के दलितों को हमारी बराबरी पर लाकर खड़ा कर देगी।

उस समय रोजगार देने की स्कीम चली, योजना चली। सन् १९७७ में जनता दल की सरकार ने गरीबों और दलितों के विकास का काम किया, गरीबों के उत्थान का काम किया। लेकिन कांग्रेस की सरकार ने उसको ढाई साल के बाद रहने नहीं दिया। ढाई साल के बाद कांग्रेस ने वह सरकार तोड़ दी। कांग्रेस को डर था कि अगर यह सरकार पांच-दस साल चल गयी तो गरीबों को अमीरों के बराबर लाकर खड़ा कर देगी। उसके बाद कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई लेकिन गरीबों के लिए बराबरी की कोई योजना उन्होंने नहीं बनाई। आरक्षण के नाम पर टुकड़ा देकर अपने पीछे गरीबों को चलाने की बात उन्होंने की। लेकिन कभी भी गरीबों को, दलितों को बराबर लाने की कोई बात उन्होंने नहीं की और न ही उस पर विचार किया। सन् १९८९ में फिर जनता दल की सरकार बनी और उस सरकार में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी भी शामिल थे।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Sir, I am on a point of order. I do not want to intervene. I am only raising a point of order. … (Interruptions) रुल मैं ढूंढ निकालूंगा, आप रुलिंग दीजिए। Sir,I would like to know whether the discussion is on atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes or on what the Congress has done or not done. Please decide that. After that, I would sit down. … (Interruptions)

श्री रामदास आठवले :.यहां राजनैतिक डिस्कशन नहीं होना चाहिए कि इस पार्टी ने यह किया, उस पार्टी ने वह किया। आप अपनी बात कहिये।

सभापति महोदय : आप बैठ जाइये।

श्री शीशराम सिंह रवि : सर, १९८० में १० साल के लिए आरक्षण बढ़ाया गया, उस समय भी माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी सरकार में थे। …( व्यवधान)आपको इतिहास के पन्नों को पलटना पड़ेगा। आपको याद करना पड़ेगा कि गरीबों के साथ अत्याचार हुआ है।…( व्यवधान)आठवले जी, आप थोड़ा अध्ययन कीजिए।

सभापति महोदय : दलितों पर अत्याचार विषय है, उसी पर बोलिये।

श्री शीशराम सिंह रवि : मैं दलितों पर अत्याचार की बात ही कर रहा हूं। जब आरक्षण दस साल के लिए बढ़ाया गया, उस समय भी माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी सरकार में थे और सन् २००० में जब आरक्षण बढ़ाया गया, उस समय भी माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी सरकार में थे। आपने कहा कि ये मनुवादी लोग हैं। मैं सिद्ध करना चाहता हूं कि मनुवादी लोग कांग्रेस में हैं।…( व्यवधान)भाजपा ने तो तीसरी बार दलित महिला को मुख्यमंत्री बनाया है।…( व्यवधान)दलितों पर अत्याचार की बात हो रही है। …( व्यवधान)मैं भाजपा की वकालत नहीं कर रहा हूं, मैं शोषण पर बोल रहा हूं। आर्थिक असमानता ही शोषण और अत्याचार की जड़ है। आज गरीब आदमी को रोजी-रोटी नहीं मिल रही है और गरीब आदमी को अपनी पैंशन के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही है। आज शोषण क्यों हो रहा है उसकी जड़ में जाने की आवश्यकता है। गरीबी के कारण उन पर अत्याचार हो रहे हैं। मेरे से पूर्व के वक्ताओं ने बहुत सी बातें कही हैं। मैं अपनी बात बड़ी ईमानदारी के साथ कह रहा हूं और यही बात बहुत से माननीय सदस्यों ने भी कही है कि जो सहयोग दलितों के साथ एनडीए की सरकार ने किया है वह किसी सरकार ने नहीं किया। अनुसूचित जाति और जनजाति के एनडीए सरकार में ७२ सांसद हैं। एनडीए की सरकार गरीबों के हित में काम कर रही है और मैं भी बहुत गरीबी से निकलकर आया हूं।

मुझ से पूछिये क्योंकि मैं गरीबी में पैदा हुआ। गरीबों पर क्या अत्याचार होता है, मैं जानता हूं। यदि मैं गरीब नहीं होता तो आगे बढ़ता। यह सारी जड़ कांग्रेस ने बोई है। इसलिये मैंने पिछले ५० साल की बात उनके बारे में कही है। आज मध्य प्रदेश में अत्याचार हो रहे हैं, राजस्थान में अत्याचार हो रहे हैं, आज बिहार में अत्याचार हो रहे हैं क्योंकि वहां कांग्रेस की सरकारें हैं। इसके लिये कानून बनाना पड़ेगा। सभापति महोदय, मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूं कि दलितों के लिये इस तरह के कानून बनने चाहिये जहां उन्हें अच्छा इन्साफ मिल सके। आज देश को आजाद हुये ५६ साल हो गये हैं लेकिन कुछ गिने-चुने दलित ही लाभ उठा रहे हैं। जो गरीबी रेखा से नीचे वाले लोग हैं, वे इसका लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इसका सही रूप से निर्णय होना चाहिये। यदि कोई ५ या १० साल तक एम.पी. या एम.एल.ए. बन जाता है या कोई आई.ए.एस. या आई.पी.एस. हो जाता है तो उसकी सन्तान को उस आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिये, केवल गरीब को मिलना चाहिये। मेरा सरकार से अनुरोध है कि इसके लिये कानून लाने की आवश्यकता है। ऐसा न हो फलां एक्ट देखा जाये बल्कि उन पर अत्याचार रोकने के लिये क्या क्या कदम उठाने चाहिये, इसके बारे में सरकार को सोचना चाहिये।

सभापति महोदय, हमारे देश में पेट्रोल पम्प, खाद, गैस एजेंसी हैं, वहां २१ प्रतिशत आरक्षण दलितों के दिया जाना चाहिये। इससे न केवल उन गरीब लोगों की बेरोजगारी दूर होगी बल्कि उन पर अत्याचार होने बंद हो जायेंगे। न्यायपालिका में भी दलितों के लिये २१ प्रतिशत आरक्षण होना चाहिये। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपना भाषण समाप्त करता हूं।    

कुंवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उ.प्र.) : सभापति महोदय, मैं आपका आभारी हूं कि आपने मुझे दलितों पर हो रहे उत्पीड़न पर हो रही चर्चा में भाग लेने की अनुमति प्रदान की है। समाजवादी पार्टी समतामूलक समाज की स्थापना के लिये प्रतिबद्ध है। समाजवादी पार्टी सामाजिक परिवर्तन के आन्दोलन की ध्वजवाहक है।

सभापति महोदय, अभी सदन के अंदर बहुत से माननीय सदस्यों द्वारा रखे गये विचारों को मैंने सुना। इन विचारों को सुनने के बाद दो विचार सामने उभरकर आये। एक तरफ श्री रामविलास पासवान, श्री रामजी लाल सुमन और दूसरी तरफ श्री मुन्नी लाल जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक सेवामुक्त सांसद और मंत्रि परिषद् को सुशोभित कर चुके, आते हैं। उनकी व्यथा को सुनने के पश्चात् मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि आज भी दलित वर्ग के लोग उच्च पदों पर जाने के बावजूद उस दर्द से उभर नहीं पाये हैं। उनकी इस व्यथा को देखते हुये यदि सदन और सरकार दोनों इसकी गम्भीरता को ग्रहण नहीं करते तो मैं समझता हूं कि दलित उत्पीड़न के संदर्भ में जो चर्चा सदन में हो रही है, उसका कोई अर्थ नहीं रह जायेगा।

सभापति महोदय, सामाजिक परिवर्तन के दौर में जब मंडल कमीशन की संस्तुतियों को इस देश में लागू किया गया तो सब से पहले समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सामाजिक परिवर्तन के इस आन्दोलन को मूर्त्त रूप प्रदान किया था। उन संस्तुतियों को लागू करने के बाद इस देश में जो भूचाल आया, उस भूचाल से न केवल यह सदन बल्कि सारा देश अवगत है। लगता था कि पूरी व्यवस्था चरमरा जायेगी और जिन लोगों ने सामाजिक परिवर्तन के इस आन्दोलन में बखेड़ा पैदा करने का काम किया, यदि उस दिशा में काम किया होता या उनके खिलाफ लामबंद हुये होते तो शायद यह कदम उठाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मैं बड़े ही विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि यह देश १९४७ में आजाद हुआ जिसे आज ५५ साल से ज्यादा हो गये हैं। यह कहना कि देश की आजादी के समय यह परिवर्तन की बयार बही तो मैं इसे सही नहीं समझता हूं।

आज से हजारों साल पहले इस देश में गौतम बुद्ध पैदा हुए। गौतम बुद्ध एक राजा के घर पैदा हुए। जब उन्होंने समाज में छुआछूत, भेदभाव, पाखंड, कुरीतियां, अन्याय और विषमता को देखा तो उनका मन द्रवित हो उठा। उन्होंने राज-पाठ त्याग कर मनुष्य को मनुष्य बनाने के लिए, मानवता का संदेश देने के लिए एक मध्य मार्ग का रास्ता अपनाया। इतिहास गवाह है कि गौतम बुद्ध के रास्ते पर चीन, जापान, थाईलैंड, कोरिया, बैंकाक आदि देश चले। आज वे मुल्क जिन्होंने बुद्ध के रास्ते को अंगीकार किया, प्रगति की दौड़ में वे कहां से कहां पहुंच गये और हम कहां खड़े हैं। यदि इस पर हम विचार मंथन करे तो हमें निश्चित तौर पर यह लगेगा कि गौतम बुद्ध के रास्ते का यदि हमने हजारों वर्ष पूर्व अनुसरण किया होता तो आज देश को इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। आज जो लोग सामाजिक आंदोलन में सामाजिक परिवर्तन के लिए डा.अम्बेडकर, श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्री मुलायम सिंह यादव, श्री लालू यादव, श्री रामविलास पासवान और श्री जवाहर लाल नेहरू को कोसने का काम कर रहे हैं, उन्हें मैं कहना चाहता हूं कि यह सामाजिक परिवर्तन न केवल हिन्दुस्तान में हुआ, बल्कि पूरी दुनिया में हुआ है। यदि हम अमरीका के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो वहां भी काले और गोरों को बीच में लड़ाई थी। मार्टिन लूथर किंग और अब्राहम लिंकन ने काले लोगों का नेतृत्व किया और इतिहास गवाह है कि जब अमरीका में कालों को गोरों के बराबर अधिकार मिला, तब अमरीका दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आया।

सभापति महोदय, इसी तरह से दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर यदि हम नजर डालें तो दक्षिण अफ्रीका में जब महात्मा गांधी यहां से बैरिस्टर बनकर वहां भारतीयों का उद्धार करने के लिए गये थे और महात्मा गांधी स्वयं वहां रंगभेद की नीति का शिकार हुए तब उन्हें उस दर्द का अहसास हुआ और मोहनदास करमचंद गांधी उस दर्द की अनुभूति के पश्चात् महात्मा गांधी के रूप में उभरकर आये। मैं निश्चित तौर पर इस मान्यता का हूं कि गौतम बुद्ध के विचारों का प्रभाव डा.अम्बेडकर और गांधी जी के ऊपर सर्वाधिक पड़ा। अगर गौतम बुद्ध के सच्चे अनुयायी के रूप में कोई व्यक्ति हिंदुस्तान में उभर कर आये तो दो महान विभूतियां डा.भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गांधी थे। महात्मा गांधी ने सत्य, करूणा और अहिंसा के संदेश को गौतम बुद्ध से प्राप्त किया और डा.अम्बेडकर ने समाज में जो कुरीतियां, असमानता और सामाजिक विषमता थी, उनके खिलाफ लड़ने के लिए गौतम बुद्ध के मार्ग को अपनाने का कार्य किया। मैं बड़ी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि यदि आप इस सवाल पर ईमानदारी से बहस करना चाहते हैं तो निश्चित तौर पर हमें गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और डा.अम्बेडकर के विचारों को अपनाना पड़ेगा और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में जिन-जिन लोगों ने अवरोध पैदा किये हैं, उन ताकतों को बेनकाब करना होगा। तभी हम सामाजिक आंदोलन की दिशा को एक नई गति दे सकते हैं।

सभापति महोदय, अभी श्री दलित इजिलमलाई ने कहा कि भाजपा के अंदर जो अनुसूचित जाति, जनजाति के संसद सदस्य हैं, उनकी सदस्यता बढ़ती चली जा रही है। यह कड़वी बात है, लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि जो आपके शोषक रहे हैं, उन शोषक ताकतों के बल पर ही आपकी संख्या बढ़ रही है। आपके समाज के बल पर आपकी संख्या नहीं बढ़ रही है। यह मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहता हूं। श्री रामजी लाल सुमन और श्री रामविलास पासवान के वक्तव्यों के द्वारा यह फर्क दिखाई देता है। श्री मुनिलाल जी और दूसरे सदस्यों के बीच के इस फर्क को समझने की कोशिश कीजिए। आज भी मेरी अपनी मान्यता है कि देश की ५५ साल की आजादी के बाद दलित बस्तियों की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। आज वास्तविक रूप से आप दलित बस्तियों का अध्ययन करने के लिए जाएं तो दलित समाज का व्यक्ति वहीं का वहीं है। वह आज भी उसी कुंठा को भुगतने के लिए मजबूर है, उसी पीढ़ा का अहसास करने के लिए मजबूर है।

अभी पिछले दिनों जब छ: वर्ष से १४ वर्ष के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का विधेयक सदन में आया था तो उस समय भी मैंने कहा था कि यदि सभ्य समाज का निर्माण करना चाहते हो तो बच्चा जब मां के गर्भ में आये, यानी जीरो से लेकर उसके बालिग होने तक, जब तक सरकार उसके पालन-पोषण और शिक्षा का इंतजाम नहीं करेगी, तब तक हम सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकते। एक दलित का बच्चा, पिछड़े वर्ग का बच्चा जब मां के गर्भ में पलता है तो उसे उसी कुंठा का शिकार होना पड़ता है और समाज का अपमान भुगतना पड़ता है। आप जरा उस दर्द को महसूस करने का कार्य कीजिए। महाभारत काल के अभिमन्यु का उदाहरण इस बात का गवाह है कि जब अभिमन्यु अपनी मां के गर्भ में था, तभी उसे अपने पिता से युद्ध की दीक्षा प्राप्त हुई थी। यह उद्धरण इस बात का संकेत देता है कि जब बच्चा अपनी मां के गर्भ में पलता है तो सामाजिक और पारिवारिक वातावरण का उसके मन-मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। यदि आप एक सभ्य समाज का निर्माण करना चाहते हैं तो आप अधिक खर्च की परवाह मत करो, आज संकल्प लो कि हम जीरों से लेकर १८ वर्ष तक के बच्चों को पालन-पोषण और मुफ्त शिक्षा देने का इंतजाम करेंगे, तभी हम सभ्य समाज का निर्माण कर सकते हैं।

अभी श्री दलित इजिलमलाई साहब ने आर्थिक, सामाजिक समता और आर्थिक लोकतंत्र की बात कही है, मैं उनकी बात का समर्थन करता हूं। लेकिन यह आर्थिक लोकतंत्र कैसे आयेगा। जिस लोकतंत्र के अंदर भ्रष्टाचार सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता चला जा रहा है, उसमें यदि आप आर्थिक बराबरी की बात करेंगे, तो यह कैसे होगा।

अभी जमीन बांटने की बात कही गई। श्री शीशराम सिंह रवि जी यहां नहीं है। मैं एक कृषक परिवार से आता हूं । मैं जमीन के दर्द को समझता हूं।

आपने ज़मीन की अधिकतम सीमा भूमि हदबंदी कानून के अंतर्गत १८ एकड़ उत्तर प्रदेश में रखी है। अन्य प्रदेशों की बात मैं नहीं जानता। जब तक धन की सीमा निर्धारित नहीं करेंगे, तब तक आर्थिक बराबरी नहीं आ सकती है। आर्थिक बराबरी लाने के लिए धन की सीमा निर्धारित करें। यदि एक-दो एकड़ ज़मीन आबंटित करने से किसी दलित के जीवन में परिवर्तन आ जाता है तो मैं अपनी एक-दो एकड़ जमीन एक दलित परिवार को देने के लिए तैयार हूँ। उसका प्रयोग करके देखिये कि क्या उस दो एकड़ जमीन से वह दलित अपने परिवार जीविका चला सकता है। मैं कहना चाहता हूँ कि समाज के हर क्षेत्र में समाज के पिछड़ों और दलितों को बराबरी का हक देना पड़ेगा, तभी जाकर पिछड़े और दलित समाज की बराबरी की दौड़ में भागीदार हो सकते हैं।

जहां तक समाजवादी पार्टी का सवाल है, रामविलास पासवान जी ने एक बात कही थी कि मुलायम सिंह यादव जी ने दलित अत्याचार निवारण अधनियम का विरोध किया था। मैं सदन के संज्ञान में यह लाना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश में सबसे पहले दलित अत्याचार निवारण अधनियम का प्रयोग माननीय मुलायम सिंह यादव जी के प्रथम मुख्य मंत्रित्व काल में हुआ था। सबसे पहले हमने उत्तर प्रदेश में अंबेडकर ग्राम योजनाओं को मूर्त रूप देने का काम किया था। सबसे पहले हमने उत्तर प्रदेश में मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने के लिए सार्थक दिशा में पहल करने का काम किया था। हमने इस बात पर विरोध किया था कि जब दलित उत्पीड़न की घटनाओं का दुरुपयोग होने लगा और समाज की ऊंची जाति के लोगों ने दलितों को मोहरा बनाकर दलितों के खिलाफ इस्तेमाल करने का काम किया तो समाज में बगावत की चिंगारी फैलने लगी और हमें लगा कि अगर स्थिति को नहीं रोका गया तो समाज धू-धू करके जलने लगेगा। तब समाजवादी पार्टी ने दलित उत्पीड़न का विरोध करने का काम किया था और यह कहा था कि यदि इसका दुरुपयोग नहीं रुका तो समाजवादी पार्टी सड़क से लेकर सदन तक इस लड़ाई को जारी रखने का काम करेगी। मैं बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि आज़ादी के पश्चात् आज चाहे पिछड़े वर्ग के लोग हों चाहे दलित वर्ग के लोग हों…( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान: अब तो दुरुपयोग हो रहा है, अब क्यों नहीं बोल रहे हैं? …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह: निश्चित तौर पर अब भी बोल रहे हैं। मैंने अभी कहा है। आदरणीय राम विलास जी बैठे हुए हैं। आपने आंकड़े दिये हैं। मैं पांच उद्धरण आपको दूँगा। अगर उनमें दलित उत्पीड़न की घटनाएं दलितों के साथ सही साबित हो जाएंगी तो मैं संसद सदस्य के पद से इस्तीफा दे दूँगा। …( व्यवधान)मैंने मायावती का नाम नहीं लिया है। क्यों आप मायावती के नाम पर चिढ़ रहे हैं। मैं मायावती का नाम ही नहीं ले रहा हूँ।…( व्यवधान)मैं चुनकर आना ही नहीं चाहता, जिताने की बात छोड़ दो। मेरा इस सदन से मोह भंग हो गया है। …( व्यवधान)

श्री राम विलास पासवान: मैं यह बात रिकार्ड पर लाना चाहता हूँ कि मैंने यह कभी नहीं कहा कि मुलायम सिंह यादव जी ने दलित एक्ट का विरोध किया था। मैंने कहा था कि जब यह कहा जा रहा था कि मुलायम सिंह यादव जी दलित एक्ट का विरोध कर रहे हैं और जिन नेताओं के द्वारा कहा जा रहा था कि वे नेता खुलकर विरोध कर रहे हैं तो उसका हमने डॉक्यूमेंट्री प्रूफ दिया था और होम मनिस्टर जब जवाब देंगे तो बताएंगे कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो क्लॉज़ बची हैं मर्डर और रेप की, इसके अलावा जो भी मामला था दलित एक्ट में, सबको बाय ऑर्डर खत्म करने का काम किया गया है। यदि कोई दलित की मुख्य मंत्री दलित एक्ट के खिलाफ काम करे और उसको खत्म करने का काम करे तो वह अच्छा हो जाए और यदि दूसरा कोई कुछ नहीं करे तो उसको बदनाम करें, वह ठीक नहीं है, यह मैंने कहा था।

कुंवर अखिलेश सिंह: धन्यवाद। रामविलास जी ने अपने पक्ष को स्पष्ट किया और यदि कोई भ्रांति थी तो उसके लिए मैं उनसे क्षमा चाहता हूँ।

सभापति महोदय : उन्होंने स्पष्ट किया, अब आप कनक्लूड कीजिए।

कुंवर अखिलेश सिंह: मुझे दो मिनट का समय दीजिए।

माननीय सभापति जी, अभी जब हमारे साथियों ने इस सदन के अंदर दलित उत्पीड़न की घटनाओं का उल्लेख किया तो निश्चित तौर पर उन्होंने एक दूसरे को आरोपित करने का काम किया लेकिन बड़ी ईमानदारी के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि समाज के दलित वर्ग के लोगों, पिछड़े और वंचित वर्ग के लोगों, समाज के परिवर्तन के आंदोलन की दिशा को किन लोगों ने गलत दिशा देने का काम किया, किन लोगों ने मंडल की राजनीति को समाप्त करने के लिए कमंडल की राजनीति को प्रभावति करने का काम किया, आज आप यदि उनकी गोद में बैठकर न्याय की उम्मीद करते हैं तो मैं बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि आप मुगालते और भ्रम की स्थिति में हैं। मैं बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूँ कि आज जिन लोगों ने इनके भविष्य पर कुठाराघात किया है, वर्तमान पर कुठाराघात किया है …( व्यवधान)

सभापति महोदय, आज ये उनकी ही गोदी में बैठकर न्याय की उम्मीद करते हैं, तो यह मृगतृष्णा के समान है। आज ये कहते हैं कि न्यायालय के अंदर आरक्षण होना चाहिए, उद्योग के क्षेत्र में आरक्षण होना चाहिए। विपक्ष तो लगातार यह मांग दोहराता जा रहा है कि वनिवेश प्रक्रिया के माध्यम से सार्वजनिक कल-कारखाने बन्द करते जा रहे हैं और निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों के लोगों को आरक्षण देने की कोई व्यवस्था आपने नहीं की है, इसलिए उनके लिए अवसर तो वैसे ही घटते जा रहे हैं। इससे समाज के दलित एवं पिछड़े लोगों का बहुत नुकसान हो रहा है क्योंकि आज तक समाज में ये उस व्यवस्था को लागू नहीं कर पाए हैं। …( व्यवधान)

महोदय, मैं आपके ध्यान में लाना चाहता हूं कि हमने मुलायम सिंह यादव जी जब उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे, तो प्रदेश के मैडीकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में समाज के पिछड़ों और दलितों के लिए ५० प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को सुनिश्चित किया था। यदि आप चाहते हैं कि देश में सामाजिक न्याय हो, तो आप समाजवादी पार्टी का साथ दीजिए। मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि यदि आप समाजवादी पार्टी का साथ देंगे, तो निश्चित रूप से आपको न्याय मिलेगा।…( व्यवधान)

सभापति महोदय, मैं आपके माध्यम से बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूं - उधर बैठे लोगों ने कहा कि हमने एक दलित महिला को तीन बार मुख्य मंत्री बनाया …( व्यवधान)मैं अमर सिंह जी के बारे में बताना चाहता हूं कि वे कोई टाटा या बिड़ला के बेटे नहीं हैं। वे कर्म प्रधान पुरुष हैं। इन लोगों को हमारे बारे में कोई शंका है, इसलिए मैं इनकी शंकाओं का समाधान कर रहा हूं।

सभापति जी, अभी उस तरफ से कहा गया कि हमने दलित की बेटी को तीन बार मुख्य मंत्री बनाया। मैं बताना चाहता हूं कि आपने पहली बार चार महीने के लिए मुख्य मंत्री बनाया और चार महीने के बाद उनको हटा दिया। दूसरी बार आपने छ: महीने के लिए मुख्य मंत्री बनाया और उसके बाद उनके दल को आपने तोड़कर खंड-खंड कर दिया और अब आपने तीसरी बार उन्हें मुख्य मंत्री बनाया है, तो कोई इसलिए नहीं बनाया कि वे दलित हैं या आपका उनके प्रति कोई प्रेम है, बल्कि आपने उन्हें मजबूरी में मुख्य मंत्री बनाया है क्योंकि आपको समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं हमारे नेता माननीय मुलायम सिंह जी का बहुत डर था। आपने मुलायम सिंह जी को मुख्य मंत्री बनने से रोकने के लिए ही मायावती जी को मुख्य मंत्री बनाया है। अब मायावती आपके गले की हड््डी बन गई हैं। आप न इस हड्डी को निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार का जो नया कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है, वह निश्चितरूप से आपको रसातल में ले जाकर डुबाएगा। मैं इतना ही बोलकर चूंकि आप मुझे बार-बार बैठने का इशारा कर रहे हैं, इसलिए आपको धन्यवाद देते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री अशोक प्रधान) : सभापति जी, मैं माननीय अखिलेश जी से आपके माध्यम से कहना चाहता हूं कि हमने तो उन्हें तीन बार मुख्य मंत्री बना दिया, भले ही जैसा आपने हिसाब बताया कि पहली बार चार महीने के लिए और दूसरी बार छ: महीने के लिए, लेकिन जब मायावती जी ने आपके मुलायम सिंह जी को मुख्य मंत्री बनाया तो मुलायम सिंह जी ने गैस्ट हाउस में उनके साथ कैसा बर्ताव किया, यह भी आपको ध्यान होगी और तब उनकी स्थिति क्या होगी। …( व्यवधान)

श्री रतिलाल कालीदास वर्मा : जब मायावती का नाम आता है, तो आपकी मति क्यों बिगड़ जाती है। …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह: सभापति महोदय, मैं माननीय अशोक प्रधान जी के ध्यान में लाना चाहता हूं कि माननीय मुलायम सिंह जी को उस समय मायावती जी ने नहीं बनाया बल्कि श्री काशी राम राणा जी ने मुख्य मंत्री बनने दिया था, लेकिन अब काशी राम राणा जी पृष्ठभूमि में चले गए हैं और मायावती जी आगे आ गई हैं।…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : सभापति जी, मैं आपके माध्यम से अशोक प्रधान जी से कहना चाहता हूं कि भगवान उन्हें सद्बुद्धि दे कि वे जल्दी से मायावती जी से अपना समझौता समाप्त कर लें, नहीं तो कल चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा। …( व्यवधान)

DR. BIKRAM SARKAR (PANSKURA): Mr. Chairman, Sir, I am grateful to you for having given me this opportunity to participate in the discussion on atrocities on dalits.

I have had the opportunity of hearing a large number of hon. Members on both the sides and I feel very sad that we are doing politics and nothing but politics on the issue of atrocities on dalits. The fact remains, irrespective of the party in power in the last 55 years, that the cause of the development of Scheduled Castes and Scheduled Tribes got the lowest priority, if at all it got any priority. If you look at any of the number of Starred Questions - I am sorry, Sir, to tell you but it is a fact - you would not find a single Starred Question on the development of Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the last so many years, all Unstarred Questions.

It may be by accident or by a coincidence that all the Questions relating to the welfare of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes have been only Unstarred Questions. Some of the so-called important things do come up for discussion.

I am coming to the seriousness of the business of Parliament, of which I happen to be a Member second time. The Reports of the then Commission for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes and after the formation of the National Commission on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes which has been given a constitutional status, have all been neglected like anything. Can anybody enlighten me as to which Report of the National Commission on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes was last discussed on the floor of this House?

SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): It was discussed last time in 1988.

DR. BIKRAM SARKAR : Now it is 2003.

This shows the mind block irrespective of the party one belongs to. I do not like to do politics with this. I had an opportunity, being a Scheduled Caste, holding the charge of a Joint Secretary in the Ministry of Home Affairs for five years from 1982 to 1987 dealing with this particular subject. I know a to z of this subject. I have seen one thing, and I am sorry to say that there is no change.

But I must give the credit to Madam Indira Gandhi. She was the Prime Minister who, in 1980-81, came up with the idea of Special Component Plan for the Scheduled Castes. It was a grand idea. I did work on that.

SHRI RAMDAS ATHAWALE : It was in 1977.

DR. BIKRAM SARKAR : But it took shape in 1980-81. It was said that: ‘we do not want any charity.’ The Scheduled Castes want only their due share, their demand. They constitute more than one-fourth of the total population of India. Right from the First Five Year Plan, so much was provided for the development of the Scheduled Castes. But, Mr. Minister, for the development of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes, nothing had happened. Even today, nothing has changed because of the mind block.

Sir, we had the Untouchability Abolition Act. But nothing happened. Then, it was thought in 1976 that the change of name to "Protection of Civil Rights Act" would do miracles. But it did not do it.

Sir, I had an occasion to administer that. In everything, all the hon. Members incharge of that thing in those days, and even today, the Members incharge say that ‘it is a State matter; it is a public order; and it is a State subject. Therefore, it is depending on the States and the States will do whatever is necessary. We are monitoring.’

Let me give you certain figures of monitoring. In the Report of 2000 of the National Commission on the SCs and STs, there is a mention of a statement showing disposal of cases by courts and the pendancy of the cases for the year 1996… (Interruptions)

कुंवर अखिलेश सिंह: सुषमा जी, क्या आप खाने का प्रबंध कराएंगी?…( व्यवधान)

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री तथा संसदीय कार्य मंत्री (श्रीमती सुषमा स्वराज) : अगर खाने का प्रबंध नहीं कराऊंगी तो दलितों पर अत्याचार होगा।… (Interruptions)

DR. BIKRAM SARKAR : It may be a laughing matter for you Kunwar Akhileshji, but it is a very serious matter so far as the Scheduled Castes are concerned. Be careful about that… (Interruptions)

Sir, I am referring to page 241 of the Report of the National Commission on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. It shows a statement showing disposal of cases by courts, and pendancy. Here, I find that these States – I am stating a few names of the States -- Gujarat, Haryana, Orissa, Punjab, Karnataka, Rajasthan, Uttar Pradesh and West Bengal, even my own State,West Bengal, -- did not even care to send any Report even four years after the year 1996… (Interruptions)…So, this is the condition. Eight States did not even care to send information to the Central Government or to the National Commission on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes. The Report says that no discussion was held so far. We do not know what is happening.

Sir, anywhere, the main cause of atrocities on the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes is that wherever they have shown the temerity to come up to organise and protest to get their due share, they get harassed.

Their women were raped. They were killed. All these things happened. We always thought that some new law would help them. Therefore, another law was enacted in 1989; it was a great law. It was Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989. … (Interruptions)

Sir, I have just started. If you say that what I am saying is irrelevant, I will sit down. But if you feel that it is relevant, then I urge upon you to give me ten more minutes.

सभापति महोदय : टाइम कंस्ट्रेंट है, आपकी पार्टी का समय चार मिनट था, आप आठ मिनट बोल चुके हैं, दो मिनट और बोल लीजिए।

DR. BIKRAM SARKAR : Sir, I just mentioned about the new Act which was passed in 1989; it was passed in all seriousness. But no thought was given as to how that would be administered and how that would be acted upon. Due to that, it led to this state. As you know, I mentioned the names of States. It is there even in Bihar. Bihar is no exception. 79 cases of murder took place, but only one person was brought to book. This is the position. There is no exception. I am not talking only about ‘Left’ or ‘Right’ or something like that. Our Party would not like to do any politics at least as far as atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes are concerned.

There is a definition of atrocities in that Act. The SC and ST (POA) Act, 1989, specified the atrocities which are liable to penalties under the Act as these: forcing the eating of obnoxious substances, dumping waste matter on land, denudation, wrongful occupation of land, dispossession, bonded labour, intimidation during voting – Sir, this is happening day in and day out, – mischievous litigation, false information, public humiliation, outrage of modesty, sexual exploitation, fouling of water resource, obstruction of entry to a place of public resort, eviction from habitation, mischief with explosives, destruction of buildings, and suppression of evidence. These 18 acts were given there.

When you look at the reports of the Home Ministry or the Ministry of Social Justice, you would find that nothing is being reflected. This is the kind of position that is happening. After a few years of passing of this Act, when Shri Indrajit Gupta was the Home Minister, he took a meeting of Home Secretaries and Directors General and Inspectors General of Police of all the States. They said that it needs a small amendment. What is that amendment? The amendment says: it was agreed that section 4 of the SC and ST (POA) Act, 1989 should be amended to include all the officers including SC/ST for neglecting their duties. As such, the words ‘but not being the member of SC/ST’ in line 2 of the section should be deleted. This is the amendment.

It appears to me that the main issue of economic development, social justice, etc. is totally given a go-by. We are discussing only the non-issues. We passed the Act, and it was supposed to be implemented or enforced by the State Governments. If the State Governments do not do it, we throw up our hands in despair and say that we could not do anything. This is the state of affairs.

I would therefore suggest two things. One is that the Central Government should take up in all earnestness and seriousness the reports of the National Commission for discussion – not half-an-hour or one hour or for a day – for two days to find out a solution. During that discussion, hon. Prime Minister, Deputy Prime Minister, the Leader of Opposition, and all other leaders should be present. Today it appears to me that this discussion is for the Scheduled Castes, of the Scheduled Castes and by the Scheduled Castes. This should be avoided.

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL (PATAN): Mr. Chairman, Sir, let me remind this House and particularly the Minister of Parliamentary Affairs that it was me who raised the matter concerning the discussion on the 5th and 6th Report of the National Commission on Scheduled Castes and Scheduled Tribes and a Special Report prepared by the 7-member Committee of Governors of this country, which was presented to the Indian President. It was my request.

It was made by me during ‘Zero Hour’ on 29.11.2002. I am yet to receive a written communication from the Government, whether my demand made in ‘Zero Hour’ is accepted or not. I also take this opportunity to draw the attention of the Minister of Parliamentary Affairs – I have got with me the proceedings of the House dated 20th December, 2002 – to what the then Minister of Parliamentary Affairs had said. It is on record and I quote:

"अगले सत्र में, मुझे बाद में न कहा जाये क्योंकि अगला सत्र बजट सत्र है, उसमें राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। उस सत्र में पहला काम राष्ट्रपति के अभिभाषण पर आभार प्रस्ताव होता है। उसके बादे पहली जो चर्चा होगी, वह दलितों के विषय पर सर्वसाधारण चर्चा होगी तथा उसमें कोई समय सीमा नहीं होगी। जब तक सदन यह न कहे कि हमारी चर्चा समाप्त हुई तब तक उत्तर नहीं दिया जायेगा यानी मंत्री जी उत्तर के लिए खड़े नहीं होंगे।"    This was the assurance given to the House. So, I would request the Chair not to ring the bell when I am speaking because now the floor is given to me.… (Interruptions)

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्रीमती भावनाबेन देवराजभाई चीखलीया) : अभी प्रवीण राष्ट्रपाल जी ने जो कहा, वही हम कह रहे हैं कि जब तक आप नहीं कहेंगे तब तक मंत्री जी जवाब नहीं देंगे। …( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : आप बैठ जाइये क्योंकि श्रीमती सुषमा स्वराज जी बैठी हैं। यह आपके लिए नया काम है इसलिए आप बैठ जाइये। …( व्यवधान)

सभापति महोदय : जब अन्य पार्टी के लोगों के लिए समय की पाबंदी है तो इनको उससे कैसे बरी किया जा सकता है।

...( व्यवधान)

श्री प्रवीण राष्ट्रपाल : मैं अपने लिए न कहकर सबके लिए बोल रहा हूं। …( व्यवधान)

The hon. Minister of Social Justice and Empowerment as also Shri I.D. Swami is here in the House. Before I go into the details, I would like to highlight the issues which I am going to touch so that they can respond accordingly.

My first priority is, atrocities on Scheduled Castes and Scheduled Tribes. What are the reasons of atrocities and their remedy. How can we take preventive steps and how can we take steps subsequent to the untoward incident?

My second priority is, land to landless Scheduled Castes and Scheduled Tribes. What is the progress in this particular area during the last five or ten years?

My third subject is, reservation in Government services; implementation of the reservation policy including the three DOP circulars which we have revived, removed or amended after passing the Constitution amendment. What is the position at the floor level?

My fourth subject is, Special Component Plan and Tribal Sub-plan, which were introduced by the then Government. Incidentally, it was the Congress Government. You will have to accept, as pointed out by Shri Bikram Sarkar. What is the state of affairs of SCP and TSP and whether the State Governments are giving their shares? Who is monitoring that?

My fifth priority is, allocation of funds by the Planning Commission, vis-à-vis, the Finance Minister every year. I want to help Shri Jatiya. You may inform the House as to whether the money given to this Ministry of Social Justice and Empowerment is sufficient for the work allocated to that Ministry. This is my fifth subject which I am going to touch.

My last item will be the stand taken by the NDA - National Disaster Alliance - Government in Durban Conference. My objection is only about the stand taken and let me go on record that discrimination of Scheduled Castes and Scheduled Tribes in this country is there not because of your party’s Government but it is there because it has a religious sanction. So, you need not worry. Why did you not admit in Durban that there is discrimination on the basis of castes in this country? These are my six priority areas.

I do not want to go into the details of atrocities because it is the agony of my own brothers and sisters. There have been many Parliamentary questions and many answers. Statistics are there, but I will, in nutshell, inform you what the Statutory Commission appointed by the Government has in short reported. It is not what Shri Rashtrapal or Shri Ramjilal Suman say. It is the National Commission’s Report and I would like to quote its fifth Report.

19.00 hrs.

"It may also be observed that the incidents of crimes against Scheduled Tribes are increasing in Andhra Pradesh, Gujarat, and Orissa."    This is a statement of the National Commission on Scheduled Castes and Scheduled Tribes. The second statement by the Commission is:

"Passing of Central legislation to enforce reservation in Government services, public sector undertakings, banks, universities, grant-in-aid bodies, etc. is the urgent need of the country.

It also said:

"The poverty alleviation programmes are not making the desired dent on the poverty in the case of Scheduled Castes and Scheduled Tribes."    This is what is reported in the Fifth Report of the Commission. The Sixth Report, which has already been presented to the hon. President but has not been discussed in Parliament said:

"The Scheduled Castes and Scheduled Tribes who are mainly from the rural areas do not have access to good quality education and are thus found wanting."    It is a subject which is most liked by my senior colleague and the Deputy Leader of the House, Shri Shivraj Patil because there are no education facilities. What is the use of introducing compulsory primary education when children have no schools in their villages?

As regards reservation, the Commission again goes on record:

"The implementation of reservation policy through Executive instructions which are frequently subjected to judicial intervention has failed to achieve the desired objective."    Even the Commission has gone on record that the Executive instructions are subjected to judicial intervention. So, the Commission wanted that reservation Act should be passed and it should be put in the Ninth Schedule.

The Commission has referred to the Workshop on Scheduled Castes and Scheduled Tribes Members of Parliament which was conducted in the month of December 1999. I congratulate the Prime Minister for that. The Workshop was conducted for three days and it was attended by Governors, Chairmen and many other senior people, and all the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Members. Shri Ram Jethmalani was the Minister of Law and Justice at that time. The then Minister of Social Justice and Empowerment also attended the Workshop. The Prime Minister also came twice – once for inauguration and then for the concluding session. It was in this session where the Prime Minister gave an assurance to the country that the five DoPT circulars which are against the interest of Scheduled Castes and Scheduled Tribes will be withdrawn immediately. Now, I want to know from the Minister of Social Justice and Empowerment about this. In fact, there are no five circulars. There are six circulars which are against the interest of the Scheduled Castes. The sixth circular is very serious which nobody knows.

There is a circular issued by the Department of Personnel in the year 1998 regarding the compensatory appointment. The appointment of kith and kin of the deceased will be made only if there is a vacancy in the particular roster point of the deceased father or mother. If that employee belonged to Scheduled Caste, he will get a compensatory appointment and he will be adjusted against the roster point. If a peon belonging to Scheduled Caste dies and if there is no vacancy in the roster, his kith and kin would not be appointed even if he is fit for compensatory appointment. According to my knowledge, when a man dies, he has no caste. The compensatory appointment is given to a person in place of an employee who dies in service for taking care of his family. If there is a vacancy for Scheduled Caste or Scheduled Tribe or OBC, he should be taken in the job. Nobody knows about this DoPT circular. I know about this circular and I will give a copy of this circular to the hon. Minister, Dr. Jatiya. I want that this circular should be revised first and then you go to the remaining two circulars.

As regards the first three circulars which you have revived or amended, what is the reason for that? I want to know one thing from my colleague from Gujarat. Before three days back, it came in the newspaper that 48,000 backlog vacancies are there in the State of Gujarat.

सभापति महोदय : सभा की कार्यवाही सभा की सहमति से एक घंटा और बढ़ाई जाती है।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : It is because I know about it and I come from that State. That may be the situation all over the country. More than 40,000 backlog vacancies are there in the State of Gujarat. A question was put in the State Assembly and the reply given by senior Revenue Minister of Gujarat was that the Government of Gujarat has decided not to fill in the backlog vacancies. Where is the DOPT Circular? Please verify this. If I am wrong I will apologise before this House but if the Government is proved wrong, then they must take remedial measures.

I would also like to know from the Government that as decided by the Congress Government at the Central level to improve the economic condition of the Scheduled Castes, a Leather Development Corporation was proposed to be set up some 12 years ago in Gujarat. There was a proposal to set up a Handloom Development Corporation before 12 years. Now please verify as to whether the Leather Development Corporation or the Handloom Development Corporation is functioning in the State of Gujarat or not. This aspect may please be verified.

Sir, I am a Member of the Committee on the Welfare of Scheduled Caste and Scheduled Tribe. Shri Gehlot is a Member of that Committee. Shri Ratilal Verma is the Chairman of that Committee. Now, how many cases of injustice against the people belonging to the Scheduled Castes and Scheduled Tribes we are coming across in that Committee? We visited two States to verify whether the SCP share was given by the Government or not. One particular state had not given.

Sir, I will give you the figures from the Union Budget. I do not want to make it a political issue. But I would like to have serious discussion and I also want to have a decision. Otherwise there is no use wasting the valuable time of the House. The total Revenue Receipts, as reported in the Budget, is Rs. 2,53,935 crore. What is the amount that Shri Jatiya, the hon. Minister for Social Welfare is likely to receive from the hon. Finance Minister? He may be from the State of Rajasthan or from the State of Madhya Pradesh, but he is from the same Party. For the Scheduled Castes, Scheduled Tribes and for the Other Backward Classes, out of the figure that I just mentioned, during the year 2002-03, only a sum of Rs. 240 crore was given. The total percentage of Scheduled Caste, Scheduled Tribe and Other Backward Classes of the total population is more than sixty per cent. Scheduled Caste population is 20 per cent; The Scheduled Tribe Population is 8 per cent and the population of the OBC is 40 per cent. सब मिलाकर पोपुलेशन कितनी हो गई ? But the amount allocated was only Rs. 240 crore. It was reported in this House. But nobody knows that this amount was revised to Rs. 168 crore. I would like to know, since I represent a reserved constituency, why this amount was revised to Rs. 168 crore. This year also the hon. Finance Minister has allocated the same amount of Rs. 240 crore. It means the Government is not applying mind. Last year, the total allocation was Rs. 240 crore. It was revised to Rs. 168 crore and the actual expenditure was hardly Rs. 150 crore. In percentage terms it comes to only 0.01 per cent. This is nothing but an insult to the people belonging to the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and the Other Backward Classes.

Sir, this Government has allocated Rs. 1000 crore for building Convention Centres in this country ए.सी.हॉल चाहिए। बड़ी-बड़ी कांफ्रेस करनी है। A Government that has allocated a sum of Rs. 1,000 crore for building Convention Centre in the metropolitan cities has allocated only a sum of Rs. 240 crore and is likely to spend only Rs. 150 crore. I would like to know as to what welfare activities could be carried out by the Department of Social Justice and Empowerment with this amount.

Sir, I now I come to the Special Component Plan. What was the intention of the SCP? It was neither a gift or a dole. The main purpose was to bring the below poverty line families belonging to the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and the Other Backward Classes above poverty line.

For Scheduled Castes, the amount allocated for this year is only Rs.377 crore. According to the 1991 census, the population of Scheduled Castes in this country was 16.48 per cent and that of Scheduled Tribes was 8.56 per cent. I want to know from Dr. Jatiya, if the official figure according to 1991 census, the population was 16.48 per cent, why was the reservation kept at 15 per cent only in the Central Government? Who is responsible for this shortfall of 1.48 per cent? Please count the recruitment made from 1991 till date and you will know the shortfall. Similarly, in the case of Scheduled Tribes, though their population was above eight per cent, reservation was only seven per cent. I want a reply to this question. I have raised this question earlier also, but nobody is giving reply.

हमारे गुजराती में एक कहावत है -छोरू कछोरू थाय, मावतर कमावतर न थाय। A child may make a mistake, but not the father. If a private employer makes a mistake, the Central Government will punish it. But, if the Central Government makes a mistake, that too a Hindu Government, then who will punish it? As my leader rightly points out, this House has the power to punish the Central Government by passing a Censure Motion against it. Then these people will have no right to sit here because they do not know what are the rules of law.

Now I come to a very important issue, that is land to the landless.

सभापति महोदय : अब कन्क्लूड कीजिए, काफी सदस्यों ने और बोलना है।

श्री प्रवीण राष्ट्रपाल : मैं कन्क्लूड कर रहा हूं।

I know you cannot provide employment. According to the 2001 census, the population in this country is 112 crore. This is the official figure. Now the Scheduled Castes population is 20 per cent and that of the Scheduled Tribes is eight or nine per cent. We are now 30 per cent of the total population. Again, one figure puts rural India as having 70 per cent of the total population whereas urban India is having only 30 per cent of the total population. How can you provide them employment? The only livelihood for a Scheduled Castes man or a Scheduled Tribes man who is in the rural India is by cultivating the land. You cannot provide employment in Government offices or factories. No MNC is going to set up factories in a tribal area. That is why we want the land.

My colleague Shri Madhusudan Mistry will correct me if I am wrong. It was ten or twelve years before that nearly 67 thousand families were given land pattas in Gujarat. After that no work is done. I am a witness in Surendranagar District and my senior colleague Shri Ratilal Varma will also agrees with me. Thousands of acres of land was given to people belonging to Scheduled Castes in Surendranagar District. That is the district where the highest number of Scheduled Castes people are living. It is a very poor district also. The land has been given; the land record is also there in their names. But even now they are not allowed to cultivate in that land. Who will help these poor people and enable them to cultivate in the land which has been given to them not by any landlord, but by the then State Government? I want your help on this particular issue.

Reservation in the Government service is an issue which is livelihood for the Scheduled Castes people in this country. They do not have industry, they do not have land either. The only source of income is Government service with a job of a peon or a clerk or an inspector or an officer. They will get this job only if the reservation policy is implemented. You know that the reservation policy is not properly implemented in this country. So, we want to know from you whether the recommendation of the Commission to have legislation regarding reservation will be passed in this Session or in the coming Session.

It is because in the workshop, a committee of 12 members was appointed. Shri Verma was a member in it. I was a member in it. Shri Ramdas Athawale, Shri Ram Vilas Pawan were members in it and the popular and the famous Chief Minister of Uttar Pradesh was also a member in it. They gave a unanimous report that these are the actions which the Government of India should take. The Ministry of Social Justice and Empowerment has sent those resolutions to the respective Departments. This House may be informed about the progress made by the respective Departments in regard to the resolution passed by the 12 Member Committee. It was an all-Party Committee. So, that may be given here.

Now, I am coming to the last but important point on how we can stop the atrocities. The police cannot help in stopping atrocities. It was only during Mahatma Gandhi and Dr. Ambedkar’s time that other than the Government, the socio-religious organisations went out and moved from place to place for doing it. I can give the names from Maharashtra, Gujarat, UP and Bihar also…… (Interruptions) They came out and I request the party which is attaching great importance to Hinduism on one point.

19.17 hrs. (Mr. Deputy-Speaker in the Chair)

Mahatma Gandhi has gone on record to say that untouchability is a black dot on Hinduism…… (Interruptions) He has used another word. He told that it is venom in milk. अस्पृश्यता शुद्ध क्षीर में सोमल है, जहर है और देश के धर्मों के प्रति बहुत बड़ा कलंक है और इस कलंक को हमें मिटाना है।

Now, how can we eradicate this one? No police can do it. You will have to take preventive steps. We have talked about eradication of malaria programme. We have programmes for eradication of AIDS and polio. Do you have a programme for eradication of discrimination, eradication of untouchability and eradication of social discrimination? You have no programme for that. It is not there in your agenda. It is not there in the agenda of the BJP or the NDA. It is not there at all. Please include this item in the agenda of the Government of the day that we should remove this discrimination.

The oath was taken by the socio- religious leaders during 1932 that we will remove untouchability from this country. You are talking of extending reservation. It is only political reservation which is being extended. There should not be confusion regarding reservation in service and reservation in education for which there is no time limit. Every Government, whether it is the BJP Government or the Congress Government or the JD Government, has extended the limit of ten years for political reservations.

I will be failing in my duty if I do not refer to Dr. Ambedkar and I would request that we should all read the historical lecture given by him in the World Peace Conference in 1943. It was about the human rights of untouchables in India…… (Interruptions) I will read the first line because a lot of things are being discussed about Hindutva and cultural nationalism. I am quoting from the first paragraph of Dr. Ambedkar. So, let there not be any misunderstanding that Dr. Ambedkar was the leader of the Hindus. He never preferred that particular ideology.

I would like to quote Dr. B.R. Ambedkar. He said:

"Most parts of the world have had their type of what Ward calls the lowly. The Romans had their slaves, the Spartans their helots, the British their villeins, the Americans their Negroes and the Germans their Jews. So the Hindus have their Untouchables. "    It was he who demanded three things in this Conference. He said that if you want to uplift the lot of Scheduled Castes, you give them reservation in services; you give them reservation in education; and you give them separate electorate, and then separate settlement. I am extremely sorry for the situation that is existing in this country.

SHRI SUSHIL KUMAR INDORA (SIRSA): Do you want separatedalit land?

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : No, do not misunderstand. It is not Dalitstan that we want. Please listen to me.

Dr. Ambedkar demanded separate electorate. अलग मताधिकार । हिन्दी में बोलना सरल हो जाएगा।He demanded separate settlement. अलग बस्ती हम ऐसी गलती नहीं करने वाले हैं। मुल्क हमारा है। We are the owners of this land.

डॉ. सुशील कुमार इन्दौरा: आपके विचारों से ऐसी भावना झलक रही है, आप दलितों को यह समाचार देना चाहते हैं कि इस देश को आप अलगाववाद की ओर ले जाना चाहते हैं।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Dr. Ambedkar never demanded separate land.

MR. DEPUTY-SPEAKER: He is quoting Dr. Ambedkar. Do not mistake it.

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Let us make it very clear.

डॉ. सुशील कुमार इन्दौरा: मेरे कहने का भाव यह है कि इस सदन से गलत संदेश देश के दलितों में न जाए कि उनके साथ अन्याय हो रहा है।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : The issue is very serious.

उनकी अलग से बसाहन । आप फ्रैन्ड्स कालोनी में जाइए, तो वहां कितने एसटीज हैं। बाबा साहिब अम्बेडकर ने जो १९४३ में कहा था, मैं उसको कोट कर रहा हूं।

Dr. Ambedkar said:

"It is the considered opinion of this Conference,

(a) that so long as the Scheduled Castes continue to live on the outskirts of the Hindu village – he was very particular, he says Hindu village – with no source of livelihood and in small number as compared to Hindus, they will continue to remain Untouchables and subject to the tyranny and oppression of the Hindus and will not be able to enjoy free and full life. "    So, the solution was that the Constitution should provide for the transfer of Scheduled Castes from their present habitation and form separate villages. बस्ती नहीं, उनका गांव होगा। He said that it should be villages away from and independent of Hindu villages. I agree that in Ahmedabad there is no untouchability. … (Interruptions) I am not yielding.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Do not disturb him. I want him to conclude. You are further provoking him.

डॉ. सुशील कुमार इन्दौरा: बड़ी मुश्किल से तो दलित लोग हल्कों से निकल कर बाहर लोगों में मिक्स हुए हैं। आप चाहते हैं कि वे दोबारा वहीं जायें।

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Let me cite an incident that happened in my State. In a village in Amreli district, the Scheduled Castes are facing social boycott over the last two months. They do not get water and foodgrains. They do not get anything from the village. How will they survive? They say we are not doing anything to them. Socially boycotting the Scheduled Castes is the worst form of punishment in the villages. It is happening not only in Gujarat. But I will talk about Gujarat and I can give you the details about it. Right now the social boycott is going on for the last two months. They do not get water; they do not get milk. If they have buffaloes and cows at their homes, from them milk will not be purchased by the Dairy.

This is happening in the land of Mahatma Gandhi and Sardar Patel. I have quoted this to show what Dr. Ambedkar said in 1943. I can appreciate one thing. What I mean is that in a village a man is identified by his caste. If I go to my village, the people will say that Rashtrapal ji, Member of Parliament, has come. Everybody in my village knows that I belong to Scheduled Caste. But when I move on the streets of Ahmedabad, caste vanishes. Dr. Ambedkar wanted that the small bastis of Scheduled Caste people should be taken to a place near the towns because it is in the towns and cities where untouchability vanishes. Suppose they do not approve of this idea. I want that my brothers and sisters should be safe in the villages. There should be no murder, no rape committed against them. For that, this House should take up the issue very seriously and take a decision in the coming day.

With these words, I conclude. I thank you very much for giving me this opportunity.

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह (रोहतक): उपाध्यक्ष महोदय, आपका धन्यवाद। मैं आज दलित समाज पर अत्याचार के विषय में हो रही चर्चा में अपनी पार्टी इंडियन नेशनल लोक दल की तरफ से बोल रहा हूं। मैं लगभग पांच घंटे से अधिक, इस सदन में जो कुछ सुन रहा हूं, इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि दलित वर्ग के लोग, उनके प्रतनधियों ने अपनी व्यथा का पूरी तरह यहां व्याख्यान किया। दोनों पक्षों की तरफ से राजनीतिक तत्व अधिक मात्रा में झलक रहे थे। समस्या दलित वर्ग और दलित समाज की है। यह समस्या महात्मा बुद्ध से लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, डाक्टर भीमराव अम्बेडकर और यहां तक आ पहुंची है। मूल समस्या सामाजिक है। यदि हम इसे राजनीतिक रूप केवल वोट की खातिर देना चाहते हैं तो ठीक नहीं होगा। भारतवर्ष में यह मूल समस्या तब तक दूर नहीं हो सकती, जब तक हम अपनी प्रवृत्ति नहीं बदलेंगे। इसमें बदलाव लाना आवश्यक है। यह व्यथा कैसे शुरु हुई? भार तवर्ष में हजारों सालों से यह सिलसिला चला आ रहा है और उसका कारण बल, बुद्धि और धन है। ये तीन शक्तियां हमारे समाज में ऐसी हैं जिन पर समाज टिका है। दुर्भाग्य की बात यह है कि लगातार इन तीनों शक्तियों का दुरुपयोग होता रहा। प्रकृति ने ये शक्तियां हमें इसलिए दी थीं कि बलवान दुर्बल की सहायता करे, धनवान निर्धन की सहायता करे और बुद्धिमान अज्ञानी को ज्ञान दे।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यही कारण है कि आज नहीं, इस सदन में बार-बार चर्चा होती रही। मैं समझता हूं कि आगे भी यह चर्चा चलती रहेगी। जब तक इन तीन प्रकार की शक्तियों का सदुपयोग करना शुरु नहीं होगा, तब तक इस समस्या का निवारण नहीं किया जा सकता क्योंकि यह सामाजिक समस्या है। जिस दिन बलवान निर्बल की सहायता करेगा, वह उससे प्यार करेगा, तब विषमता दूर होगी और समाज में एकता पैदा होगी।

SHRI MADHUSUDAN MISTRY (SABARKANTHA): We do not want patronage; we want our rights.

CAPT. (RETD.) INDER SINGH : I am not talking about patronage. I am talking about what we are doing today and what we have been doing in the past. In the past, we were doing things in a wrong way.हर आदमी न इस संसार में बराबर हुआ है और न कभी बराबर आ सकता है। हर आदमी बुद्धिमान नहीं हो सकता। अगर परमात्मा ने बुद्धिमान को अच्छी बुद्धि दी है, वह ज्यादा ज्ञान ग्रहण करता है, अगर उसका सदुपयोग करेगा तो वह आगे पहुंचेगा। इससे समाज में विषमता दूर होगी। जब तक हम समस्या के मूल में नहीं जायेंगे, उसका निवारण नहीं हो पायेगा। हमें हर एक को मिलकर करना चाहिये, यह एक पक्ष की बात नहीं है। मैं इस बात से भी ज्यादा मुत्तफिक नहीं हूं कि इस समस्या को दूर करने के लिये इसे राजनीति से जोड़ा जाये। देखा गया है कि इसे राजनीति से जोड़ने का प्रयास ज्यादा होता रहा है। यह आज भी हो रहा है। मैं उदाहरण के तौर पर बताना चाहता हूं कि हरियाणा में जो अकस्मात् घटनी घटी। उस घटना में किसी दलित का सवाल नहीं था और जिस वक्त यह घटना घटी, किसी को मालूम नहीं था कि गाय का चमड़ा कौन उतार रहा है। वे दलित हैं या कोई और हैं।

श्री प्रवीण राष्ट्रपाल : और कौन उतारता?…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : कैप्टन इन्दर सिंह के अलावा और किसी का रिकार्ड में नहीं जायेगा।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : उपाध्यक्ष जी, यह घटना मेरे संसदीय क्षेत्र में हुई है। मैं भली-भांति परचित हूं। वह दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी जिसकी हम निन्दा करते हैं। यह कोई अच्छी बात नहीं हुई थी। लेकिन उसे राजनैतिक रूप देना गलत बात थी…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record, except what Capt. Inder Singh says.

(Interruptions) *

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, यह हमारा राजनैतिक सदन है जिसमें इन लोगों को गुमराह करने का प्रयास नहीं करना चाहिये। अगर राजनीति की बात करना चाहते हैं तो ढंग से राजनीति करिये। **बोलकर या गलतफहमी पैदा करके मत करिये। यह गलत बात कही गई है कि पुलिस ने पैसा लेकर उन्हें मारा। फिर किसी के माध्यम से प्रचार करके बवंडर खड़ा किया, यह ... बात है। माननीय गृह राज्य मंत्री ने अपना बयान दिया है। एस.सी.एस.टी. कमीशन की रिपोर्ट है जिसका विषय अखबारों में छपा है…( व्यवधान)कमिश्नर द्वारा इंक्वायरी हुई है।

...( व्यवधान)

श्री प्रवीण राष्ट्रपाल : मरे कौन थे।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : मारने वाले भी दलित थे।

SHRI RAMJI LAL SUMAN : It is highly objectionable.

MR. DEPUTY-SPEAKER: He is not yielding to you.

*Not Recorded.

** Expunged as ordered by the Chair.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Capt. Inder Singh, are you yielding to him?

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं मौके पर गया हूं।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: He is not yielding to you.

श्री रामजीलाल सुमन : मैं सिर्फ एक मिनट लूंगा।…( व्यवधान)

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : जब यह बोल रहे थे तो मैं बीच में नहीं बोला, मैंने इन्हें नहीं रोका।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : यह यील्ड नहीं कर रहे हैं। मैं कुछ नहीं कर सकता।

...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : मेरी तकलीफ यह है कि दोनों की बातें रिकार्ड पर नहीं जा सकतीं।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : सर, दोनों एक साथ कैसे बोलेंगे। आप भी बोलेंगे और मैं भी बोलूंगा, ऐसे कैसे चलेगा।…( व्यवधान)अगर आपको इस बात का जवाब देना है तो आप बाद में समय लेकर बोलिये। मैं आपके बीच में नहीं बोला। मैं श्री रामविलास पासवान जी के बीच में नहीं बोला। मैंने बीच में खड़े होकर सिर्फ यह बात जरूर कही थी कि जो कुछ यह कह रहे हैं वह ... कह रहे हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, यह बिल्कुल सरासर गलत बात है। चौकी से खींचकर जनता के लोगों को मार डाला गया, इसे कौन बर्दाश्त करेगा।This is the basic issue. We cannot tolerate it. जिन लोगों के ऊपर लोगों की जान बचाने की जिम्मेदारी है, गांव के लोगों ने चौकी से खींचकर पुलिस चौकी के सामने उन्हें मार डाला, यह क्या बात कर रहे हैं। …( व्यवधान)जिन लोगों पर जान बचाने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने पुलिस चौकी से लोगों को निकालकर मार दिया, जला दिया, यह कितना गंभीर मामला है। पुलिस चौकी से खींचकर जनता के लोगों को मार डाला गया और पुलिस तमाशा देखती रही।

MR. DEPUTY-SPEAKER: You are a mover of the Motion. अगर आपको कुछ कहना था तो मोशन मूव करने के समय कहना था।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : यह बात मैं एक दफा नहीं तीन दफा सदन में कह चुका हूं और उसका जवाब जब मैं देता हूं तो यह मान नहीं रहे हैं।…( व्यवधान)

श्री रामदास आठवले : उपाध्यक्ष महोदय, वहां पांच दलितों की हत्या हुई है। दोषी लोगों को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए।

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Athawale, will you please yield?

...( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : सुमन जी, आप एक पार्टी के लीडर हैं, जरा मेरी बात सुनिये। रामदास जी आप बैठिये। अगर कोई कुछ बोलना चाहता है, कुछ क्लैरफिकेशन पूछना है तो उन्हें यील्ड करना चाहिए।

श्री रामजीलाल सुमन : यह कह रहे हैं कि हमने ... बोला है, I strongly oppose it. हमने क्या ... बोला है। पांच लोगों को पुलिस चौकी से खींचकर मार डाला गया, इसमें कौन सा ... है। हम दो बार मौके पर गये हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आप मुझे भी बात नहीं कर देंगे, यह कौन सा तरीका है।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : मैं कह रहा हूं कि ... क्या बोला, मैं इस बात को नहीं कहता कि पांच लोग मारे गये, मैं इस बात को ... कह रहा हूं कि इन्होंने कहा कि वहां पुलिस ने पैसे लिये।

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions)*

संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री तथा श्रम मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री विजय गोयल) : सर, ये आपसे में तीनों राम खड़े हुए हैं, कर्नल राम सिंह, रामदास आठवले और रामजीलाल सुमन। यह तीनों राम का झगड़ा हो रहा है।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि श्री रामजीलाल सुमन यह बात पहले भी कह चुके हैं, श्री रामविलास पासवान जी भी यह बात कह चुके हैं।

वे कहते रहेंगे। मैं इनको रोकना नहीं चाहता लेकिन मैं इनसे यह आग्रह करना चाहता हूँ कि सच कहिये। यह बात मैं इसलिए कह रहा था …( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, हम यह जानना चाहते हैं कि हमने क्या गलत कहा है? I strongly object to this. …( व्यवधान)

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : मैं बताता हूँ। आप मेरी बात सुनिये।

* Not Recorded.

मैं उस बात को फिर स्पष्ट करता हूँ। पांच आदमियों को हजूम ने मारा। पुलिस के केवल पांच आदमी थे, वे कुछ कर नहीं पाए, वे बेबस थे। लेकिन यह कहना गलत है कि पुलिस ने उनसे पैसे लिये और जब उन्होंने पैसे नहीं दिये तो पुलिस ने पहले दो आदमियों को मारा और दो आदमियों को मारने के बाद फिर अफवाह फैला दी गई। यह गलत है, यह मैं कह रहा हूँ। यह कौन कह रहा है कि पांच आदमी नहीं मरे? मैं यह भी कहता हूँ कि यह निन्दनीय है। उस पर जो कार्रवाई होनी चाहिए थी, वह सरकार ने बड़ी कठोरता से की है।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री ईश्वर दयाल स्वामी) : सस्पेन्ड किये हैं, चार्जशीट की है।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : जो कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी, वह की है। मैं केवल यह कहना चाहता था कि इन बातों को राजनैतिक रूप नहीं देना चाहिए इस भावना से कि हम वहां जाकर इस बात को फैलाएं और उससे वोट ज्यादा मिलेंगे। वोट तो नहीं मिलते।

जहां तक हरियाणा का ताल्लुक है, मैं बताना चाहता हूँ कि वहां पर वे नीतियां लागू की जा रही हैं जो चौधरी देवीलाल ने निर्धारित की थीं और उनमें वे नीतियां थीं जिनमें दलित वर्ग के अंदर कहीं भी चौपाल नहीं दिया गया, केवल हरियाणा ऐसा प्रदेश है जहां चौपाल का प्रावधान किया गया ताकि दलित लोग वहां बैठकर अपनी समस्याएं समझ सकें, अपनी बारात रोक सकें और उसका निवारण कर सकें। केवल हरियाणा ऐसा प्रदेश है, जहां पर दलित की कन्या के विवाह के लिए ५१०० रुपये कन्यादान दिया जाता है, और किसी प्रदेश में नहीं दिया जाता। प्रसूति के लिए उनको वित्तीय सहायता दी जाती है।आज हरियाणा के अंदर १८ रिजर्व सीट में से १७ हमारी पार्टी के साथ हैं, वह दलित हैं। इसका कारण है कि सरकार किसी वर्ग के अंदर भेदभाव से नहीं चल रही है और वहां पर किसी प्रकार की कानून और व्यवस्था में गड़बड़ नहीं है, न कोई जातिवाद की बात है, न वहां पर किसी तरह के वर्गवाद की बात है। हर चीज़ के छत्तीस कोण लेकर सरकार चल रही है और उसके ऊपर अगर गलत आक्षेप किया जाए तो वह उचित नहीं है। मैं इस बात को स्पष्ट करना चाहता था और इससे आगे मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता।

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी एक बात सुन ली जाए।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : फिर बीच में आप बोलते हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : मैं आपका प्रतिवाद नहीं कर रहा हूँ।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : इनका भाषण अभी पूरा नहीं हुआ। आप उसके बीच में कैसे खड़े हो गए?

श्री रामजीलाल सुमन : इनकी बात पूरी हो गई।

उपाध्यक्ष महोदय : क्या आपका भाषण पूरा हो गया?

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : पूरा कहां हुआ? अभी तो मैंने इनकी बात कही थी।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप खत्म कीजिए।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : मैं खत्म कर रहा हूं। मेरा सारा समय तो इनकी बात में खराब हो गया।

उपाध्यक्ष महोदय : आप भी उनकी तरफ देखकर बात करते हैं। अब समाप्त कीजिए।

कैप्टन (सेवानिवृत्त) इन्द्र सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, जो कुछ दलित वर्ग के लिए हरियाणा सरकार द्वारा संभव हो सकता है, वह किया जा रहा है। …( व्यवधान)५५ सालों में आपने क्या किया है? फिर वही बात करेंगे? ये फिर मुझे छेड़ रहे हैं। मैं आपकी किताबें उघाड़ूंगा तो आपके लिए मुश्किल हो जाएगी। …( व्यवधान)ये गए थे गोड्डा निवाने, वहां उनको पता नहीं कि आदमी मरे हैं। जाकर पूछने लगे कि किसकी गाय मरी है। यह इनकी स्थिति है।

उपाध्यक्ष महोदय : कैप्टन इंदर सिंह जी, आप जल्दी समाप्त कीजिए।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल यही निवेदन करना चाहता हूं कि यह बहुत ही गम्भीर विषय है। यह जो विषमता भारतवर्ष में व्याप्त है, इसे दूर करने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर अलग से ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि दलित वर्ग को उच्च वर्ग के बराबर लाया जा सके। इसका सिर्फ यही समाधान है। इसके अतरिक्त और कोई दूसरा समाधान नहीं हो सकता है। मैं अपनी बात समाप्त करते हुए आपको धन्यवाद देकर अपना स्थान ग्रहण करता हूं।

श्री राम प्रसाद सिंह (आरा): माननीय सभापति जी, आपने मुझे सामाजिक न्याय और दलितों के उद्धार के पक्ष में बोलने का जो मौका दिया है, उसके लिए मैं आपके प्रति आभार व्यक्त करता हूं। विषय तो बड़ा गम्भीर है और सचाई यह है कि देश के हर राज्य में दलितों पर अत्याचार हो रहा है। अभी कहा गया कि कौन सा ऐसा कोना खाली है जहां दलितों पर अत्याचार नहीं हो रहा है, यह बिलकुल सही है। यदि देश में ऐसा कोई स्थान ढूंढा जाए जहां दलितों पर अत्याचार नहीं हो रहा हो, तो वह प्रयास मिथ्या साबित होगा। यह ठीक है कि कहीं ज्यादा है, कहीं कम है।

उपाध्यक्ष जी, महात्मा गांधी जी ने सोचा था कि आजादी के बाद समाज के जो दलित और पिछड़े लोग हैं, उनको अधिकार मिलेगा, उनके घरों तक खुशहाली जाएगी और देश में प्रेम व प्यार का महौल पैदा होगा और देश का दलित एवं पिछड़ा वर्ग सद्भावना से ओतप्रोत होकर आगे बढ़ेगा, लेकिन वैसा नहीं हुआ।

महोदय, मैं १९८९ से तीन बार सदन में आ चुका हूं और इस सदन में दलितों के ऊपर अत्याचार होने से रोकने के विषय पर अनेक बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन निदान कुछ नहीं निकला। उनकी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। हम केवल इस विषय में विचार करते जा रहे हैं और हम जैसे-जैसे उनके ऊपर अत्याचार की घटनाओं को कम करने के लिए विचार करते हैं वैसे-वैसे उनके ऊपर अत्याचार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, उनका एक्सप्लायटेशन बढ़ता जा रहा और उनका हक उनको नहीं मिल रहा है। इसका कारण खासकर दलित समाज है क्योंकि वह सदियों से उपेक्षित रहा है।

महोदय, देश का दलित वर्ग आज भी फटे हाल है, भुखमरी का शिकार है, शोषण का शिकार हो रहा है। विडम्बना यह है कि इस देश की एक-चौथाई आबादी दलित है। देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा दलितों का है। यदि दलितों में रोष आ जाए, तो समाज बदल जाए, सरकार बदल जाए। अब ऐसा देखने में आ रहा है कि दलित भी आगे बढ़ रहे हैं। वे ज्ञान अर्जित कर रहे हैं। वे अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक हो रहे हैं और अपने अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ रहे हैं। अब पहले जैसे दलित नहीं हैं।

महोदय, जो समाज जितनी ज्यादा कुर्बानियां देता है, जिसका जितना ज्यादा शोषण होता है, जिसके साथ जितना ज्यादा अन्याय होता है, वह उतना ही मुखर हो जाता है। उस वर्ग को हम कानून के दायरे में नहीं बांध सकते हैं। जैसे कहा जाता है कि जल की सीमा है, समुद्र की सीमा है, वैसे ही दलितों पर अत्याचारों की कोई सीमा नहीं है। इसलिए उसकी इन समस्याओं का निदान खुद दलित ही करेगा। दलितों में जागृति आई है।

महोदय, देश की एक-चौथाई आबादी दलितों की है। वे इंतजार कर रहे हैं कि उनके हाथ में एक बार सत्ता की चाबी आ जाए, तो वे किसी से भीख नहीं मागेंगे, बल्कि वे स्वयं अपने अधिकारों के प्रति सचेष्ट होंगे और अपना उत्थान वे खुद करेंगे। इसके लिए वे किसी के ऊपर निर्भर नहीं होंगे, बल्कि वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगे और वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति स्वयं सजग रहकर अपना उत्थान करेंगे। इस प्रकार इस देश में तब धर्म एवं पाखंड का कोई झंझट नहीं रहेगा।

महोदय, ये कहते हैं कि हम हिन्दू हैं और हिन्दू राष्ट्र की कल्पना करते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि कोई दलित धर्म-परिवर्तन क्यों करता है ? आज भी किसी दलित को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं है। पहले भी कोई दलित मंदिर में नहीं जा सकता था, आज भी वही स्थिति है।

स्कूलों में आज भी उनके लिए पढ़ने की ठीक से सुविधा नहीं है। वे अपने बच्चों को गरीबी, बदहाली और भुखमरी के कारण प्राईवेट और अच्छे स्कूलों में पढ़ा नहीं पाते। आप दलितों के लिए क्या करते हो? इस सदन में रोने और चिल्लाने से काम नहीं चलेगा। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने से काम नहीं चलेगा। इसमें मानसिकता की जरूरत है, हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा, तब दलितों को अधिकार मिलेगा और उसके ऊपर जो अत्याचार हो रहे हैं वह खत्म होंगे। यह और भी विडम्बना है कि इस देश में ऐसा नहीं है। दलितों में डा. अम्बेडकर और बाल्मीकि जैसे लोग पैदा हुए, जिन्होंने रामायण लिखी। बाबा अम्बेडकर ने संविधान बना डाला। एकलव्य दलित परिवार में पैदा हुए, जिसने दान में अपना अंगूठा दे दिया। देश में जितनी लड़ाइयां हुई हैं, उनमें दलितों की सहभागिता सबसे ज्यादा रही है। जब-जब देश में लड़ाई हुई तब-तब दलितों ने आगे बढ़ कर काम किया है। दलित का बेटा जगजीवन राम जी, रक्षा मंत्री बने थे और उन्होंने पाकिस्तान को कहा था, मुझे दिसम्बर, १९७१ की तारीख याद है, जब पटना के गांधी मैदान में बाबू जी भाषण दे रहे थे, मैं भी वहां गया था। तब पाकिस्तान का अटेक हुआ। उस समय बाबू जी ने कहा कि यह लड़ाई भारत की भूमि पर नहीं होगी, पाकिस्तान की भूमि में होगी और पाकिस्तान दो हिस्सों में बंटेगा और उन्होंने डिफेंस मनिस्टर बन कर यह करके दिखाया। पाकिस्तान बंट गया और बंग्लादेश बन गया। यह दलितों का इतिहास है।…( व्यवधान)

महोदय, आज इतना ही नहीं, उसके बंटवारे की वजह से पाकिस्तान को हिम्मत नहीं है। ये लोग आतंकवाद की बात करते हैं, हिम्मत नहीं है कि पाकिस्तान भारत पर कभी आक्रमण कर सकता है। बाबू जी ने कहा था कि अगर आक्रमण करेगा तो तोप की गोली से हम उसका जवाब देंगे, लेकिन इनकी ऐसी हिम्मत नहीं है। दलित परिवार में बाबू जी पैदा हुए। ये जिस विभाग में गए - चाहे दूर संचार, रेलवे, कृषि या रक्षा विभाग हो, ये सब जगह सफल मंत्री के रूप में रहे। जहां से ये जीत कर आए थे, मैं भी वहीं से जीत कर आया हूं। आप सोशल जस्टिस की बात करते हैं। यह सच्चाई है जब वी.पी. सिंह जी ने सोशल जस्टिस का नारा दिया तो इन लोगों ने उनकी सरकार को गिराया था, जो उधर बैठे हुए हैं। हमें न्यायपालिका से भी जस्टिस मिला। आप कुछ भी कहें, बिहार के लालू यादव में दलितों, गरीबों, दबे-कुचले और पिछड़े लोगों का विश्वास है, तभी तो आज वे इतने वर्षों से वहां राज कर रहे हैं। उनकी सरकार कहां जा रही है? मुलायम सिंह जी, उस दिन मुकर गए थे।…( व्यवधान)

डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया (दमोह) : बिहार में दलितों पर हमला किया जाता है।…( व्यवधान)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Dr. Ramkrishna Kusmaria, please resume your seat.

… (Interruptions)MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing will go on record.

(Interruptions)*

श्री राम प्रसाद सिंह :आप मध्य प्रदेश की बात करें। आप धोखे में मत रहें। लालू यादव को आप कितना भी नीचा दिखाने की कोशिश करो, लेकिन वे नीचे होने वाले नहीं हैं, क्योंकि दलित, गरीब, शोषित एवं पीड़ित जनता उनके साथ है।…( व्यवधान)साम्प्रदायिकता को जड़ से खत्म करने वाले अल्पसंख्यक उनके साथ हैं।…( व्यवधान)लड़ कर और मोर्चा बना कर आपने देखा है।…( व्यवधान)लालू जी आते हैं तो आपके प्रधान मंत्री और आडवाणी के बाल खड़े हो जाते हैं। इसलिए नहीं, कि लालू जी साम्प्रदायिकता का साथ देते हैं, दलितों के हक को देते हैं, वे गरीबों के हक को देते हैं इसलिए ये कांप उठते हैं। मैं चाहता हूं कि आप ऐसा मत करो।…( व्यवधान)आज भी इनके प्रति सदन में सब माननीय सदस्यों की एक ही भावना है कि न्याय आयोग बने, जिसमें दलितों और गरीबों के लिए आरक्षण करें।

क्योंकि यह सरकार पंगु बन गई है। आज सभी काम हम न्यायपालिका के साये में कर रहे हैं। डर के मारे कभी-कभी हम लोग हाउस में हैरत में पड़ जाते हैं, जब प्रधानमंत्री जैसे लोग कहते हैं कि इसमें न्यायपालिका की बात है, जबकि उस न्यायपालिका में दलित का हिस्सा नहीं है। आप कह रहे थे कि हमने ८४ मंत्रियों में से १२ दलित मंत्री बनाये हैं, जबकि उनका २२.५ प्रतिशत हिस्सा है। मैंने हिसाब जोड़ा तो उनके २० मंत्री होने चाहिए तो आपने दलितों को कहां लिया। अखिलेश भाई ठीक कह रहे थे कि वे आपके पिछलग्गू हैं, आप दलित को दलित से लड़वा रहे हैं। आप मायावती के हाथों से दलितों के हाथ में बने इसे कोहिनूर को खत्म करवा रहे हैं। आप मायावती की बात करते हो, मायावती तो तुम्हारे गले की हड्डी बन गई है, अगर छोड़ा तो तुम्हारी सरकार गई और जोड़ा तो तुम्हारे राजनाथ सिंह जी जैसे लोग चिल्लपों कर रहे हैं।

* Not Recorded.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please do not take names of persons who are not here.

...( व्यवधान)

श्री राम प्रसाद सिंह : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, दलित अत्याचार और बलात्कार के खिलाफ हमें जंग छेड़ने की जरूरत है, हमें भूमि सुधार को कड़ाई से लागू करने की जरूरत है। अगर दलितों पर अत्याचार होता है तो न्यायपालिका को भी कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए, दलितों को मुआवजा देना चाहिए। दलितों के जो खाली आरक्षित पद हैं, जिनको आपने नहीं भरा है, दलितों के उन खाली आरक्षित पदों को भरना चाहिए।

लोग कहते हैं कि इस पर राजनीति मत करिये, यह सदन तो राजनीति करने के लिए ही है, यहां राजनीति नहीं करेंगे तो क्या पूजा-पाठ करेंगे। यह सदन क्या दूध पिलाने और भगवाकरण के लिए है? यह राजनीति का अखाड़ा ही नहीं है, बल्कि अगर मंझे हुए राजनैतिक लोग अगर आएंगे, वही तो देश के हित का काम करेंगे व अपनी व्यथा को, अपनी भावना को व्यक्त करेंगे।

उपाध्यक्ष महोदय : अब समाप्त कीजिए।

श्री राम प्रसाद सिंह : बड़े-बड़े जो जीवित उद्योग-धंधे हैं, कारखाने हैं, उनका डिसइन्वैस्टमेंट किया जा रहा है, उनको बेचा जा रहा है और जो मृत हैं, उनको नहीं बेचा जा रहा है। उन्हें कौड़ी के भाव बेचा जा रहा है, मुनाफा कमाया जा रहा है। उनमें क्या पिछड़ों को, दलितों को आरक्षण का लाभ मिलेगा, नौकरी मिलेगी-नहीं मिलेगी। उनको भी आप खत्म कर रहे हैं। आप इस देश में एक ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं जिसमें दलितों का शोषण हो, एक्सप्लायटेशन हो, दलितों पर अत्याचार बढ़े, यह सब आप इसके लिए कर रहे हैं। इसी के साथ इस देश में साम्प्रदायिकता का नंगा नाच हो, देश टूट जाये, खंड-खंड हो जाये, यह जो आपकी विचारधारा है, मैं यह निवेदन करता हूं कि इन भावनाओं से दूर होकर हम सब लोग मिलकर दलितों की रक्षा के लिए कड़ा से कड़ा, अच्छे से अच्छा कानून बनायें और उनका हित करें, उनकी मदद करें। धन्यवाद।

उपाध्यक्ष महोदय : कैप्टन इन्द्र सिंह जी और रामजी लाल सुमन जी, जो अनपार्लियामेंटरी वर्ड है, जहां-जहां आया है, वह एक्सपंज होगा।    

SHRI E. PONNUSWAMY (CHIDAMBARAM): Thank you very much, Mr. Deputy-Speaker, Sir.

I rise to participate in the discussion on atrocities on dalits. It is quite evident from the scene here how much interest we all show on the interests of the dalits here.

I have been patiently waiting for five hours to have a few minutes from you. Here, I do not want to blame any individual or this Government or that Government for the plight of the dalits today, which has also been their plight for centuries together. Orthodoxy is the reason for the plight of the dalits.

I do not know who called me an ‘untouchable’ and why.

20.00 hrs.

Why should a particular group of people be called by so many names like Harijan, Scheduled Caste, depressed or oppressed or Dalit? I do not know what sin these people have committed.

Since one is born as a Dalit, the nation thinks that it has no name for him. More than 30 per cent of the population of this country are denied their rightful rights. They have been completely obliterated by Chaturvarna.

Sir, the man’s four characters are the Brahman, Kshatriyam, Vaishyam and Shudram. That is knowledge, strength, trade and labour. These four characters have been converted into four castes. But this unfortunate group of people has been kept away from this Chaturvarna. They have been kept away as `untouchables’ and they can call themselves as `Awarnas’. But this very system, by the orthodoxy, made the plight of this group of people worse today. Even after 55 years of Independence and Centuries together … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri E. Ponnuswamy, the time of the House was extended from 7.00 p.m. to 8.00 p.m. Now, it is 8.00 p.m. Is it the pleasure of the House to extend the time of the House for one more hour?

SEVERAL HON. MEMBERS: Yes, Sir.

MR. DEPUTY-SPEAKER: So, the time of the House is extended up to 9.00 p.m.

कुंवर अखिलेश सिंह: उपाध्यक्ष महोदय, एक घंटे से क्या होने वाला है। अभी तो दस वक्ता और बोलने वाले हैं इसलिए आप सीधे दो घंटे बढ़ा दीजिए। …( व्यवधान)

श्री रामदास आठवले :आप कल रिप्लाई के समय मेरा भाषण रख दीजिए।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप अभी तो भाषण होने दें।

...( व्यवधान)

SHRI E. PONNUSWAMY : Sir, in this august House my esteemed colleagues have forcefully and in a focussed manner have spoken on the atrocities on Dalits. They have also reeled out ream of facts and figures. Of course, nothing is going to be changed unless it is implemented. No amount of law can do anything to change the situation unless the change of heart is there. Not any particular Government – I do not want to blame any particular Government – can do anything by even scores of laws and the provisions, as the figure shows. Nothing can be done unless there is sincerity, and there is a change of heart. I would like to say that nothing else could change the situation.

Mahatma Gandhi has accepted Dr. B.R. Ambedkar as one of the three intellectuals or the tallest leaders of the world, but our nation denies this rightful position to this national leader. However, he is called a Dalit leader. So, the nation is responsible for this system. I do not want to blame any individual. Right from the British period and Centuries together the system of Manu Dharma was there.

So, the change of heart is quite essential for removal of not only untouchability but also caste system. As Mahatma Gandhi rightly said, this is a blot on the face of the society. But it is a man-made thing. So, the blot must be removed only by a man. Even God cannot do anything. Man has created God; not God has created man. Man is responsible for all the ills. I do not know what sins these people have committed, to be kept away from the mainstream.

Sir, I was seated away from the main class room in school and I was kept away from the mainstream of my village. Even today, after so many years of Independence, my village people are divided. They are not able to draw water from a common well. They cannot walk on the streets where Hindus live. So, what is happening in this nation?

We have more than 100 crore people, and the nation is proud of our population.

But one single largest group of population, these dalit people have been denied and are being denied their rightful share of this nation. Sir, change of heart is needed. I understand that once Dr. Ambedkar was jocularly making the comment: ‘When these people wanted Ramayana, they went to Valmiki who was a Scheduled Caste; when they wanted Maha Bharat, they went to Vyasa, who was also a Scheduled Caste; and when they wanted Constitution, they came to me and I am a Scheduled Caste.’ Such intelligence these people possess! Sir, these people are second to none in intelligence and in hard working. In all the fields, these people have contributed. I can say that they have contributed the largest share in the development of this country, but still a single individual, a Scheduled Caste boy in my constituency is not able to get a loan of one lakh rupees from the bank. He went from pillar to post, but he was thrown out. Even after one year, he is yet to get loan in spite of my recommendation. This is the situation.

Sir, no amount of law, no amount of provision, no amount of Government administration can do anything to change this plight of this group of people unless there is sincerity, there is a change of heart. Only very sincere implementation can do something. I appeal to the nation through this august House ‘change yourself’. Time and again, you have been thrashing these people for centuries together for no fault of theirs. You have called them untouchables. I do not know why you have called them untouchables. After 25 years of hard work, Dr. Ambedkar wrote a classic masterpiece calledWho are shudras and Untouchables. Everyone should read it. I do not want to politicise this issue. The issue of atrocities on dalits is a national issue.

Whoever is there in the seat of Administration, he is responsible for the plight of people of this group, but unless there is sincerity of purpose, there is a change of heart, there is a change of mind, nothing can happen and nobody can change their plight. No amount of law can change the situation.

I would request the hon. Members of this House as they are leaders of every constituency of this nation to think and think again what we shall do for this largest group of people of this nation. They have contributed their might. They suffer and they live in bastis which have no basic facility. In 1,400 villages of my constituency, 1,400 colonies are there. Even drinking water is not there. For drinking water, they go miles and miles to fetch a bucket full of water. There is no road. There is no electricity. There is no provision. What I can say is that if it rains, or shines only the sky is their roof. Like that, people are being thrashed. One hon. Member from the other side of the House has given all the facts and figures. Here also, our esteemed colleague has forcefully – I do not know his name – spoken all the truth of the situation and the plight of these people.

All the Members cutting across the party lines give all the facts and figures, but the figures remain figures. The writing is there on the wall, but our younger generation has begun to question. They cannot keep quiet. I mean to say whether it is the plight of dalits, non-dalits or any other section of the society, they should think of the poor people. The poorest of the poor people are dalits. They should be uplifted by the very of the people who did them wrong. Whoever rules this nation, they should think that this majority of people could no longer be kept away from the mainstream.

Sir, Swami Vivekanand said : ‘He is a fellow who takes only the grovel, ragi kanji and is able to build this nation quite high and supreme.’ If he is given all the facilities of five-star standard, what will be his strength, what will he do? As he has constructed, as he has contributed to the development of the nation so far for centuries together, he will do wonders. Anyway, I am really grateful to my esteemed colleagues who are sitting here who are nearly three dozen Members. All the 543 Members of this House should think that this group is more important because this group is their vote bank.

You are treating them as pawns on the board; you are treating them as a ‘vote bank’. All the leaders claim that this group is electing them as representatives of the people.

You should give them their due share. Through this august House and through you, Sir, I appeal to the nation to think about this unfortunate group, to think of their plight and think of their situation. Their situation is becoming from bad to worse.This should change, yes, to the better.

I will just conclude my speech in one sentence. As I have already stated, our younger generation is restless and they want their due share. Whoever is responsible must give them their due place so that the country will flourish, the nation will develop and, with their due share, these people will also be uplifted.

Thank you very much for the opportunity that you have given to me.        

श्री भान सिंह भौरा (भटिंडा) : उपाध्यक्ष महोदय, दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं, हम उस पर बहस कर रहे हैं। जब से हिन्दुस्तान आजाद हुआ है, उसी वक्त से यह मामला चल रहा है और भारत सरकार ने गरीबी दूर हटाओ के नारे भी लगाए लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है। आपको पता है कि गरीबी दूर करने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान तीन चीजें चाहिए। अगर रोटी, कपड़ा और मकान है तो सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन रोटी, कपड़ा और मकान ही नहीं मिल रहा है। हिन्दुस्तान में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले चालीस करोड़ लोग हैं जिनमें से नब्बे फीसदी लोग एससीएसटी के हैं। उनको मकानों की समस्या भी है। पंजाब सबसे खुशहाल प्रदेश है। वहां भी जो मकानों की हालत है, एससी लोगों में से पचास प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनके पास मकान हैं लेकिन वे रहने के योग्य नहीं हैं। उनके पास छोटा सा मकान है जिसमें पशु भी रहते हैं। उनके रहने के लिए लिए कोई इंतजाम नहीं किया जाता। उन लोगों के बच्चों की एजुकेशन का मामला भी बहुत घटिया है। जो स्कूल खुले हुए हैं, जो सरकारी स्कूल हैं, उनमें पढ़ाई बहुत कम होती है और पब्लिक स्कूल में अमीर लोगों के बच्चे जाते हैं। इसलिए बहुत सारे गरीब लोगों के बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं। दलितों पर अत्याचारों के मामले उन स्टेट्स में ज्यादा हैं जहां पर धर्म के नाम पर राज किया जाता है। हमारे पास फिगर्स हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में अत्याचार होते हैं। उसके बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में होते हैं। लैफ्ट पार्टीज की जहां सरकार हैं, वहां पर नहीं है। वेस्ट बंगाल में १९९७ में ज़ीरो है। सन् २००१ में चार केस हुए हैं। पंजाब में ११ केस १९९७ में हुए और ३३ केस २००१ में हुए और वह भी उस वक्त जब बीजेपी की सरकार थी। इसलिए हम देखते हैं कि जो बड़े लोग हैं, वे अत्याचार करते हैं। उनके अत्याचारों के खिलाफ लड़ने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि गरीब लोगों को इकट्ठा किया जाए।

अभी हमारे एक साथी ने कहा कि दो एकड़ जमीन से क्या होगा। मैं कहना चाहता हूं कि जमीन आज स्टेटस का मामला है इसलिए दो एकड़ तो क्या, एक एकड़ भी हो तो कोई बात नहीं है। इससे कोई उसको यह नहीं कहेगा कि मेरे खेत में मत आना। जहां भूमि सुधार हुआ है, वहां गरीबों को और दलितों को, जिनको जमीन नहीं मिली है, मिलनी चाहिए। बड़े-बड़े जमींदार सारी जमीन ले गए और वे गरीबों का शोषण करते हैं। इसलिए पूरे देश में भूमि सुधार करना जरूरी है। जमीन का बंटवारा होना चाहिए और गरीबों को जमीन मिलनी चाहिए।

जहां तक अत्याचारों को रोकने का मामला है, हमने देखा है कि ज्यादातर केसेज में अत्याचार करने वाले लोग छूट जाते हैं। उसमें सरकारी मशीनरी आज तक कामयाब नहीं हो पाई है। मेरे पास एक रिपोर्ट है। उसके हिसाब से १९९८ में ६८५८ केस रजिस्टर्ड हुए। उसमें से केवल २९१५ केसेज में चार्ज शीट दाखिल हुई। उसमें भी २४० लोग कन्वीक्ट हुए और १६०० लोग छूट गए। इसी तरह से १९९९ में टोटल केस ६८३८ रजिस्टर्ड हुए, ३९२ केसेज में चार्ज शीट हुई, २३६ कन्वीक्ट हुए और २३५९ छूट गए। इसी तरह से २००० में ६६७९ केस रजिस्टर्ड हुए, ३०५७ केसेज में चार्ज शीट हुई, २९३ कन्वीक्ट हुए और २१०९ छूट गए। २००१ में ५९१५ केस रजिस्टर्ड हुए, १९६६ केसेज में चार्ज शीट हुई, २९० कन्वीक्ट हुए और १६७८ छूट गए। इसका मतलब यह है कि जो पुलिस वाले हैं, वे केसेज को ठीक से फालो नहीं करते इसलिए अधिकांश अत्याचार करने वालों को सजा नहीं होती। अत्याचार करने वाले यह समझते हैं कि हमें कुछ नहीं होगा इसलिए वह अत्याचार करते रहते हैं। मैं समझता हूं सरकार को इसमें कोई ऐसी मशीनरी कायम करनी चाहिए जो दलितों पर अत्याचार करने वालों को सजा दे सके।

आज आरक्षण खत्म किया जा रहा है। वनिवेश और निजीकरण की प्रक्रिया के चलते आरक्षण खत्म हो रहा है। इसलिए हमारी मांग है कि प्राइवेट सेक्टर में भी आरक्षण होना चाहिए। जमीन को बांटकर अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों में देना चाहिए। अगर इन सब बातों पर सरकार ध्यान देगी तो दलितों पर होने वाले अत्याचारों को ठीक से टैकल किया जा सकता है और उसमें कमी आ सकती है। कई माननीय सदस्यों ने, जैसे शमशेर सिंह दुलो जी ने, बातें यहां कही हैं, मैं उनका समर्थन करता हूं। दलितों पर हो रहे अत्याचार से लड़ने के लिए सब लोगों को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इकट्ठा होकर दलितों के पक्ष में कार्य करना चाहिए। इस तरह से हम दलितों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लड़ सकते हैं।        

श्री हरपाल सिंह साथी (हरिद्वार) : उपाध्यक्ष जी, दलित समाज पर अत्याचारों को लेकर इस सदन में चर्चा हो रही है। लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि यह दलित शब्द मेरे गले से नीचे नहीं उतर रहा है। दलित शब्द का प्रयोग राजनैतिक भाषा के तहत किया गया है। दलित हमारे संविधान में कहीं नहीं है। जिस समाज को दलित कहा गया है वह समाज दलित नहीं है। दलित हम उसको कहते हैं जो चोरी करता है, जो डाके डालता है, जो झूठ बोलता है, जो कम तोलता है और जो प्रजातंत्र का गला घोंटता है।

SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): Sir, I am on a point of order… (Interruptions) क्या यह इनकी नयी परिभाषा है?

श्री हरपाल सिंह साथी: ये मेरे अपने विचार हैं।

MR. DEPUTY-SPEAKER: It is his own definition of dalit. How can you object to it? उनकी अपनी परिभाषा है, आपको क्या दिक्कत है?

… (Interruptions)

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : Sir, the word dalit came from the word ‘depressed’. It is an English word which was translated… (Interruptions)…But here, he is giving another definition of dalit… (Interruptions)

MR DEPUTY-SPEAKER: At least, he already said, what he speaks, does not go below his throat.

… (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: How can you object to it?

… (Interruptions)

SHRI PRAVIN RASHTRAPAL : He is defining dalit in a wrong way. That is the objection. It is going on record… (Interruptions)…I am proud of being a dalit. I was born as dalit… (Interruptions)

SHRI DALIT EZHILMALAI : It is his interpretation… (Interruptions)

श्री हरपाल सिंह साथी: मैं पुन: कहना चाहता हूं कि जिस समाज को दलित कहा गया है वह श्रेष्ठ समाज है। यह वह समाज है जिसकी गोद में भगवान राम के बच्चों ने शिक्षा पाई। क्या आप बाल्मीकी जी को दलित कहेंगे जिनके मंदिर में भगवान राम के बच्चों ने विद्या पाई। जिस समाज में बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर पैदा हुए हों, क्या उस समाज को आप दलित कहेंगे। जिस समाज में महाभारत के रचयिता वेद-व्यास हुए हों, क्या आप उस समाज को दलित कहेंगे? अनुसूचित जाति का कह सकते हैं। हिंदू समाज में तीन ग्रंथ मशहूर हैं - रामायण, महाभारत और भारत का संविधान। इन तीनों के ही रचयिता अनुसूचित जाति के लोग हैं, हम उन्हें दलित नहीं कह सकते हैं। इसलिए मैं सदन से अपील करना चाहता हूं और माननीय राष्ट्रपाल जी, आप मेरी बातों को अन्यथा न लें…( व्यवधान)आप हमारे बहुत ही अच्छे वक्ता हैं, विद्वान आदमी हैं, मैं आपकी बातों का स्वागत करता रहा हूं। यहां दलितों के बारे में बातें हुई तो मैंने यह बात कही है। आप देखें कि सदन में केवल अखिलेश सिंह जी को छोड़कर बाकी के सारे अनुसूचित जाति के लोग बैठे हुए हैं। जब दशहरा होता है तो अनुसूचित जाति के लोग बड़ी संख्या में रामलीला देखने जाते हैं, किसी पीर का या हिंदुओं का कोई त्योहार हो तो बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति के लोग उसे मनाते हैं। लेकिन जब इस सदन में अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचारों की बातें हो रही हैं तो यहां पर अनुसूचित जाति के लोग ही कहने वाले और सुनने वाले रह गये हैं। मैं किसी राजनैतिक दल की बात नहीं कर रहा हूं। उधर भी राम के मानने वाले लोग हैं, इधर भी राम के मानने वाले लोग हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इधर वाले हिंदू हैं लेकिन मेरा मानना है कि इधर भी हिंदू हैं उधर भी हिंदू हैं। आज मुझे दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि जब यह चर्चा चल रही है तो विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम-ईसाई सभी लोगों को इस चर्चा में हिस्सा लेना चाहिए था।

जिससे अनुसूचित जाति के लोगों के मन में भावना उठे कि वास्तव में यहां पर अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार हो रहा है। …( व्यवधान)

कुंवर अखिलेश सिंह: अत्याचार करने वाले यहां नहीं हैं, तो सुनेंगे कैसे।…( व्यवधान)

श्री रामानन्द सिंह : महोदय, मुझे भी अपनी बात समर्थन में रखनी है।…( व्यवधान)

श्री हरपाल सिंह साथी: यह वर्ग जो अनुसूचित जाति से है, सदियों से जहर खाकर जीवित रहे हैं। गांव के बाहर बसाए गए, फिर भी जीवित रहे। मरे हुए मवेशियों का मांस खाया, फिर भी जीवित रहे, पर हमने इस समाज को तिलांजलि नहीं दी, इस समाज का बुरा नहीं किया। इस समाज से हम अलग नहीं हुए, परन्तु उसी समाज के लोग अनुसूचित जाति के लोगों पर बड़े-बड़े अत्याचार करते हैं। उनकी बहू-बेटियां की इज्जत लूटते हैं। उनको गांव से बाहर बसने के मजबूर करते हैं। घोड़ी पर चढ़ते हैं, तो उत्पीड़न करते हैं। इससे दर्द होता है। आखिर हम भी इंसान हैं और हमारे बुजुर्गों ने भी समाज में योगदान दिया है। मैं महर्षि दयानन्द जी का अनुयायी हूं। उन्होंने कहा था, राजनीतिक कारणों से यहां पर छुआछूत को मिटाया गया। राजनीतिक कारणों से यहां पर समानता लाने की बात कही गई। मेरा मानना है, अगर समानता लाने की बात कही गई है, छुआछूत मिटाने की बात कही गई है, तो वह महर्षि दयानन्द जी की वजह से हुई है। उन्होंने घर-घर जाकर पहनने का अधिकार दिया, यज्ञ करने का अधिकार दिया और बराबर बैठने का अधिकार दिया है। महर्षि दयानन्द जी ऩे समाज को जगाने का काम किया है। मैं एक ही बात कहना चाहता हूं, ४० सालों की आजादी के बाद भी शिक्षा का स्तर बराबर नहीं है। अभी सुखराम जी ने कहा कि रिजर्वेशन समाप्त होना चाहिए। मैं भी कहता हूं कि समाप्त होना चाहिए। लेकिन समाप्ति से पहले शिक्षा की बराबरी होनी चाहिए। एक अमीर का बच्चा और एक गरीब बच्चा उसी स्कूल में शिक्षा पाए, उस स्कूल में हाई स्कूल पास करे और उसी स्कूल में १२वीं पास करें। इसके बाद रिजर्वेशन खत्म कर दो। रिजर्वेशन की जरूरत नहीं होगी। लेकिन यह नहीं चलेगा कि शिक्षा में कमी हो और गरीब का बच्चा, अनुसूचित जाति का बच्चा बिना छत की स्कूल में पढ़े और एक धनाडय का बच्चा डून स्कूल में शिक्षा प्राप्त करे। यदि यह होगा, तो कैसे बराबरी हो जाएगी। मैं पूछता हूं, क्या यह अत्याचार नहीं है? क्या इसको अत्याचार की संज्ञा नहीं दी जा सकती है? क्या मारपीट को ही अत्याचार की संज्ञा दी जाएगी? मुझे ऐसा महसूस हो रहा था, किसी परिवार में अशुभ चिट्ठी आ जाए और उस परिवार के लोग रोने लगें और वहां आस-पड़ौसी की महिलायें भी आ जायें। ऐसी स्थिति में रोना-धोना न करके सब अपना-अपना रोना लगें। ऐसी हालत लग रही थी। कहा जा रहा था कि हमारे नेता ने यह कर दिया और हमारे नेता ने यह तीर चला दिया। हमारे नेता ने अनुसूचित जाति को ऊपर उठा दिया। ५५ साल की आजादी के बाद इस दिशा में क्या प्रगति हुई है, इस बारे में मैं भी आकंड़े दे सकता हूं। मृत्यु में कोई कमी नहीं आई है और इन पर अत्याचार हो रहे हैं। मेरे पास भी आंकड़े मौजूद हैं। कहा जा रहा है कि पांच साल की सरकार ने क्या किया, मैं कहना चाहता हूं कि बंगलादेश की लड़ाई बाबू जगजीवन राम के नेतृत्व में लड़ी गई, लेकिन भारत रत्न श्रीमती इंदिरा गांधी को दे दिया गया। क्या बाबू जगजीवन राम जी उसके हकदार नहीं थे? उनके नेतृत्व में एक लाख बंगलादेशी फौज के लोग बन्दी बनाए गए। केवल हिन्दुस्तान में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में रिकार्ड बना, जो लड़ाई बाबू जगजीवन राम जी के नेतृत्व में लड़ी गई। बंगलादेशी बन्धक बनाकर हिन्दुस्तान लाए गए। क्या जगजीवन राम जी भारत रत्न के अधिकारी नहीं थे? यह अपवाद कब तक चलेगा?

उपाध्यक्ष महोदय : अब आप अपनी बात समाप्त कीजिए।

श्री हरपाल सिंह साथी: बहुत देर-देर तक लोग अपनी बात कहते रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आपकी पार्टी के अन्य लोगों को भी बोलना है।

श्री हरपाल सिंह साथी: सदन में सवर्ण जाति के लोग हैं। मैं हरिद्वार से चुनकर आया हूं. मैं अपने क्षेत्र में अनुसूचित जाति और सवर्ण के बीच में यदि कोई झगड़ा होता है, तो वहीं उसको निपटाने की बात कहता हूं। आइए, आप भी अपने कन्धों पर इस बात का संकल्प लीजिए कि हम अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार नहीं होने देंगे।

जहां होगा, वहां अड़ जाएंगे और जहां होगा वहां इन्साफ दिलाएगे लेकिन नहीं, राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की बौछार होती है, बड़े-बड़े जलसों का आयोजन किया जाता है, बड़ी-बड़ी सभाएं की जाती हैं, परन्तु दिल की बात दिल में है, जो होनी चाहिए। फिर उनके रिश्तेदार आ जाते हैं, फिर परिवार वाले आ जाते हैं और दूसरे लोग आ जाते हैं। अनुसूचित जाति के आदमी या महिला जिस का उत्पीड़न किया गया है, वह अपना मन मसोस करके रह जाता है।

साथियों, आपको आना है। यदि आप वास्तव में अनुसूचित जाति के लोगों का भला करना चाहते हैं, उन्हें समाज में बराबरी का स्थान दिलाना चाहते हैं तो आइए और कसम खाइए कि हम अनुसूचित जाति के लोगों के लिए भी रात-दिन काम करेंगे और समता मूलक व्यवहार करके उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाएंगे जिससे कोई समस्या नहीं रहेगी।

एक दूसरे समाज जिसे मुस्लिम समाज कहते हैं उसमें तेली, जुलाहे और कारपैंटर आते हैं लेकिन वे बराबर बैठते-उठते हैं। एक वह समाज है जिस में हम हैं। यदि बराबर बैठने की बात आ जाए तो आसमान टूट पड़ता है। जब तक बराबरी का दर्जा देने की बात नहीं आएगी, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा। ऐसे अत्याचार बेलछी से हो रहे हैं और होते चले जाएंगे। यदि उन्हें बराबरी देना चाहते हैं और अनुसूचित जाति के लोगों का मनोबल बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें बराबरी का दर्जा दें, बराबरी का व्यवहार करें। यही मेरा कहना है।

श्रीमती संतोष चौधरी (फिल्लौर): उपाध्यक्ष महोदय, बहुत-बहुत धन्यवाद। साढ़े पांच घंटे से दलितों पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं पर चर्चा चल रही है। यह चर्चा पिछले ५५ सालों में कई बार हुई होगी लेकिन इसका क्या समाधान निकला, यह सब को मालूम है। पहले गेहलोत जी बोल रहे थे उन्होंने कहा कि इस चर्चा में भाग लेने के लिए उन्हें लाइब्रेरी जाकर कुछ कनसल्ट करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि १९८४ के बाद सदन में अब यह चर्चा आई है। वह यहां बैठे नहीं हैं। मैं उनसे पूछना चाहती थी कि इन १६-१७ सालों के बाद दलितों पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं पर चर्चा करने का मौका मिला तो इसके क्या कारण हैं? जिन सदस्यों ने इसमें हिस्सा लिया उन्होंने अपने विचार यहां व्यक्त किए। जब हम दिन-प्रतदिन अपने चुनाव क्षेत्रों में रहते हैं, पत्राचार के माध्यम से, समाचार पत्रों के माध्यम से और मीडिया के माध्यम से यह सुनते और देखते हैं कि रोजाना दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं, हमने इन्हें रोकने के लिए एक्ट भी बनाए लेकिन उसमें क्या हो रहा है, यदि हम सभी सांसद जो इस सदन में बैठते हैं, मिल कर अपने चुनाव क्षेत्रों की कठिनाइयों और दलितों पर जो अत्याचार होते हैं, उनका समाधान कर लें तो बहुत कुछ हल हो सकता है। हम यहां राजनीति को अधिक स्थान देते हैं और गरीबों के नाम पर राजनीति करते हैं। यह कहना कि राजनीति की बात नहीं करनी चाहिए लेकिन वास्तविकता क्या है? जितनी जनसंख्या हिन्दुस्तान की है उसका एक तिहाई हिस्सा गरीब लोगों का है और वही लोग हमें यहां चुन कर भेजते हैं। आज वे हम से क्या आशा कर रहे हैं? आज चर्चा के समय यहां नोक झोंक ही हो रही थी। कोई समाधान निकालने की बात नहीं की गई।

राष्ट्रपाल जी जो कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं, उन्होंने यहां जो विचार व्यक्त किए मैं उन सभी को यहां व्यक्त करना चाहती थी। मुझे इस बात का गौरव प्राप्त है कि १९७५ में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने मुझे पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन का सदस्य नियुक्त किया।

६ साल तक सदस्य रहने के बाद मुझे ६ साल तक पब्लिक सर्विस कमीशन का चेयरमैन रहने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने १२ वर्ष तक अपनी आंखों से देखा है कि दलितों के साथ कितना अमानवीय अत्याचार होता है। उसका हल निकालने की कोशिश हम लोगो ने की और उसमें हम लोग सफल हुये। जहां तक दलितों को नौकरी देने की बात है, पहली बात तो यह है कि वह एप्लाई नहीं करता, अगर करता है तो उसकी एप्लीकेशन रिजैक्ट हो जाती है। अगर खुशनसीबी से उसका एप्लीकेशन क्लीयर हो गया तो उसे इंटरव्यु लैटर नहीं दिया जाता। यदि इंटरव्यु लैटर दे भी दिया जाये तो सिलैक्शन में फेल कर दिया जाता है। यदि सिलेक्शन हो जाये तो मैडिकल में फेल कर दिया जाता है। यदि कहीं नौकरी मिल भी गई तो उसे इतनी दूर भेज दिया जाता है कि वह अपने परिवार से काफी दूर हो जाता है। वह कम सैलेरी में गुजारा नहीं कर पाता। वह गरीब परिवार से है। इस बारे में मेरी डा. जटिया से वार्ता होती रहती है। अनुसूचित जातियों से संबंधित संसदीय कमेटी भी बनी है जिसका सदस्य रहना मेरा सौभाग्य रहा है। मैं ही नहीं, मेरा पिता और मेरे ससुर भी उस समति के सदस्य रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि उनके पास कोई पावर्स नहीं हैं जो एकाउंटेब्लिटी फिक्स कर सके। वहां अफसर लोग जाते हैं। अखबार में खबर आती है कि किसी दलित को जला दिया गया,. उसे मार दिया गया लेकिन अत्याचार स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक है। चपरासी से लेकर कर्मचारी तक हो रहा है। न केवल कलेक्टर बल्कि आई.पी.एस. के साथ अत्याचार हो रहा है। गरीब मजदूर के साथ हो रहा है लेकिन इसका कोई समाधान नहीं मिल रहा है।

उपाध्यक्ष महोदय, मुझे याद है कि जब मैं पब्लिक सर्विस कमीशन से यहां आई हुई थी तो नोटिस ऑफिस में देखा कि संसद में दलितों पर अत्याचार से संबंधित एक्ट पास होने वाला है। मैं दौड़कर लॉबी में पहुंची। मुझे मन में बड़ी खुशी हुई लेकिन आंखों में आंसू आ गये। क्योंकि जो सदस्य चर्चा कर रहे थे, वह अत्याचार मुझ पर भी हो रहा था क्योंकि मैं एक महिला थी। मैं संघर्ष कर रही थी, बहुत छोटी उम्र मेरी थी। बाबा साहेब अम्बेडकर के शब्द कहे थे कि शक्षित होना जरूरी है, संघर्ष करना जरूरी है, संगठित होना बहुत जरूरी है। इन शब्दों को लेकर मैं आगे बढ़ रही थी। ये सब बातें इसलिये कह रही हूं कि जब आज यहां चर्चा हो रही है तो पूरे हाउस में पूरे सदस्य क्यों नहीं हैं। सवर्ण जाति के सदस्यों को समय क्यों नहीं दिया गया। जिन लोगों को उनके वोट की जरूरत है, वे इस चर्चा में भाग लेते और हम लोग सुनते। हम दुख-दर्द जानते हैं और यह भी जानते हैं कि इसका कोई समाधान नहीं है जब तक कि हम प्रयास न करें।

सभापति महोदय, मैं पंजाब से आती हूं। पंजाब पहले नं. एक पर था लेकिन अब पीछे हो गया है। दलितों के दरवाजे से जो पानी जाता है, सारे गांव से उस पानी को नहीं निकलने दिया जाता, वहीं घूमता रहता है। वहीं दलितों की बस्ती है। मैंने कहा कि सब कुछ यहीं रह जाना है। लोग मान गये और नीचे से पाइप निकाल दिया। इस तरह के प्रयास की जरूरत है। अगर हम इस तरह की चर्चा करते हैं, एक-दूसरे पर दोषारोपण करते रहेंगे, इसका कोई समाधान नहीं निकल सकता। इन कार्यों में मानसिकता की आवश्यकता है। यही मानसिकता हमें ऊपर उठने नहीं दे रही है। अगर कोई दलित पढ़ा-लिखा है तो सब ठीक है लेकिन समाज को पता चल जाये कि वह एस.सी. है तो थर्मामीटर का पारा नीचे चला जाता है। मैंने यह सब कुछ महसूस किया है और देखा भी है। ऐसा बहुत कुछ नज़दीक से देखा है।

श्री राजीव गांधी जी जब प्रधान मंत्री थे, तो उन्होंने बहुत अच्छे कार्य किये। उन्होंने पंचायत राज और तालुका लैवल पर रिजर्वेशन की व्यवस्था की, जिसमें महिलाओं को भी रिजर्वेशन दिया गया। महिलाओं के साथ भी वही कुछ हो रहा है जो अनुसूचित जाति के लोगों के साथ हो रहा है। महिलाओं और अनुसूचित जाति के लोगों के लिए उन्होंने रिजर्वेशन की व्यवस्था की, जिससे हर पंचायत में लाखों की तादाद में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग आज सरपंच हैं और पंचायतों में हिस्सा ले रहे हैं, नगरपालिकाओं में हिस्सा ले रहे हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से दो-चार बातें और कहना चाहती हूं। जब तक न्यायपालिका में यह व्यवस्था नहीं होगी, क्योंकि अगर कोई केस शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स के लोगों के ऊपर हो जाता है, अभी यहां पर डी.पी.टी.ओ. की बात हुई थी। जब जनता-जनार्दन सड़कों पर अग्नि लेकर बाहर निकल आई थी, संघर्ष करने के लिए तैयार हो गई थी, उस समय यह मुद्दा यहां पर उठाया गया था, यहां पर लाया गया था। कुछ महीनों के बाद यह स्टेट्स में भेजा गया तो जनरल कैटेगरी के लोग कोट्र्स में चले गये और अब तक यह हमारे पंजाब में भी लागू नहीं हुआ है। इस तरह की मानसिकता दूर करनी होगी। न्यायपालिका में कोई भी अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग नहीं हैं। अगर हैं, तो नगण्य हैं और जितनी भी सर्विसेज हैं, जहां पर रिक्रूटिंग बॉडीज हैं, चाहे वह बैंकिंग हो, चाहे पब्लिक सर्विस कमीशन हो, आप रिकार्ड निकलवाकर देख लीजिए कि हिंदुस्तान के कितने पब्लिक सर्विस कमीशंस में अनुसूचित जाति और जनजाति के चेयरमैन होंगे। जब तक इन लोगों को ऊंचें पदों पर नहीं बैठाया जायेगा, तब तक इनके दुख-दर्द को कोई दूर नहीं कर सकता है। यह मेरी अपनी मान्यता है और मैं उस तरीके से कार्य करके आगे बढ़ी हूं। मैंने उन लोगों को सर्विसेज के बीच में, जब कि पंजाब की कहने की बात है, उस समय भी सर्विसेज में एक भी व्यक्ति को नहीं रखा जाता था, सबको रिजैक्ट कर दिया जाता था, परंतु मैंने तीन महीनों के बाद इस तरीके से संघर्ष करके कोई भी पोस्ट खाली नहीं रहने दी। चूंकि यह संविधान में है और संविधान में यह प्रावधान है कि जहां पर भी अनुसूचित जाति और जनजाति का बच्चा आये, उसे रिजर्वेशन मिलना चाहिए।

उपाध्यक्ष महोदय, श्री प्रवीण राष्ट्रपाल जी ने जो कुछ कहा है, मैं उससे अपने आपको सम्बद्ध करती हूं। उनके काफी सारे प्वाइंट्स थे, जिसमें जमीन का भी प्वाइंट था और मेरे मन में भी बहुत देर से कुछ प्वाइंट्स थे, उन्हें मैं बहुत गंभीरता के साथ लेना चाहती हूं। इतना कहकर मैं अपनी बात समाप्त करती हूं।

SHRI PRAKASH YASHWANT AMBEDKAR (AKOLA): Mr. Deputy-Speaker, Sir, thank you very much for giving me this opportunity to speak on this subject. I have been in this Parliament for the last 12 years. But this is only for the second time I find that this issue of atrocities on Dalit and the reports of the Commission are being discussed in the House.

Sir, it is a question of how we look at the issue. We know that we have many laws in the country for doing away the practice of untouchability and for doing away the practice of discrimination in the society. I would like to comment on the attitude of the Government.

Sir, with due respect to the hon. Minister of State for Home, Shri I.D.Swami, I would like to submit that the message that will go to the Administration, who is going to implement the policies on ground, is most important, according to me. It is the message that is most important. The message, as I see it, that will go from this discussion is that the Ruling Party has taken this discussion very lightly. This is because none of the senior Ministers who are concerned with the implementation of theDalit issues are present here. It is not only the Ministry of Social Justice and Empowerment that is responsible for it but there are other aspects to it like the Tribal Development Plan, the Special Component Plan. These issues are to be dealt with by other Ministries that are responsible for the development of the Dalits.

Sir, I would not dwell much on this for a long time. The atrocities over a period of time are changing in nature. It is a good and healthy sign and I accept that the society is changing.

But the pace at which it is changing is a very slow and that too in a very small space. Atrocities which were being committed on an entire community has now turned into individual cases of atrocities, as far as physical atrocity is concerned. I divide atrocities into two parts; one is physical in nature, which can be seen and therefore can be demonstrated. But there are other kinds of atrocities which are not physical, but mental in nature which are unseen and can only be felt. What we have addressed till today are the atrocities which are physical in nature. The atrocities that are mental and which can only be felt are yet to be addressed in this country.

With this in mind, I can say that I was responsible to bring about a change. In 1989-90 when an alternative Government was being thought of and a manifesto was being prepared for the Janata Dal, we had made one important provision. That provision was to bring an amendment to the Constitution to effect a change from ‘Commissioner’ to ‘Commission’. This was a major change that was sought to be brought about by way of this Constitutional amendment. Previously, the recommendation of the Commission was only recommendatory. It was not binding on the Government; nor was it implemented. The only thing that was happening was that it used to be laid on the Table of the House and discussed occasionally. The Ministry had to do the rest. We, who were fighting for the cause of the backward classes and Dalits, said that unless there is a machinery which looks into it and investigate it independently, the process of sensitisation will not start and sincerity in the Government processes will not come about. Therefore, in 1990 the amendment was brought about.

I will tell you one experience of mine which I wanted to share with this House. The first Chairman of the Commission, Shri Ramdhan and I happened to travel in his constituency, Gorakhpur. That was our first visit to Gorakhpur after that amendment. Let me tell you that not just one Collector or District Magistrate, from the Gorakhpur Commissionerate all the District Collectors were present there to receive him. There were all the SPs present to receive him. Being on the opposite side all the time, we thought that something must have happened and they had come to arrest us. We just enquired with them as to why all the District Magistrates and SPs were present there. They said that they had heard the discussion in Parliament on the Bill and they were not so worried about the Government, but were worried about what order the Commission was going to pass. That was the threat which that Constitution amendment had brought about in the administration.

Let me also say that to the expectation of all of us, some of the orders passed by the Commission were challenged in the Supreme Court. The Supreme Court in its own wisdom passed a judgement which again said that the orders of the Commission were recommendatory. Today, let me say that the Commission has been made absolutely redundant. It is not only toothless, it is a waste, it is waste of time, waste of Government money and harassment to the administration and nothing more than that. Whatever orders they passed, not a single one has been implemented after the judgement was given in 1995.

If this Government wishes to do something for the benefit of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes, I may request the Government to very seriously think as to how and in what manner they can again amend the relevant article of the Constitution.

In that, judgement given by the Supreme Court can be overcome and the Commission’s strength can be retained. Hon. Minister, may I request you to look into the figures during 1991-94? They speak of a situation which I do not want to quote. But you can look into the figures. The rate of atrocities have come down and the rate of conviction, which my hon. friends, have been quoting here and where cases have been lodged was only 5 per cent. During those four years, the conviction rate had gone up to 22 per cent. That was the change. That was the fear that was created in the administration. Social changes are not changes which are accepted by the people because change means giving up something. And nobody likes to give up the privileges which they enjoy. If the changes are to be brought about, then the changes need to be brought about in a manner in which they are acceptable. But behind that, there has to be force and strength of the Government and that constitutional amendment brought about has been taken away.

May I again refer to another issue which is an important issue? It is a tribal issue. I do not know whether the Government had studied the consequences of the Forest Conservation Act, 1980 or not. I would give the Government the parameters because I have worked with the adivasis for quite a long time. Before 1980, the child mortality among the adivasis was less than two per cent. The reason is that the Britishers who framed the Forest Conservation Act in 1920 took away all their rights but gave them the right of enjoying the available fruits in the forest, gave them the right over animals whose life span was less than three years, gave them rights to live in a village and the environment which they like. If you study the Act of 1980, you may see that it took away their right to enjoy the available fruits in the forest and the right over those animals whose life span was less than three years. What was the consequence?

Tribals live in an area which during the rainy season become interlocked. I will come to the area starting from Garhchiroli upto Buxar which comes upto Jharkhand. For four months, till there were roads and bridges, the Collector used to go in the month of May and he used to come out of that area only in the month of October. These areas were totally landlocked by rivers. They were inaccessible and the Collector was responsible. Even in those adverse conditions, the child mortality rate was only two per cent and today, you may see that the child mortality among tribals has increased to 22 per cent. May I ask the Government to kindly amend the Forest Conservation Act? There are certain ways of life which people live. You cannot make them change overnight. It takes generations for people to change. If you are going to take away their basic food during those crucial months, then you are going to have child mortality and nothing more than that.

Lastly, I will come to one important issue of national importance. My friends have already spoken of the Government’s stand taken in Durban.

Let me advise the Government. The United Nations has a membership of 186 countries. The Resolution that we have moved with all the Government backing will be defeated in the General Assembly. It is not that because they are supporting us. There are nearly seventy countries which are facing issues relating to discrimination in their own countries. It might not be on the issue of caste. It is not on the issue of caste. They are having discrimination on other issues. They do not know what is the way out.

I was there in Durban for about a month. There were representatives from nearly 52 countries. They had discussions with us to know as to what means we have adopted to do away with this discrimination. We gave them plethora of laws that we have. We had showed them the institutions that we have developed. We had said that we have all the institutions to do away with discrimination, and what remains to be done is to sensitise the administration and the people who are administering it. Once we do that we will do away with this. They stood by us. We were nobody. We did not have the Government backing. We were just seven members working in that United Nations’ Conference. We were there right from 1994.

Let me tell you that I have been able to defeat the Government of India on every issue related to social discrimination at every place. I am not scoring a point. While we are saying that in our Constitution discrimination exists, the representatives of the Government comes and says on the floor of the House that there is no discrimination in the country. Then the Government of India is becoming laughing stock.

In these Conferences, there is a system which is being followed. Shri Akhilesh was there. Let me tell you that it is very pitiable to see some of my friends reading out speeches without having a heart in it. This Parliament has its own identity. I would request you that at least in the international Parliament forums, this Parliament should not be bound by the Government of India decisions.

कुंवर अखिलेश सिंह: महोदय, मैं इस पर एक मिनट स्पष्टीकरण देना चाहता हूं। आप डरबन सम्मेलन में मेरी स्पीच को निकाल कर देख लें। मैंने सरकार द्वारा दिए गए वक्तव्य को वहां नहीं रखा। मैंने वहीं सदन के पटल पर स्पीच तैयार की।…( व्यवधान)उसकी कापियां भी मेरे पास हैं।…( व्यवधान)मैंने अपनी स्पीच को वहीं पर तैयार किया। बंसल जी हमारे लीडर थे, आप उनसे पूछ सकते हैं। गेहलोत जी भी हमारे साथ थे। सरकार द्वारा दिए गए वक्तव्य को मैंने नहीं पढ़ा, मैंने खुद अपने वक्तव्य को वहां तैयार किया और उसे तैयार करके वहां रखा। उसकी कापियां भी मेरे पास हैं। ( व्यवधान)

श्री प्रकाश यशवंत अम्बेडकर: मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब उन्हें कहा कि आप अपनी स्पीच दे दीजिए तो इन्होंने अपनी स्पीच दे दी, लेकिन बाकी के जितने भी थे,…( व्यवधान)सब पार्लियामेंटरी फोरम में, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का फोरम हो और वहां एमपीज़ जाएं और गवर्नमेंट की बात कहें, मैं उससे सहमत हूं, लेकिन जहां इंटरनेशनल पार्लियामेंटरी फोरम हो, जहां पार्लियामेंट के ही मेम्बर होते हों, वहां मैं समझता हूं कि पार्लियामेंट के मेम्बर ने जो स्पीच देनी है, वह आपके माध्यम से या पार्लियामेंट का जो सैक्रेटेरियट है, वह उन्हें दे, क्योंकि उनकी ऐसी स्थिति होती है कि वे बाद में मुंह दिखाने लायक नहीं रहते। वैसे ही भाषण देते हैं और भाग कर चले जाते हैं।

21.00 hrs.

क्योंकि वहां पर तथ्य और परिस्थिति अपने आप इतनी दुरूह हो जाती है कि वे उसे शेड नहीं दे पाते। इसलिए मैं सरकार से आग्रह करता हूं कि वह इस बात पर गौर करे और मैम्बर्स की बेइज्जती न हो, इसका ख्याल करे। मैंने कांस्टीटयूशन एमेंडमेंट के बारे में जो सुझाव दिया है, उस पर सरकार गौर करे।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी जगह लेता हूं।

DR. RAM CHANDRA DOME (BIRBHUM): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I am thankful to you for allowing me to take part in the discussion on atrocities on dalits. The atrocities on dalits are the legacy of hundreds and thousands of years of our Indian society.… (Interruptions)

उपाध्यक्ष महोदय : हमने टाइम एक घंटा बढ़ा दिया था, अभी ४-५ लोगों का ही नाम बाकी है और इसका रिप्लाई देना है, यह खत्म होने तक हाउस बैठेगा, क्या यह हाउस की राय है?

कई माननीय सदस्य : ठीक है।

उपाध्यक्ष महोदय : हाउस का टाइम सदन की कार्यवाही खत्म होने तक बढ़ाया जाता है।

श्री रामदास आठवले : अगर इसका रिप्लाई कल होता है अच्छा होगा, क्योंकि यहां मैम्बर बहुत कम हैं और यह विषय महत्वपूर्ण है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : रामदास जी, आप बैठिये। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी में कल नियम १९३ के अन्तर्गत ड्राउट पर बहस होनी है, इसलिए कल के लिए इसे पोस्टपोन करना मुश्किल है।

श्री रामदास आठवले : आप इसे कल के लिए पोस्टपोन मत करिये, लेकिन रिप्लाई कल हो जाये।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आप बैठिये, आपको भी मौका मिलेगा। हम सब लोग बैठे हैं। रामदास जी का नम्बर लास्ट बट वन होगा। लास्ट तो मेरा नम्बर होगा न, मुझे हाउस एडजर्न करना है।

DR. RAM CHANDRA DOME : So, what I want to say is that the atrocities on dalits are going on since thousands of years of our Indian society. I can cite a single example from our great Epic theMahabharata. What was the fate of Ekalavya? The great Ekalavya’s thumb was cut. He had to cut his thumb at the instruction of Dronacharya. It is a great example in our Indian society. This legacy has not started in our times. From time immemorial, it has been going on. It is continuing till date. It is going on and the other Ekalavyas are being treated this way. The very socio-economic structure has not changed. The very feudal mindset, the very semi-feudal and semi-capital structure of our society is basically responsible for this sort of a mindset. This is the causative factor to continue the atrocities on the oppressed sections of our society like the dalits or the tribals or the minorities. These sorts of things are going on.

The dalit people of our country, who constitute about one-third of the population of India, are subjugated and oppressed in our society. The highly prevalent caste system in India is responsible for this. The dalit people are at the lower strata of the social order. Even after 56 years of Independence, the basic human rights enshrined in the Constitution of India are denied to those people. Although untouchability is a crime under Article 17 of the Constitution, even though so many legislations were passed like the PCR Act of 1955, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities Act), 1989, yet the practice of untouchability in many forms is prevalent in the society in our country.

They are not even allowed to walk on the streets withchappals and ride cycles on the upper caste streets in some places. Entering in the temples and praying the God is denied for them even today. Fetching water from the common well and bathing in the common tank are denied. In many villages, there are even separate burial grounds for them. They are denied access to the common burial ground in many places. This type of atrocities against dalits are going on in our society even today.

Sir, it is needless to say that the rulers of our country are not interested in implementing the constitutional provisions and also the Acts passed to abolish this inhuman practice of untouchability because of their class interest. Not even institutional arrangements like setting up of Monitoring Committees and Special Courts are done as required by the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989, thus defeating the very purpose of the Act.

Sir, education is considered one of the effective instruments for promoting socio-economic development. The literacy rate of the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes as per 1991 Census was 37.41 per cent and 29.60 per cent respectively against 57.69 per cent for other communities. As per the Annual Report of the University Grants Commission, the proportion of the Scheduled Castes in graduate and post-graduate courses was 8.37 per cent and 8 per cent respectively and the proportion of the Scheduled Tribes was 3 per cent and 2.14 per cent. Another important feature of SC/ST education is lack of access to quality education to compete for higher level positions in Government.

The atrocities on dalits are on increase everyday. They are brutally attacked, murdered, harassed and intimidated. Their houses have been ransacked and set on fire all these years by the upper castes. Recently, five dalits have been brutally murdered in the State of Haryana in an unprecedented way. I hope that this sort of things would not happen in future.

In Tamil Nadu, near Trichy, a dalit was forced to eat human waste and another dalit was forced to drink the urine of the upper caste people near Dindigul. The dalits are being treated in the most inhuman way even today in our country. According to reports available, over 50 cases of atrocities on dalits are reported, 3dalit women are raped, 2 dalits are murdered, 5 cases of riots and 2 cases of arson against their families are reported in a day. Incidentally, these are only reported cases. Hundreds of cases against them go unreported. In most of the cases, dalits are not in a position to get the cases registered against the culprits.

As a result, the crimes against dalits are largely ignored, and police brutality and custodial deaths of the community are common these days. The States of Uttar Pradesh, Rajasthan and Madhya Pradesh have the highest incidents of atrocities against the Scheduled Castes. These three States accounted for 65.4 per cent of the total cases of atrocities committed against the Scheduled Castes in 1999. As far as the incidents of atrocities against the Scheduled Tribes is concerned, it was the highest in Madhya Pradesh in 1999, followed by Rajasthan.

In 2000, out of 1,16,131 pending cases, only 12,956 cases were disposed of. In only 982 cases, the offenders were imprisoned in the whole country. In Uttar Pradesh, 74,307 are cases pending in the courts. Under the present level of disposal, they would need more than 20 years to dispose of all the pending cases.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude now.

DR. RAM CHANDRA DOME : I am concluding within two minutes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: You have already taken 11 minutes.

DR. RAM CHANDRA DOME : Landlessness is one of the main causes of the dalit people remaining socially and economically backward. A majority of the dalit masses are living in the villages. Most of them are engaged in agriculture. But nearly 80 per cent of them are landless agricultural workers.

Dalits, who constitute nearly 17 per cent of the population, own only two per cent of the total cultivable land. In contrast, the upper castes, who constitute roughly about 15 per cent of the population, own and control more than 65 per cent of the land. This is the picture after 56 years of our Independence.

Regarding employment, what is the situation? Out of 78,450 vacancies created under the reservation categories at the university level, the dalit and tribal candidates have filled up only about 3,450. The same state of affairs remains in appointments made by the Central and the State Governments. The appointments of SC candidates as on 1st January, 2000 was 11.29 per cent in Group ‘A’ services of Government of India and 12.68 per cent in Group ‘B’ services as against their population percentage of about 16.5.

MR. DEPUTY-SPEAKER: I am asking you to conclude now.

DR. RAM CHANDRA DOME : The only way to protect the interests of the dalits is to go beyond political lines. We should have definite political and social goals to implement the programmes and schemes. The programme relating to land reforms should also be expedited. … (Interruptions)

Their properties should be protected. The facilities for their education should be made available to them. The employment opportunities for them should be protected. In this regime, globalisation and privatisation are there.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Now, nothing will go on record.

(Interruptions) *

DR. RAM CHANDRA DOME : The interests of dalits should be protected. There should not be any partisan attitude towards them. With these words, I would conclude.                                                

* Not Recorded                    

श्री किशन लाल दिलेर (हाथरस) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं बहुत संक्षेप में अपना वक्तव्य दूंगा। हरिजन उत्पीड़न पर जारी चर्चा में आपने मुझे बोलने का मौका दिया, उसके लिए मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं। मैंने जो बोलने का इरादा किया था, उसे लिख कर भी लाया था लेकिन बहुत से माननीय सदस्यों ने जो वक्तव्य दिए, उसमें वह दोहरी बात हो जाती है। मैं उसे दुबारा नहीं बोलना चाहता।

मैं संक्षेप में ही अपने विचार रखूंगा। उत्पीड़न की चर्चा हो रही है और आज तक ५०-५५ वर्ष की आजादी के बाद भी हमारे देश से हरिजन उत्पीड़न या अस्पृश्यता का निवारण नहीं हो पाया है। यह हमारे देश के लिए कलंक है। हम जानते हैं कि इस बात के लिए दूसरे मुल्कों के सामने हमारा देश पिछड़ा हुआ है। हम गर्व से नहीं कह सकते हैं कि हमारे यहां कोई भेदभाव नहीं है, ऊंच-नीच नहीं है, जातिवाद नहीं है। लेकिन फिर भी आज की चर्चा में हिस्सा लेते हुए मैं यह कहने के लिए तैयार हूं कि जैसे हमारे राजनीतिक दलों ने, माननीय सदस्यों ने एक-दूसरे पर टीका-टिप्पणी की है, आरोप-प्रत्यारोप किए हैं, मैं करना नहीं चाहता। यह हमारे बीच में कोई अच्छाई नहीं है क्योंकि मुश्किल से हरिजन-उत्पीड़न पर चर्चा हुई है औऱ उसमें हम राजनीति दिखाएं तो हमें यह शोभा नहीं देता। मैं इस मत का हूं कि हम सभी लोग एक भाषा, एक विचार को लेकर चलें और जो विषय छूटा हुआ है, उस पर प्रकाश डालें लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। मैं सिर्फ सरकारों पर आरोप लगाऊंगा। हमारे देश में जब से सरकारें बनी हैं चाहे जिनकी भी बनी हों, उन्होंने एक वर्ग जिसको सबसे ज्यादा नैग्लेक्ट किया है, वह वर्ग सफाई-कर्मचारी वर्ग है। उसकी लापरवाही की गई है और उस वर्ग की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है। इस बात से सारे लोग सहमत होंगे कि सरकार की तरफ से इस वर्ग का उत्पीड़न हुआ है। नगरपालिकाओं में, महानगरों में जो सफाई कर्मचारी वर्ग को वेतन दिया जाता है, किसी प्रकार से सही टाइम पर नहीं दिया जाता लेकिन टाउन एरिया में ५-५ महीने और ८-८ महीने हो जाते हैं, उसके बाद दिया जाता है। आप यह सोचिए कि इससे बड़ा उत्पीड़न औऱ क्या हो सकता है? जो वर्ग मजदूरी पर टिका हुआ है, उसको महीनों के बाद वेतन दिया जाए तो कैसे बच्चों को शिक्षा दी जाएगी और कैसे वह अपना जीवन-निर्वाह करेगा? यह एक बहुत विकट समस्या है। मैं पहले भी कई बार मांग कर चुका हूं और मैंने विधान सभा में भी कहा है कि सफाई कर्मचारी वर्ग को राज कर्मचारी करके घोषित किया जाए और उनको समय पर वेतन मिलेगा तो वे अपने बच्चों को शिक्षा दे सकते हैं। न्याय मंत्री जी यहां बैठे हुए हैं, मैं उनसे निवेदन करूंगा कि आप इस वर्ग पर ध्यान दीजिए क्योंकि ये दलितों में सबसे ज्यादा दलित हैं और इन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो किस पर ध्यान देंगे? सभी माननीय सदस्यों ने इसका बड़ा उल्लेख किया है। आज यहां हरिजन-उत्पीड़न की चर्चा हो रही है और जहां लोग ज्यादा सह रहे हैं, उनके साथ मैं अपने को इसीलिए जोड़ता हूं लेकिन जिन्होंने राजनीतिक सुझाव दिए हैं, राजनीति की बातों को छोड़कर मैं उनके साथ भी सहमत हो सकता हूं। इसलिए मेरा आपके माध्यम से सरकार से निवेदन है कि सारे देश में इस बात के लिए आवाहन करें कि सफाई कर्मचारियों को राज कर्मचारी घोषित किया जाए। इनकी बहुत विकट पीढ़ा है और इसके लिए कोई इंटरव्यू वगैरह होता है तो सफाई कर्मचारियों के जो बच्चे होते हैं, मेरे कई मित्र बोल चुके हैं कि उनके साथ भी भेदभाव किया जाता है, उनको एडजस्ट नहीं किया जाता। उनमें अगर कोई बाल्मीकि समाज का कायकर्ता इंटरव्यू में बिठा दिया जाता है तो सिर्फ यह परिचय देने के लिए कि वह बाल्मीकि समाज का है।

मेरा ख्याल है कि इंटरव्यू लेने वाले उसके साथ भेदभाव नहीं करेंगे और सही इंटरव्यू लेंगे। इससे उनको रोजगार मिल सकता है। मैं मंत्री जी को कहना चाहता हूं कि आपको इस वर्ग के उत्थान के लिए सोचना होगा। जैसा हमारे दूसरे मित्रों ने कहा, श्री रामजी लाल सुमन ने कहा था कि उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ा उत्पीड़न दलितों के साथ हो रहा है और इतना किसी अन्य प्रदेश में नहीं हो रहा है। मैं उनकी इस बात को सही नहीं मानता हूं। वहां की मुख्य मंत्री खुद इसी वर्ग से यानी हरिजन वर्ग से हैं। वे खुद इसको देखने वाली हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मायावती जी जब तक वहां बैठी हैं, तब तक बीजेपी का नाम लेने वाला कोई नहीं होगा। मैं आपको कहना चाहता हूं कि आपको तो इसका फायदा हो रहा है।

श्री रामजी लाल सुमन: वह दलितों को भी देख रही हैं, आपको भी देख रहे हैं। इसलिए घबराओ मत।

श्री किशन लाल दिलेर: आपको तो खुश होना चाहिए कि आपको राजनीतिक फायदा हो रहा है। अखिलेश सिंह जी ने कहा था कि मंडल-कमंडल की राजनीति है। बीजेपी पर आरोप लगाया और कहा कि हम जो अनुसूचित जाति के लोग हैं, कमंडल की गोद में बैठे हुए हैं। मैं आपको कहना चाहता हूं कि कमंडल की गोद में हम आज से नहीं, १९६७ से हैं, जब मैं पहली बार विधायक बना था। मैंने अपने साथियों के विचार देखे हैं और मुझे बीजेपी में ऐसा कोई भेदभाव नहीं दिखाई दिया, सबके साथ एक जैसा व्यवहार होता है। इसलिए ऐसे आरोप लगाना ठीक नहीं है। अगर सच्चाई से काम करना है, हरिजन समुदाय का उत्थान करना है, तो सबको नेतागिरी करने के बजाय एक रूप में आवाज उठानी चाहिए।

SHRI KODIKUNNIL SURESH (ADOOR): Mr. Deputy-Speaker, Sir, I thank you for giving me this opportunity to participate in the discussion regarding atrocities on Dalits.

Once again, this august House has discussed about the atrocities on Dalits in this country. In the past, we had discussed this serious matter in this House on several occasions. Many hon. Members had participated in the debate and they had raised their serious concern on atrocities on Dalits. On all these occasions, the Government of India had given an assurance to the hon. Members of this House for taking effective steps to prevent atrocities on Dalits all over the country. But, what is the situation now? Day by day, atrocities on Dalits are increasing. There are a number of incidents of atrocities on Dalitswhich have been reported recently and in the past. I may also mention here that most of the atrocities are not reported.

The hon. Minister of State for Home, Shri I.D. Swami had given the figure in this House on 29.11.2002 that the total number of cases of atrocities committed on Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the States and Union Territories were 29,645 in the year 2000 and 29,683 in the year 2001.

The hon. Minister had also mentioned in his reply that Uttar Pradesh is on the top in case of atrocities with a total number of 7,408 cases in the year 2000, and 8,191 cases in the year 2001. The other States are Madhya Pradesh, Rajasthan, Bihar and Gujarat which are also coming in the list of atrocities. I am not going into the details, but I have mentioned some of the incidents which had recently happened in the country.

Everybody mentioned here about the five Dalits who were lynched and burnt to death in front of the police station at Jhajjar in Haryana, so also, there is another incident. Three Dalit students at Delhi University’s top ranking Hindu College were battered with fists and beaten with rods. The local police station was reluctant to file the complaint. These types of incidents mostly happen in the North India. In the northern part of India, the atrocity on Dalits is very high when compared to the southern part of the country.

I am telling this based on a report. The entire Dalit population of a village in Gujarat’s Amreli district was subjected to an economic boycott. No water supply was given to them. No essential commodities were given to them. No employment was given to them. No freedom was given to them to leave the village. The District Collector did nothing. This happened at a village in Amreli district of Gujarat.

Then the incident that took place in the Betul district of Madhya Pradesh was also reported in the newspapers. A woman member of the Panchayat was raped by the upper caste men and she was paraded naked with bells tied around her neck. This type of atrocity is going on in different States.

Sir, 55 years after India claimed for itself the status of a modern nation, State based on equality of citizenship, one-fifth of its population remains subjected to the tyranny of tradition, a tradition which rates cows higher than some human beings. It is a tradition that laughs in the face of modern laws that were designed to punish those who perpetrated.

The barbaric treatment meted out to the Dalits in India is encapsulated in the recommendation made by the National Human Rights Commission in its first report of 21st century. It says that the Government of India should undertake comprehensive steps to root out ‘untouchability’. The Constitution of India, which came into effect in 1950, abolished untouchability. But like all the other laws meant for prevention of atrocities and protecting civil and human rights, article 17 is also not up to the mark.

So, in many parts of India, while Dalits work in the land owned by the upper caste people, they still cannot draw water from the same well or bathe in the same pond as they do. They cannot drink from the same glass as a higher caste person even at a teashop or worship in the same temple. In most of the places, they cannot even cremate the dead at the same burning ghat as a caste Hindu. Both in life and death, they are untouchable. It is because of the arrogant power of the upper caste groups who attack or even kill the Dalits with impunity whenever they perceive a threat to their ‘way of life’. This is reflected in the rising graph of physical crimes—assault, murder and rape—committed against the Dalits across the country.

The Dalits are asserting their claims to rights that are constitutionally guaranteed to them. There is a ferocious backlash from the upper caste people. However, it appears to suggest that the constitutional guarantees for their protection against atrocities are not worth the paper written. At the same time, our lawmakers cannot be faulted because over the years, they have put in place enough legislation to guide a society towards civilisation.

We have the Protection of Civil Rights Act, 1959, the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 and the Protection of Human Rights Act, 1993 on the basis of which the NHRC was set up. They seem to have made little difference to the position of dalits. The fact of the matter is that the increase in levels of violence against dalits signifies that the law simply does not work.

The issue of land allotments to dalits is very important. There are lakhs and lakhs of dalits in the country who are landless. Thousands of acres of land are available with the State Governments but the State Governments are not taking any steps for allotting land todalits. Without land, how can they live in this country? Therefore, I urge upon the Government to take steps to allot land to dalilts.

In this twenty-first century, lakhs of dalits do not have houses. The Government has introduced several schemes for thedalits, for construction of their houses but most of the State Governments are diverting funds meant for the dalits. This is a serious problem. The Government of India must look into this.

At various places in the country, dalit communities are facing acute poverty and starvation. A number of dalits are dying due to starvation. Therefore, the Government of India must introduce free rationing for dalits.

Unemployment is an acute problem being faced by dalits. The Government of India and the State Governments have banned recruitments. The policy of various State Governments is to reduce the strength of employees in various sectors. Everybody knows, this would affect dalits the most. The Government of India is taking up disinvestment of public sector undertakings. The disinvestment has adversely affected dalits. Thedalit communities are getting the benefit of reservation. If the public sector undertakings were to go to the private sector, the unemployment position of dalits would become very acute and would go from bad to worse. In the circumstances, the Government of India should take urgent steps to fill up the backlog vacancies at the earliest. The Government of India also has to take steps for special recruitment of dalits in the Services and paramilitary forces.

In Kerala, the tribals are agitating for getting forest land. The Chief Minister of Kerala Shri A.K. Antony had discussions with tribal leaders. During those discussions, the Government of Kerala assured the tribal leaders that they would be given one to five acres of land each and the strike was called off by the Adivasi Gothra Maha Sabha in Trivandrum. … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please try to conclude now.

SHRI KODIKUNNIL SURESH : Sir, this is very important because just now an hon. Member from the CPI (M) had raised this issue. They are trying to blame the Government of Kerala. I am trying to put the right position here. Please allow me to do that.

After the decision taken by the Government of Kerala, some steps have been taken and about 1,500 hectares of land are to be distributed very shortly. The Government of Kerala has requested the Government of India to give clearance for forest land to be given to the adivasis but the Ministry of Environment and Forests of the Government of India has rejected the State Government’s request.

There is an agricultural farm at Aralam, where there are more than 3,000 hectares of uncultivated land. The State Government has requested the Central Government to give the land to them for passing it on to the tribals but the Government of India is yet to decide whether it has to be given to the Government of Kerala. At the same time, the MPs of CPI (M) from Kerala have objected to this transfer of uncultivated land to the Government of Kerala for distribution among the adivasis. The Government of Kerala has taken steps for early distribution of forest land to the adivasis. … (Interruptions)

Sir, it is a very important issue. It is a national issue. … (Interruptions)

Hon. Chief Minister of Kerala had written several letters to the Government of India for the release of forest land. But the hon. Minister of Environment and Forests, Shri T.R.Baalu, refused the Kerala Government’s request and he had written several letters to the Chief Minister of Kerala for eviction of encroachers from the forest land. But some tribals forcefully entered the forest in Muttanga in Wynandu District in Kerala. The forest land of Muttanga is a wild life sanctuary area. The entire area of this forest land comes under the Forest Conservation Act. … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Please conclude.

… (Interruptions)

SHRI KODIKUNNIL SURESH : Sir, I am concluding. … (Interruptions) Everybody knows that it is very difficult to get this forest land. A group of adivasis constructed homes and they cut the trees. The Government of Kerala warned the tribal leaders to vacate immediately from the forest land in Muttanga. But the tribals have not listened to the Kerala Government’s request. Forty days after that the forest officials went there to evict the illegal encroachers. The tribal groups attacked the forest officials. Finally, the police force reached there and tried to evict the tribals from Muttanga. There are some terrorist groups behind the Adivasis and they attacked the police. … (Interruptions)

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, भाजपा की सहयोगी पार्टी बसपा जिस की उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री हैं, न उस पार्टी के एक भी सदस्य ने इस गम्भीर सवाल पर चर्चा की और न ही यहां कोई हाजिर रहा। इसका मतलब मेरे इस कथन की पुष्टि होती है कि उत्तर प्रदेश में दलितों पर सर्वाधिक अत्याचार हो रहे हैं। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय: थोड़े से मैम्बर्स अभी बोलने वाले बाकी हैं।

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, यह बात रिकॉर्ड में आनी चाहिए कि बहुजन समाज पार्टी दलित उत्पीड़न के मामले में गम्भीर नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय: क्या आपके अलावा आपकी पार्टी का कोई मैम्बर यहां उपस्थित है? ऐसा कहना ठीक नहीं है। किसी पार्टी का नाम लेना ठीक नहीं है। यदि वे यहां नहीं हैं तो दूसरे मैम्बर्स बोलेंगे।

SHRI KODIKUNNIL SURESH : Sir, please give me two more minutes.

MR. DEPUTY-SPEAKER: You conclude with a last sentence.

… (Interruptions)

SHRI KODIKUNNIL SURESH : One police constable was brutally attacked and killed. This police constable was a Scheduled Caste. Again the tribals tried to kill another police constable and immediately after that police had to fire and one tribal was killed. Police used lathi charge also and several tribal people were injured.

Sir, the Scheduled Castes and Scheduled Tribes National Commission visited the place and they submitted the Report to the Government of India. … (Interruptions) Now, the National Human Rights Commission has asked the details about Muttanga incident. The Government of Kerala told the Commission that it would extend all cooperation in the inquiry about the Muttanga incident. But CPM led LDF is trying to politicise the issue. They want political mileage. Therefore, they are misleading the House everyday. The CPM is indulging in false propaganda about the incident. When CPM led LDF ruled in the State, not a single piece of land was given to the tribals. They do not have moral right to speak about the tribals in Kerala.

Sir, with these few words, I conclude my speech.

SHRI DALIT EZHILMALAI: Sir, my hon. friend, Shri Kodikunnil Suresh, was referring about the tribal unrest in Kerala. He was telling that tribals were arrested by some terrorists. Some violent people supported them. In fact, it is in everybody’s knowledge that the tribals are in the receiving end throughout the country. They are the victims.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Nothing objectionable will go in the record. I will look into it.

… (Interruptions)

श्री वीरेन्द्र कुमार (सागर): उपाध्यक्ष महोदय, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। दलितों पर हो रहे अत्य़ाचार संबंधी विषय पर इस सदन में लम्बे समय के बाद इतनी गम्भीर चर्चा हो रही है। इस चर्चा में कई माननीय सदस्यों ने भाग लिया। मैं उन सब को भी धन्यवाद देना चाहता हूं। वास्तव में यह बहुत गम्भीर विषय है। यह बात बिल्कुल सत्य है कि दलित हमेशा से छला गया है।

माननीय गेहलोत जी ने जो बात कही, वह वास्तव में बहुत सही है कि १५ सालों के बीच अनेकों ध्यानाकर्षण और स्थगन प्रस्तावों के माध्यम से कई विषयों पर चर्चा हुई लेकिन इतने लम्बे काल के बाद पहली बार दलित समस्या के ऊपर चर्चा हुई जिस में कई माननीय सदस्यों ने भाग लिया।

जैसा मैंने कहा कि दलित हमेशा से छला जाता रहा है। मैं अपने क्षेत्र की एक-दो घटनाओं के विषय में अपनी बात रखना चाहता हूं।

उपाध्यक्ष जी, मैं सागर जिला से आता हूं। उसके पास बिलौरा गांव में एक दलित विधवा फूलाबाई है जिसके पति का निधन हो गया। उसके पास रोज़ी-रोटी का कोई साधन नहीं था, इसलिये उसने अपने पति के कारोबार को अपनाया और वह बस स्टैंड के पास उस खोखे में जूते पालिश करने का काम करके अपनी रोजी-रोटी करने लगी लेकिन धन-बल वाले लोगों ने उस खोखे को तोड़कर फैंक दिया और एनक्रोचमेंट करके पक्का सीमेंटेड आर.सी.सी. का स्ट्रक्चर खड़ा कर दिया। अब उस महिला के पास रोज़ी-रोटी का साधन नहीं था। वह महिला जिला प्रशासन के पास गई और उसके बारे में पहल की गई। इसी प्रकार की दूसरी घटना गांव बराटा की १२ वर्षीय दलित बालिका की है उसके साथ रेप किया गया। जब थाने में रिपोर्ट लिखाने गये तो उन्हें भगा दिया गया। टी.वी. के पत्रकार सागर में मेरे पास लेकर आये। मैंने एस.पी. से कहा कि दलित बालिका गरीब परिवार से है, इसके पास पैसे नहीं है। शक्षित नहीं है, क्या इसलिये इसकी रिपोर्ट नहीं लिखी जायेगी? हम देखते हैं कि हम जन-प्रतनधि हैं, हमारे क्षेत्र में इस तरह की घटनायें घटती रहती हैं। एक और घटना के बारे में बताना चाहूंगा। मेरे संसदीय क्षेत्र में बीना नामक स्थान पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी श्री मोहन लाल कोरी थे जिनके माध्यम से जिला प्रशासनिक अधिकारी ने २० हजार रिश्वत लेकर एक काम कराने के लिये कहा। जिस आदमी के लिये काम कराना था, उसके दबाव में यह काम नहीं हुआ और उसने आत्महत्या करने के लिये एक नोट तैयार किया और आत्महत्या कर ली। उसके परिवार वाले जब कमरे में गये तो वह नोट मिला। इस सब की रिपोर्ट टी.आई. महोदय ने अधिकारी के खिलाफ नहीं लिखी। एस.पी. के पास जाने के बाद घटना की जानकारी दी गई लेकिन यह बताया गया कि किसी का नाम लिख देने से केवल उसे हत्या का दोषी नहीं माना जा सकता। यह देखा गया है कि दलित समाज के इर्द-गिर्द ऐसी घटनायें होती रहती हैं। दलितों के लिये कई योजनायें बनती रहती हैं लेकिन उनका कार्यान्वयन आज तक नहीं हुआ है। दलितों के साथ छलावा किया जा रहा है लेकिन वास्तव में ये योजनायें धरी रह जाती हैं। डा. जटिया बैठे हुये हैं। उन्हें मालूम होगा कि मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है लेकिन पिछले ३ वर्षों में १४ करोड़ रुपये का घोटाला किया गया है। इस ओर मंत्री जी का ध्यान आकर्षित किया गया और उनका उत्तर भी प्राप्त हुआ है, उसके लिये मैं उन्हें धन्यवाद देता हूं। लेकिन कई लोगों की शिकायतें दर्ज होने के बाद भी राज्य सरकार यह कहती है कि जांच करा रहे हैं लेकिन आज तक किसी अपराधी को कोई सजा नहीं मिली। जब कहा जाता है कि जांच चल रही है लेकिन वह जांच कब तक चलेगी? यदि एस.सी.एस.टी. के लोगों को न्याय नहीं मिलेगा तो योजनायें केवल रिकार्ड बनकर रह जायेंगी।

उपाध्यक्ष महोदय, हम साफ्टवेयर, कम्प्यूटर और संचार साधनों में काफी आगे बढ़ गये हैं लेकिन दलितों के साथ क्या हो रहा है। क्या हमारे देश का विकास मॉडल यही होगा? पं. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि जब तक समाज की अंतिम पक्ति के आखिरी व्यक्ति को रहने के लिये मकान, खाने के लिये भोजन और अस्वस्थ व्यक्ति को दवा, उसके बच्चों के लिये शिक्षा की पूरी व्यवस्था नहीं होगी, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि हमारा समाज आगे बढ़ रहा है। जब तक दलित समाज आगे नहीं बढ़ेगा, जब तक हम एक संकल्प शक्ति के साथ आगे नहीं बढ़ेंगे, हमारा विकास होने वाला नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने का मौका दिया, उसके लिये धन्यवाद

श्री रामदास आठवले (पंढरपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, मैं अपने भाषण की शुरूआत कहां से करूं। दलित समाज पर होने वाले अत्याचारों पर आज इस ऑगस्ट हाउस में चर्चा हो रही है। इस हाउस में कुल ५४४ मैम्बर्स हैं, उनमें से सत्ताधारी पार्टी के आठ लोग मौजूद हैं और अपोजीशन पार्टी के ११ लोग मौजूद हैं। अगर दलित समाज पर अत्याचार हो रहे हैं और सब लोगों को इस बारे में सिम्पैथी है तो इन अत्याचारों को खत्म करने के लिए कोई न कोई रास्ता अपनाना होगा।

उपाध्यक्ष महोदय, वहां अभी इंडोनेशिया की भाषा में रामायण दिखाई जा रही है और यहां दलित समाज पर होने वाले अत्याचारों की रामायण चल रही है। यहां पर प्रधान मंत्री जी और उप-प्रधान मंत्री जी को उपस्थित रहने की आवश्यकता थी। सरकार इसे बहुत लाइटली ले रही है। दलित समाज पर होने वाले अत्याचार का जवाब प्रधान मंत्री जो को देने की आवश्यकता थी। स्वामी जी, हम आपका बहुत आदर करते हैं, सत्यनारायण जटिया जी का भी हम आदर करते हैं, लेकिन आप लोग हमारा आदर नहीं करते हैं, यही समस्या है, इसीलिए दलित समाज पर अत्याचार हो रहे हैं।

"दलित अत्याचार का मैं सुना रहा हूं आपको किस्सा,

अब तो दे दो आप दलितों को उनका हिस्सा,

अगर हमें हमारा हक नहीं मिलेगा,

तो तुम्हारा राज ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा,

दलितों के घर अगर यहां रोज जलते रहेंगे,

दलितों का संसार गांव मिट्टी में मिलता रहेगा,

पूरे देश में दलितों का खून रोज बहता रहेगा,

तो इस देश में दलित अत्याचार क्यों सहता रहेगा,

अगर एक दिन दलित जाग उठेगा,

तो अत्याचार का राज यहां जरूर मिटेगा।"

मेरा कहने का मतलब है कि दलित समाज पर होने वाले अत्याचार को खत्म करने के बारे में आपके हाथ में सरकार है, सत्ता है। पचास सालों से क्या हो रहा है और चार सालों से आप क्या कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। इन अत्याचारों की जड़ मनुस्मृति है। मैं कोई धर्म की बात नहीं कर रहा हूं। अगर आपको मनुस्मृति अच्छी लगती है तो ठीक बात है। मगर मनुस्मृति के माध्यम से अपने देश में चतुर्वर्ण व्यवस्था आई है और उसके बाद अनटचेबलिटी आई है, जो मानव का स्वाभिमान है, इस स्वाभिमान को खत्म करने की बात इस मैन्टेलिटी में आई है।

इसलिए मेरा कहना है कि राज चाहे किसी का भी हो, आप लोग हिन्दू हैं, इधर भी सारे हिन्दू हैं। हमारे देश में कम से कम ७५ से ८० प्रतिशत लोग हिन्दू ही हैं। अगर हम सब लोग हिन्दू है तो फिर चाहे बी.जे.पी. हो, कांग्रेस पार्टी हो, समाजवादी पार्टी हो या कोई अन्य पार्टी हो, सब पार्टियां एक ही बात कर रही हैं। जातिवाद को खत्म करने के लिए, दलितों पर होने वाले अत्याचारों को खत्म करने के लिए चर्चा आप लोग कर रहे हैं, परंतु उसके लिए क्या आप लोग पार्टी का आदेश मानने वाले हैं। अगर आपको रामराज लाना है तो राम को कास्टिज्म मंजूर नहीं था। आप लोग राम को मानने वाले हैं। आप लोग मंदिर बनाने के लिए जा रहे हैं। आप लोग राम की फिलासिफी को खत्म कर रहे हो, राम की फिलासिफी को तोड़ रहे हो। इसलिए उस मंदिर को बनाने का कोई फायदा नहीं है। यदि सही मायने में आपको रामराज लाना है, तो कास्टिज्म, जाति-व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था को खत्म करना होगा।

उपाध्यक्ष महोदय, जिस गांव में अत्याचार होता है, उस गांव के लोगों को आपको सबक सिखाने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें फांसी दे दो, हम ऐसा नहीं बोलेंगे। लेकिन यहां की जो मैन्टेलिटी है, यहां की जो सामन्तशाही है, उसे खत्म करने के लिए हम सबको सोचने की आवश्यकता है। इस तरह की बहस कराने से कोई फायदा नहीं है। हर असैम्बली में, पार्लियामैन्ट में हर साल इस पर चर्चा होती रहती है। एकाध इंसीडैन्ट हो जाती है तो हम सब लोग इकट्ठे होकर चर्चा करते हैं। मगर उस मैन्टेलिटी को खत्म करने के लिए, महात्मा गांधी जी ने कास्टिज्म को खत्म करने के लिए कहा है। बाबासाहेब अम्बेडकर जी ने इंडियन संविधान के माध्यम से यह बताया है कि सामाजिक और आर्थिक समता, आर्थिक न्याय मिलना चाहिए। हमें आजादी मिली है, इस आजादी का पोलिटीकल लाभ हमें मिलेगा। पोलिटीकल आजादी हमें मिली है। सामाजिक और आर्थिक समानता के लिए हम कौन सा प्रोग्राम लेने वाले हैं। आप लोग कानून पास करते हैं, लेकिन कानून को इम्पलीमैन्ट करने वाले जो लोग हैं, ब्यूरोक्रेसी है, उसे ठीक करने की आवश्यकता है। कानून को तोड़ने वाले लोगों को ठीक करने की आवश्यकता है। लेकिन कानून तोड़ने वाले तुम्हें ठीक कर रहे हैं। जो कानून को ठीक ढंग से इम्पलीमैन्ट नहीं कर रहे हैं, वही तुम्हें ठीक कर रहे हैं। इसलिए हम सब लोग जब तक इकट्ठे नहीं होंगे, इन्हें ठीक नहीं करेंगे, तक तक नीचे के लोगों को न्याय मिलने वाला नहीं है।    

अगर हम आर्थिक रूप से संपन्न हैं और पांच साल सांसद या मंत्री रहे हैं और हमने संघर्ष किया है तो आज जब हम पर अत्याचार होता है तो उसका मुकाबला करने के लिए हमने एक मूवमेंट महाराष्ट्र और पूरे देश में चलाया है। अत्याचार हर रोज़ होते हैं ऐसा नहीं है मगर जब भी होते हैं तो उसका मुकाबला करने के लिए हम भी मैदान में उतर जाते हैं और वे एक को मारते हैं तो हम भी दो को मारने की ताकत रखते हैं लेकिन हम इस देश का बंटवारा नही चाहते हैं। दिल्ली में धर्म संसद मांग कर रही है कि हिन्दुस्तान बनाएंगे। अगर ये हिन्दुस्तान बनाएंगे तो हम दलितस्थान की मांग कर सकते हैं, ईसाईस्थान की मांग कर सकते हैं, मुस्लिमस्थान की मांग कर सकते हैं मगर यह मांग हम नहीं करेंगे। फिर आप क्यों हिन्दुस्तान की मांग कर रहे हैं? भारत को भारत ही रको। मैं दूसरे विषय में नहीं जाना चाहता हूँ मगर भारत में हिन्दू लोग हैं इसलिए हम उनका आदर करते हैं। आप भी हमारा आदर करिये और दलितों पर होने वाले अत्याचारों को खत्म करने के लिए कोई अच्छा कार्यक्रम लाइए। आप अच्छा कार्यक्रम नहीं लाएंगे तो आप जाएंगे और हम आएंगे। इसी तरह का काम आप सब लोगों को करना है। समाज की मानसिकता बदलने के लिए सिर्फ इस इश्यू पर डिसकशन ही काफी नहीं है। यहां लोग कहते हैं कि मध्य प्रदेश में क्या हो रहा है, महाराष्ट्रम क्या हो रहा है। हम कहते हैं कि यूपी में क्या हो रहा है। सब जगह वही हो रहा है, अत्याचार हो रहे हैं। उधर के एम.पी. और हमारे भी एम.पी. सीरियस नहीं हैं। ११८ कांस्टीटयूएंसी के एस.सी. और एस.टी. के एम.पी. हैं और आज भी अधिकांश यहां उपस्थित नहीं है, यह अच्छी बात नहीं है। कास्टिज्म खत्म करने की बात करनी चाहिए। आज आपस में कहते हैं कि चमार है, जाटव है, हमारे महाराष्ट्र में भी इसी प्रकार से जातियां हैं - महंग है, चमार है, ये सब जातियां हैं मगर ये सब जातियां किसने लाई हैं. आप लोगं ने लाई हैं। आप लोगों ने लाई है मतलब जिन लोगों ने लाई हैं उनको गुस्सा आना चाहिए और उनको ठीक करने का काम आपको करना चाहिए। आपकी जो सोशल जस्टिस मनिस्ट्री है, मैं स्वामी जी से कहूंगा कि यह ज्यादा काम करने वाली नहीं है क्योंकि कानून बनाने का काम भी हम करते हैं और तोड़ने का काम वह करते हैं। यह काम है सत्यनारायण जी आपका। आप तो सत्य बोलने वाले हैं और अच्छे कवि हैं। नारायण भी हैं मगर वह नारायण आप नहीं है, आप आज के नारायण हैं। इस युग के नारायण हैं तो उन्होंने रामायण और महाभारत में गड़बड़ कर दी है। आज के सत्यनारायण आप हैं तो समाज को न्याय दिलाने के लिए ऐसा कुछ कार्यक्रम बनाइए कि गांवों में अगर किसी दलित पर अत्याचार होता है तो दलितों को वहां हथियार रखने की परमीशन देनी चाहिए। अगर हमारे पास बंदूक होगी तो सामने वाले लोग देखेंगे कि इन पर अत्याचार करेंगे तो ये गोली मार देंगे। इसलिए दलितों को हथियार की परमीशन देने की आवश्यकता है। जिस तरह से झज्झर का इश्यू है, बेलची कांड है, पीपली में हुआ, मराठवाड़ा में हुआ, कोन्डमपट्टी में हुआ, हर अत्याचार को रोकने के लिए हम सबको मिलकर प्रयत्न करना है। झज्झर में जो कुछ हुआ - पांच दलितों की वहां हत्या हुई। वे गाय का चमड़ा निकाल रहे थे तो गाय का चमड़ा कौन निकाल सकता है? गाय का चमड़ा निकालने की आदत हमें ही है। हम गाय का चमड़ा निकाल रहे हैं, आदमी का चमड़ा नहीं निकाल रहे हैं। गाय का चमड़ा निकालने का काम अगर आप चाहते हैं कि हम नहीं करें तो आप गाय का चमड़ा निकालो। लेकिन आप कहते हैं कि आप चमड़ा नहीं निकालेंगे, आप कहते हैं कि गाय हमारी माता है। लेकिन हमारी माता नहीं है तो हम क्यों नहीं उसका चमड़ा निकालेंगे। इक काम को भी हम सब लोगों को खत्म करने की आवश्यकता है।

ज़मीन के बारे में हमारी मांग है कि हर फैमिली को पांच एकड़ जमीन मिलनी चाहिए। हमारी पार्टी ने महाराष्ट्र में और देश के २२ राज्यों में आंदोलन किया मगर सरकार ने एक एकड़ जमीन देने की बात की है। उतने से काम चलने वाला नहीं है। दलितों को उनके पैरों पर खड़ा कनरा है तो प्राइवेट सैक्टर में भी उनको रिजर्वेशन मिलना चाहिए। जजों की नियुक्तियों में भी आरक्षण होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में हमारे जज होने चाहिए। उनके लिए भी कोई न कोई अधिकार देने की आवश्यकता है। हमारी मांगों पर सरकार को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जहां तक बसपा का सवाल है, समाजवादी पार्टी के लीडर सुमन जी ने भी बताया है।

उपाध्यक्ष महोदय, उन्हें जो करना है, वह वे करें। गठबन्धन उन्होंने किया है। जो वे करना चाहते हैं, वह वे करें। मायावती जी गठबंधन कर के सी.एम. बन गई। यदि हमें ऐसा करना होता, तो हम भी ऐसा कर सकते थे। इसलिए हमारा इतना कहना है कि बाबा साहेब अम्बेडकर का नाम लेकर राजनीति में आए हैं। दलितों पर अत्याचार रोकना, हमारा और आपका, सभी का कर्तव्य है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आठवले जी, अब आप समाप्त कीजिए।

श्री रामदास आठवले : उपाध्यक्ष जी, मैं समाप्त कर रहा हूं।

लड़ाई हम लड़ते हैं आगे तुम बढ़ते हो

लड़ाई तुम करते हो, हम मरते हैं

जहां से तुम चलते हो, वहां हमारे घर जलते हैं

इसी तरह का काम करते रहोगे ऊंचे वर्ण के लोगो

हमें कब तक सताते रहोगे, हम कब तक तुम्हें

अत्याचार की कहानियां सुनाते रहेंगे।

उपाध्यक्ष महोदय, यह इस सदन के लिए अच्छा नहीं है। हम सब एक हैं। हमें पाकिस्तान को सबक सिखाना है, तो हमें एक होना पड़ेगा। स्वामी जी, आपको ज्यादा दिन सरकार नहीं चलानी है। सिर्फ डेढ़ साल रह गया है, आप डेढ़ साल में जितनी और जैसा सरकार चलाना चाहते हैं, वैसी चला सकते हैं।

उपाध्यक्ष महोदय : आठवले जी, आपको दलितों पर एट्रोसिटीज के ऊपर बोलना चाहिए।

श्री रामदास आठवले : उपाध्यक्ष महोदय, इन्हीं शब्दों के साथ मैं, दलितों पर अत्याचारों को खत्म करना चाहिए, इतना कहते हुए अपनी बात समाप्त करता हूं।

श्री हरीभाऊ शंकर महाले (मालेगांव): उपाध्यक्ष जी, देश में दलितों पर अत्याचारों को कम करने के विषय पर सदन में बहुत महत्वपूर्ण चर्चा हो रही है। इसमें भाग लेने के लिए आपने मुझे समय दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तीनों क्षेत्रों में पिछड़ा वर्ग बहुत पिछड़ा है। इस बारे में हमारे अनेक माननीय सदस्यों ने चर्चा में भाग लेते हुए बताया है। मैं ज्यादा समय न लेते हुए, बहुत संक्षेप में अपनी बात कहना चाहता हूं।

महोदय, सुप्रीमकोर्ट ने एक निर्णय दे दिया है कि जो पिछड़े लोग हैं, उन वर्गों के बच्चों को भी ऊंची शिक्षा लेने के लिए जनरल स्टूडेंट के समान, यानी उनके बराबर ही पैसा देना चाहिए और सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के अंकों के समान ही उनके भी अंक होने चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि पिछड़े वर्ग के लोग ऊंची शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए मेरी विनती है कि जैसे तीन वर्ष पूर्व ऐसी आपत्ति आई थी और तब हमारे पंथ-प्रधान ने तीन दिन तक इकट्ठे होकर हम सब लोगों के विचार सुने और अच्छी तरह से चर्चा करने के बाद पंथ-प्रधान ने खास दिलचस्पी दिखाते हुए जिस प्रकार से संकट को दूर किया, उसी प्रकार का संकट अब पुन: शुरू हो चुका है। इसलिए मेरी भारत सरकार और राज्य सरकारों से विनती है कि इस संकट को दूर करने के लिए शीघ्र कदम उठाए जाएं।

महोदय, दूसरा संकट जिसका जिक्र सम्माननीय प्रकाश अम्बेडकर जी और सदन के अन्य माननीय नेताओं ने किया वह यह है कि आदिम जाति के लोगों का विकास करने में वन अधनियम, १९८० बहुत बड़ी बाधा सिद्ध हो रहा है। वन अधनियम, १९८० के कारण आदिम जातियों को टेलीफोन की सुविधा, बिजली की सुविधा पहुंचाने में बहुत दिक्कतें आ रही हैं।

22.00 hrs.

विकास का काम आदिम जाति के विभाग में ठप हो गया है। मेरी आपके माध्यम से भारत सरकार से विनती है कि इस कार्यक्रम में ढिलाई दी जाए और इस कानून में बदल किया जाए। यह कानून आदिम जाति के बारे में इसका बड़ा दुश्मन है, इसलिए इसे दुरुस्त करना जरूरी है। जिस जमीन पर १९७२ से १९७८ तक, जिन्होंने अतिक्रमण किया है, इस बारे में राज्य सरकार ने भारत सरकार से मांग की है। इस मांग के लिए यह तय हो गया है, इसलिए इस मांग को पूरा करने के लिए भारत सरकार से मेरी प्रार्थना है। महोदय, ज्यादा से ज्यादा बड़े बांध आदिम जाति के विभाग में होते हैं, इनके पुनर्वसन का काम जल्दी नहीं होता है, इसलिए इन्हें भूमिहीन होना पड़ता है। सरकार के पास पैसा नहीं होता है, ये जल्दी पेमेंट नहीं करते हैं और ज्यादा से ज्यादा सुविधा नहीं प्राप्त करते हैं, इन्हें ये सुविधा प्राप्त कराने के लिए मेरी आपसे प्रार्थना है।

महोदय, आदिम जाति के विभाग में बिजली, पानी, शिक्षा और दवा आदि की सुविधाएं होना भी जरूरी है। इस तरफ भारत सरकार को ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए। पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा का प्रबंध करना चाहिए। इन्हें स्कूल चलाने के लिए अनुदान मिलना चाहिए, क्योंकि बिना अनुदान के इनके लिए स्कूल चलाना बहुत मुश्किल है। आदिम जाति और पिछड़े वर्ग के विभाग में स्कूल चलाने के लिए इन्हें अनुदान देना चाहिए। आदिम जाति, जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा होनी जरूरी है, यही मेरी आपसे विनती है।

श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार) : महोदय, हमें भी इस पर बोलना है।…( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : अभी जटिया जी इंटरवीन करेंगे, उसके बाद आप बोलिए।

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री (डॉ. सत्यनारायण जटिया) : उपाध्यक्ष महोदय, यहां चर्चा के माध्यम से माननीय सदस्यों ने अनेक प्रकार के विषय और महत्वपूर्ण बातों की तरफ सदन का ध्यान आकर्षित किया है। निश्चित रूप से भारत के संविधान में उसके उदेश्य में जो बात कही गई है, उसी के लिए हम सब प्रतिबद्ध हैं। उसमें कहा है कि हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा इसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विस्तार उपासना स्वतंत्रता आदि बातें कही गई हैं। न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता, सब को समानता का अधिकार, यह हमारे लिए निर्देश है, जिनका कि हमें अनुसरण करना होता है। यह बहस एक बहुत बड़े विषय को लेकर है, मानवता के विषय को लेकर है। भारत के संविधान के अनुच्छेद १७ में जिस बात का उल्लेख हुआ है, अस्पृश्यता का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में लागू करना अपराध है।

यह एक बहुत बड़ी बात है, अस्पृश्यता रही तो उसका अन्त होना चाहिए, यह हमने संविधान में कहा है। फिर समता का जो अधिकार है, नागरिक अधिकार हैं, उसमें किसी के साथ विद्वेष जन्म जाति के आधार पर, जन्मस्थान के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह जो इक्वैलिटी है, यह जो समानता है, यह जो न्याय है, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसके माध्यम से अभी एक माननीय सदस्य ने अपने भाषण में अपनी बातों को कहते हुए प्रकट किया।

आप जानते हैं कि जितनी बड़ी जनसंख्या है, उसके लिए जितने काम करने चाहिए, उन्हें करने के लिए निश्चित रूप से सरकारी योजनाएं बनती हैं। मंत्रालय में भी उन सारी योजनाओं को बनाते हुए बजट में प्रावधान किये गए हैं। जो प्रावधान हैं, चूंकि मेरी तो बहुत सीमा है, क्योंकि यह बहस लम्बे समय से चली है, फिर भी यह बताना उचित होगा कि बजट के जो प्रावधान होते हैं और जो शैडयूल्ड कास्ट्स के सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय के अन्तर्गत प्रावधान हैं, उनमें १९९९-२००० में ७४५.७५ करोड़ रुपये थे, जो बढ़कर २००२-२००३ में ९४४.८२ करोड़ हो गये। निश्चित रूप से इस दिशा में हमने बजट को बढ़ाने का काम किया है। साथ ही साथ पोस्ट मैटि्रक स्कालरशिप स्कीम शिक्षा की एक बहुत महत्वपूर्ण स्कीम है। शिक्षा के माध्यम से जागरूकता पैदा होती है, उससे यह पता लगता है कि भारत के नागरिक होने के नाते उसके अधिकार क्या हैं, उसकी समता क्या है, स्वतंत्रता क्या है ? तो उसको भी करने के लिए जो स्कालरशिप शुरू की गई थी, उसमें १९९७-९८ में जो राज्यों को सैण्ट्रल असिस्टेंस रिलीज हुई है, वह ४१.५३ करोड़ रुपये थी, जो २००१-२००२ में बढ़कर १५९.२७ करोड़ रुपये हो गई। निश्चित रूप से यह जो शिक्षा के बारे में बजट और छात्रवृत्तियां हैं, उसमें भी हमने नये-नये काम शुरू किये हैं।

अभी पिछले वर्ष ही हमने अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर एक नई छात्रवृत्ति की घोषणा की थी और उसमें प्रत्येक बोर्ड में दसवीं कक्षा में पास होने के बाद जो मैरिट बनती है, उसमें एस.सी. और एस.टी. के विद्यार्थियों के लिए हमने नयी छात्रवृत्ति की घोषणा की। उसमें हर बोर्ड के अन्दर जो पहला स्थान है, चूंकि दसवीं कक्षा के बाद ड्राप आउट हो जाता है, पैसा नहीं होने के कारण, साधन नहीं होने के कारण, इसलिए उसे प्रोत्साहन योजना के नाम से हमने छात्रवृत्ति के लिए लागू किया। पहले स्थान को ६० हजार, दूसरे स्थान को ५० हजार और तीसरे स्थान को ४० हजार, यदि उसमें कोई छात्रा नहीं है, कोई गर्ल स्टूडेंट नहीं है तो फिर अलग से ४० हजार रुपये का प्रावधान है।

साथ ही साथ प्रदेशों में जो जनसंख्या है, उसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की आबादी के अनुसार हमने अतरिक्त छात्रवृत्ति १०-१० हजार की रखी है। इस प्रकार एक नई छात्रवृत्ति योजना का शुभारम्भ हमने किया। इस वर्ष हमने उस छात्रवृत्ति को देने का काम किया है।

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं एक प्रार्थना करना चाहूंगा, जटिया साहब ने फरमाया कि योजनाएं बहुत अच्छी हैं और वभिन्न योजनाओं के लिए दलित वर्ग के लिए और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के लिए धन का आबंटन किया गया था। नवीं पंचवर्षीय योजना में वभिन्न राज्य सरकारों ने ९०० करोड़ रुपया तो खर्च ही नहीं किया, जो दलितों के कल्याण के लिए आबंटित हुआ था। मैंने एक बार नहीं, कई बार सलाहकार समति में भी आपसे प्रार्थना की कि हमें कोई तंत्र विकसित करना चाहिए, जो यह निगरानी करे कि राज्य सरकारों को जो दौलत मिलती है, उसका सही इस्तेमाल हो रहा है या नहीं हो रहा है। योजनाएं बहुत अच्छी हैं, धन का आबंटन भी आप कर रहे हैं, लेकिन जिन वर्गों को उनसे लाभ होना चाहिए, उन पर अगर आप पैसा खर्च नहीं करेंगे तो इस पैसे का क्या उपयोग है?

डॉ. सत्यनारायण जटिया : इन सारी बातों का वर्णन करने के लिए मेरे पास पर्याप्त आंकड़े भी हैं और पर्याप्त बातें भी हैं। जो विषय लिए गये, वे कोई छोटे विषय नहीं हैं, उन सब को विस्तार से कहने के लिए जितना सीमित समय मेरे पास है, उसका लाभ लेते हुए मैं यह बात कहना चाहूंगा कि ये जो योजनाएं हमने शुरू की हैं, उनमें शैक्षणिक द्ृष्टि एक नई स्कालरशिप की योजना शुरू की है। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम पर हमने प्रोत्साहन योजना शुरू की है।

साथ ही साथ हमारी योजनाओं में, जैसा कि हम जानते हैं कि गरीब की शिक्षा गरीब शिक्षा है और संपन्न की शिक्षा समृद्ध शिक्षा है। इसके अंतर को कम करने के लिए अनुसूचित जाति के जो मेधावी छात्र हैं, उन छात्रों को अच्छे स्कूलों की शिक्षा मिल सके, इसके लिए पब्लिक स्कूल में जो फीस ली जाती है, वह फीस देने का योजना बनाई गयी है। हमने इन बच्चों के लिए रेजिडेंशियल स्कूल, छात्रावासी स्कूल बनाने की भी योजना हाथ में ली है। ये सारी बातें शैक्षणिक उत्थान की द्ृष्टि से हम करना चाहते हैं। आर्थिक उत्थान की द्ृष्टि से हम जो कुछ प्रयास कर रहे हैं, उसके आंकड़ें मैं आपके सामने रखना चाहूंगा। इसके लिए जो नैशनल शैडयूल कॉस्ट फाइनेंस डेवलपमैंट कार्पोरेशन बना हुआ है, उसमें वर्ष १९९९-२००० के साल में १८,८२५ लाभार्थियों को लोन देने का काम किया गया है जो बढ़कर वर्ष २०००-०१ में नयी लघु वित्त ऋण योजना के लागू होने से १८ हजार की संख्या से बढ़कर ५२ हजार हो गया। उसके बाद २००१-०२ में यह संख्या बढ़कर ७६,२९५ हो गयी। कुल मिलाकर इस दिशा में हमारे जो सीमित संसाधन हैं, उसमें ज्यादा लोगों को देना चाहते हैं। लघु वित्त ऋण योजना के माध्यम से जो लोग छोटे-छोटे कारोबार में लगे हुए हैं, ठेला चलाते हैं, जमीन पर बैठकर काम करते हैं, खोमचा लगाते हैं, छोटी किराने की दुकान लगाते हैं या जो परम्परागत व्यवसाय करना चाहते हैं, उसके लिए उनको पांच परसेंट ब्याज पर इस प्रकार का ऋण देने का काम शुरू किया है।

स्पेशल कम्पोनेंट प्लान, स्पेशल सैंट्रल असिस्टैंस आदि के बारे में मेरे पास बहुत जानकारी है। जो स्पेशल कम्पोनेंट प्लान बना हुआ है, वह प्रदेश सरकारों के बजट पर निर्भर करता है और जितना बजट वहां है उसी के अऩुसार बजट में उस प्रकार के प्रावधान किये गये हैं तो अनुसूचित जाति के लोगों को खर्च करने के लिए प्रबन्ध करना चाहिए। ...(व्यवधान) सैंट्रल का भी बताता हूं। मेरे पास दोनों की जानकारी है। आप अधीर न हों तो ज्यादा ठीक होगा। मैं जल्दी में भी पूरा कर सकता हूं। अगर आप चाहें तो मैं इसका जरूर जवाब दे सकता हूं। राज्यों की आबादी का जितना प्रतिशत है, उस अनुपात में अपने बजट में उसका प्रावधान करना चाहिए। मुझे यह कहते हुए कि कुछ राज्यों ने उस अनुपात को पूरा करने का काम किया है और कुछ राज्यों ने उस अनुपात में स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत उतना पैसा खर्च करने का उपाय नहीं किया। अब मैं उन राज्यों का नाम लेकर विवाद खड़ा नहीं करना चाहता जिसके कारण किसी को यह लगे कि इस राज्य का नाम क्यों लिया और उस राज्य का नाम क्यों नहीं लिया।

स्पेशल सैंट्रल असिस्टैंस के बारे में मेरे पास राज्यवार आंकड़ें हैं, उसमें हमने हर प्रदेश को स्पेशल असिस्टैंस देने का काम किया है। इस वर्ष २९ जनवरी तक के आंकड़ें मेरे पास उपलब्ध हैं। हम उस असिस्टैंस के माध्यम से उस गेप को पूरा करने का काम करते हैं। राज्यों का दायित्व है कि अपने यहां पर स्पेशल कम्पोनेंट प्लान बनायें, प्राय: राज्यों में यह होता है कि अनेक ऐसे मंत्रालयों में उसके लिए आइडेंटिफाई करके पैसा रख देते हैं जबकि होना यह चाहिए कि वह पैसा निकालकर अनुसूचित जाति की योजना को लागू करने वाले मंत्रालय को दे दें और उस पर खर्च करने का प्रबन्ध करें। अनेक राज्यों में इस व्यवस्था की जरूरत है। यदि यह व्यवस्था हो जाती है तो उसके माध्यम से राज्यों में अनुसूचित जाति वर्ग के कल्याण के लिए ही सारा पैसा होगा अन्यथा अन्य-अन्य विभागों के अंदर वह खर्च किया जाता है और उस हैड में बताया जाता है कि हमने स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के आधार पर उसको खर्च किया है। यहां सारी बातें इसी प्रकार की हैं जिसमें सबको करने के लिए मौका है। हम जानते हैं कि जात बनाने का काम, बात बनाने का काम आदि सब कुछ जजबातों के ऊपर नहीं होता। यह यथार्थ के ऊपर है चूंकि यथार्थ में हम देखते हैं कि इस अंतर को मिटाना चाहिए। इसके लिए हमें कोशिश करनी है। …( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से विनम्र प्रार्थना करना चाहता हूं कि यह सवाल एक बार नहीं बल्कि अऩेक बार उठाया गया है कि भारत सरकार जो दौलत राज्य सरकारों को भेजती है, उनकी जिम्मेदारी है कि कमजोर वर्गों के कल्य़ाण के लिए उस धनराशि को खर्च करके वभिन्न राज्यों से तो यूटीलाइजेशन सर्टीफिकेट नहीं आते। दूसरा कभी यह भी देखना को मिलता है कि वह पैसा दूसरी मदों में खर्च किया जाता है। हमने कहा है कि भारत सरकार उन पर निगरानी रखने के लिए कोई तंत्र विकसित करेगा। यह पैसा उन लोगों के पास पहुंच रहा है या नहीं और उसका सही लाभ मिल रहा है या नहीं। आप चाहे तो धन का आबंटन कर रहे हैं लेकिन जो लाभान्वित होने वाला वर्ग है, उनके पास दौलत नहीं पहुंचती तब तक उसकी कोई उपयोगिता नहीं है। मैं आपके माध्यम से जटिया साहब को यह पूछना चाहता हूं कि ९०० करोड़ रुपये नौवीं पंचवर्षीय योजना में कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए खर्च होना था, वह नहीं हुआ। उसका क्या कारण है ?

क्या भविष्य में इस तरह की कोई निगरानी समति गठित करने वाले हैं, केन्द्र का कोई नियंत्रण रखने वाले हैं जिसकी वजह से धन का दुरुपयोग न हो?

MR. DEPUTY-SPEAKER: Let his intervention be complete. After that if there is any clarification, I will allow that. Shri I.D.Swamy will reply to the debate. In case there is any clarification on this intervention and if the hon. Minister has the details, then I will allow you.

डॉ. सत्यनारायण जटिया : आप जानते हैं कि यहां से जो सरकारी सहायता रिलीज़ होती है, उसके यूटीलाईजेशन सर्टीफिकेट आते हैं। यदि यूटीलाईजेशन सर्टीफिकेट नहीं आते तो यहां से सहायता को निर्मुक्त करने का काम करने में कठिनाई होती है। हमने प्रदेशवार स्पैशल कम्पोनैंट प्लान के लिए सैंट्रल असिस्टैंस दिया है, यदि आप कहें तो मैं आंकड़े बता सकता हूं कि यूटीलाईजेशन कितना आया।…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : जटिया साहब, सवाल आंकड़ों का नहीं है, सवाल है कि यूटीलाईजेशन सैर्टीफिकेट नहीं आते। उससे कमजोर वर्गों का नुकसान होता है। आप उस पर नियंत्रण रखने के लिए क्या कर रहे हैं, मेहरबानी करके यह बताएं।

SHRI KODIKUNNIL SURESH : What is the amount that you are releasing to the States?… (Interruptions)

श्री रामजीलाल सुमन : राज्य सरकारों को पैसा भेजते हैं। राज्य सरकारें उसका इस्तेमाल नहीं करतीं, गरीब लोगों को उसका लाभ नहीं मिलता तो उस पैसे का क्या यूज है। हम सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि राज्य सरकारों पर नियंत्रण रखने के लिए कि राज्य सरकारें उस पैसे का सही इस्तेमाल करें, इसके लिए सरकार कुछ करेगी।…( व्यवधान)

SHRI DALIT EZHILMALAI : Sir, today we are discussing atrocities on Dalits. The hon. Minister was explaining about the welfare measures initiated with regard to education, employment and giving figures about rapes and murders and such other things.

Sir, my simple question is that all these doles and support that he is speaking about is not being given from today these were there even during the time of the Viceroy. The Congress Government followed this and these were given by successive Governments. My specific question is, do you have any innovative programme to assist the people in an honest way, in a transparent manner to arrest the atrocities against the Dalits forthwith? Do you have any programme? You please tell us about that.

MR. DEPUTY-SPEAKER: This is just an intervention. The hon. Minister of State for Home, Shri I.D.Swamy will reply to the debate.

डॉ. सत्यनारायण जटिया : हमने पिछले साल राज्य सरकारों के सचिवों के साथ बैठ कर, हम यहां से जो भी सुविधा दे रहे हैं और वे जो काम कर रहे हैं, उसके बारे में लेखा-जोखा लेने का काम किया है। मंत्रालय में इस प्रकार का प्रबंध है। ऐट्रॉसिटीज़ के बारे में भी हमने राज्य सरकारों को लगातार याद दिलाने का काम किया है कि जो कानून बना हुआ है, उसके इम्प्लीमैंटेशन का काम करें। पिछले वर्ष २६ मार्च को, १४ जुलाई को मैंने स्वयं सभी मुख्य मंत्रियों को तथा , २६ अगस्त, १९ सितम्बर, २६ सितम्बर को बाकी के लोगों को हम यह बात याद दिलाते रहते हैं कि जिस प्रकार का अत्याचार हो रहा है, उसे रोकने में आप हमारी सहायता करें। विशुद्ध रूप से हम जानते हैं कि किसी भी बात को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच पत्र व्यवहार, चर्चा और विचार-विमर्श एक महत्वपूर्ण माध्यम होता है। हमारी कोशिश है कि हमारे पास जो भी संसाधन हैं या इस बात को लागू करने के लिए जो सुविधाएं उपलब्ध हैं, उनका हम पूरा उपयोग कर रहे हैं। सारी चर्चा में आपने जो सुझाव दिए हैं, मैंने सिलसिलेवार उन्हें भी नोट किया है। हमारी कोशिश होगी कि उन बातों को लागू करने के लिए समय-समय पर और भी क्या उपाय किए जाएं। मैं आपके माध्यम से सारे सदन को निवेदन करना चाहता हूं कि जिस बात से हम सहमत हैं, जो बात हम सबके लिए चिन्ता का विषय है, उस बारे में सामूहिक रूप से, प्रयास करें। मैं चूंकि जानता हूं कि आपके सुझाव आपके अनुभवों के आधार पर हैं। यदि आप उन अनुभवों को कुछ महसूस करते होंगे तो जरूर हम चर्चा के लिए सबको बुला कर, उसमें और क्या किया जा सकता है, उन सारे उपायों को तलाश करने का काम करेंगे। आपने मुझे बीच में इस विषय को रखने के लिए मौका दिया, मैं आपके और सदन के प्रति आभार व्यक्त करता हूं।                        

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Muniyappa, you can ask this question when the hon. Minister of State for Home Affairs gives his reply. The Social Justice Minister has just intervened. The main reply for the debate will be given by the hon. Minister, Shri I.D. Swami.

SHRI KODIKUNNIL SURESH : I want to ask a clarification from the Minister for Social Justice.

MR. DEPUTY-SPEAKER: You can seek the clarification from the hon. Home Minister.

SHRI K.H. MUNIYAPPA : We have submitted some of our points when we spoke on the subject. I want to know from the hon. Minister for Social Justice regarding the starting of new residential schools of the type of Navodaya Schools. What is the Government doing on this? Secondly, some States have not spent the funds properly. They have even diverted the funds elsewhere. You know which are those States. Thirdly, the hon. President, while addressing both Houses of Parliament in the year 2002 mentioned that in 48 districts of the country, less than three to five per cent of Scheduled Castes girls are educated. What steps has the Government taken in this regard?

MR. DEPUTY-SPEAKER: Mr. Minister, you can give the information if you have it.

डॉ. सत्यनारायण जटिया : रेजिडेंशियल स्कूल के बारे में जैसा मैंने कहा है कि उसके लिए हमने योजना भेजी हुई है। हम उसकी स्वीकृति की प्रतीक्षा में हैं। गल्र्स हॉस्टल्स बनाने केलिए हमारी एक योजना है। गल्र्स स्कूल और हॉस्टल के निर्माण के लिए, मेनटेनेंस करने के लिए हम प्रयासरत हैं। बाकी आपके जो भी प्रश्न होंगे, उनका जवाब देने के लिए मैं तैयार हूं। वह पत्र व्यवहार के माध्यम से भी कर सकते हैं।

श्री रामानन्द सिंह (सतना): उपाध्यक्ष महोदय, बहुत ही गम्भीर विषय पर चर्चा हो रही है. कई माननीय सदस्यों ने देर रात तक इस चर्चा में भाग लिया। मैं इस बात को समझ रहा हूं कि मेरे पास समय कम है। इस समस्या की जो जड़ है, वह हमारी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था है। हिन्दू धर्म में जो वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था है, जब तक यह नहीं मिटेगी, तब इस तरह के अत्याचारों का समापन बहुत जल्दी सम्भव नहीं है। यह हजारों सालों से चल रहा है. हमारी ऋषि-मुनियों ने और बहुत से विद्वानों ने इस पर अपने विचार रखे। महात्मा गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन में…( व्यवधान) सुमन जी आप सुनिए। मैं बहुत जल्दी समाप्त कर दूंगा।

श्री रामजी लाल सुमन: मैं आपको जानता हूं। हम और आप बहतु दिनों तक सोशलिस्ट पार्टी में रहे हैं। आप अब गलत जगह फंस गए। मैं आपकी बात समझता हूं।

श्री रामानन्द सिंह : महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम में भोजन कमेटी का अध्यक्ष खंडेराम नाम के एक हरिजन को १९२३ में बनाया था। उस समय के समाज की कल्पना करें कि कैसा समाज था। उस समय गांधी जी ने सोच-समझकर कदम उठाया था। महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम के १८ सूत्री कार्यक्रम में समाज परिवर्तन की क्या-क्या आवश्यकताएं देश को आगे चलाने वाली होंगी, यह सोचकर उन्होंने जाति प्रथा को तोड़ने के लिए अस्पृश्यता निवारण, अछूत उद्धार और अंतरजातीय विवाह की बात की थी।

सदन को शायद जानकारी होगी कि सरोजनी नायडू चटोपाध्याय की लड़की थीं। उन्होंने नायडू से शादी की। गांधी जी के बेटे देवदास की शादी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जो ब्राहमण थे, उनका अंतरजातीय विवाह किया। जब गांधी जी ने कहा कि मैं उस जोड़े को बधाई दूंगा जो प्रतिरोध विवाह करेगा।

तब चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य जी आगे आये और उन्होंने अपनी बेटी लक्ष्मी का विवाह गांधी जी के बेटे से किया। इंदिरा गांधी जी की शादी भी महात्मा गांधी जी के आशीर्वाद से फिरोज गांधी से हुई। सुचेता कृपलानी की आचार्य कृपलानी से हुई।

माननीय मंत्री जी, आप सामाजिक न्याय मंत्री हैं, इसलिए अपनी तरफ से कोई ऐसा एक प्रस्ताव लाएं और राज्यों को सुझाव दें कि वे अंतर-जातीय विवाहों को प्रोत्साहन दें। जो जोड़े ऐसा करें उनको रोजगार देने की भी व्यवस्था करें, तभी यह समाज आगे बढ़ेगा। मैं पूछना चाहता हूं कि छूआ-छूत और ऊंच-नीच मिटाने के लिए हम क्या कर रहे हैं? हम हवा में लाठी मार रहे हैं। हम कहते हैं कि इतने स्कूल खोले, इतने छात्रावास खोले। मैं पूछना चाहता हूं कि क्या इनसे सामाजिक व्यवस्था बदलेगी?

उपाध्यक्ष महोदय, यह सही है कि आज भ्रष्टाचार हो रहा है। माननीय रामविलास पासवान जी ने सही कहा कि दलित लोगों को जिंदा जलाया जा रहा है, उनकी झोंपड़ियां जलाई जा रही हैं।

MR. DEPUTY-SPEAKER: This will not go on record.

(Interruptions)*

श्री रामानन्द सिंह : जब राजा-महाराजा और सामंती लोग मुख्यमंत्री होंगे तो सामंती व्यवस्था कैसे मिटेगी। यह ठीक है कि कांग्रेस ने भी बहुत कुछ दलित लोगों के लिए किया है और महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री एक दलित है। कांग्रेस ने भी बहुत से सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए काम किये हैं लेकिन कभी-कभी ये स्थितियां भी आ जाती हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं माननीय मंत्री जी से कहूंगा कि वे भी दलित वर्ग से हैं और योग्य मंत्रियों में से हैं। बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर जी ने ऐसा श्रेष्ठ और ऊंचा संविधान बनाया जिसका एक शब्द भी आप इधर से उधर नहीं कर सकते हैं। लेकिन उस जैसे व्यक्ति को १९५५-५६ में हिंदू धर्म को तिलांजलि देकर बौद्ध धर्म क्यों अपनाना पड़ा, यह सोचने वाली बात है। उन्होंने कहा था कि मैंने यह अनुभव कर लिया है कि हिंदू रहते हुए हमें न्याय और सम्मान नहीं मिलेगा। आज भारत की सामाजिक व्यवस्था में बहुत बड़ा टकराव है। आज दलितों के शक्षित बच्चे अपमान सहने के लिए तैयार नहीं हैं। इस चुनौती पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

आपको स्मरण होगा कि अंग्रेजों ने हरिजनों को भी अलग स्थान देने की बात की थी। तब गांधी जी ने अनशन किया था और बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने अपनी महानता का परिचय देते हुए उनका अनशन तुड़वाया था और उन्होंने धर्म परिवर्तन करते समय बौद्ध धर्म अंगीकार किया। उन्होंने बहुत बड़ा उपकार हिंदू धर्म पर किया, लेकिन आज भी हिंदू धर्म उनकी महानता को समझ नहीं पा रहा है। आज भाजपा वाले धर्म परिवर्तन को रोक रहे हैं।…( व्यवधान)मैं तो आपका साथी हूं। मैं इसलिए बोल रहा हूं कि आप भी सुधरें और इधर वाले भी सुधरें। बदलाव तभी आयेगा जब अच्छे लोग इधर आयेंगे।

मैंने मैला सिर पर ढोने की प्रथा का अंत करवाने के लिए मध्य प्रदेश में कानून बनवाया।…( व्यवधान)जब मैं वन मंत्री था तो मैंने सिर पर मैला ढोने वालों को व्हील वेरोज, तीन पहियों वाली रेहड़ी, दस्ताने और स्क्रैपर्स दिये थे तथा दसेरों को दो रुपये वाला बांस २० पैसे में दिया था। मैंने २० लाख एकड़ जंगल की फालतू जमीन मध्य प्रदेश के दलित लोगों को बांटी थी। हमें यह सोचना होगा कि आज उनकी आर्थिक दशा कैसे सुधरे? आज जमीन पर बड़े-बड़े लोगों का कब्जा है और एससीएसटी के लोग बेकार भटक रहे हैं। जो लोग नौकरी पा गये हैं उनकी हालत तो कुछ ठीक है।

बाकी दलितों की क्या हालत है? वे जली लकड़ी बीन-बीन कर पेट पाल रहे हैं। वे मजदूरी कर रहे हैं लेकिन फिर भी समाज में उनका जीना मुश्किल है। अटल जी की सरकार ने बहुत से कदम उठाए हैं। उन्होंने अनूसूचित जन जाति के लिए अलग से मंत्रालय बनाया। सामाजिक न्याय विभाग को अधिक फंड दिए। उन्होंने मंत्रिमंडल में ११ ऐसे मंत्री रखे। उन्होंने एससी और एसटी के लिए अलग कमीशन बनाया। इन कामों के अलावा समाज परिवर्तन के लिए कबीर की लाइन, दादू की लाइन, धनिया की लाइन, नानक की लाइन और जितने पुराने संत तथा समाज सुधारक हुए हैं, उन्होंने उनके संदेश को अपनाया। अगर हिन्दू धर्म २१वीं सदी में कुत्ते की पूंछ बना रहेगा तो धर्म परिवर्तन का रोना रोने से हिन्दू धर्म का भला नहीं होगा। हम जब तक दलितों को गले नहीं लगाएंगे, ऊंच-नीच का भेद समाप्त नहीं करेंगे, तब तक नया समाज नहीं बनेगा और २१ वीं सदी में आने वाली चुनौती का सामना नहीं कर सकेंगे। इस दिशा में कानून बना कर समाज परिवर्तन की तरफ कदम आगे बढ़ाएं।

श्री माणिकराव होडल्या गावीत (नन्दुरबार) : उपाध्यक्ष महोदय, आज कम से कम ६-७ घंटे से देश के दलितों पर हो रहे अन्याय और अत्याचार पर चर्चा चल रही है। देश के दलितों और आदिवासियों पर तीन प्रकार के - सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक अन्याय और अत्याचार होते हैं। सामाजिक अन्याय और अत्याचार के बारे में बहुत से वक्ताओं ने यहां बताया इसलिए मैं उस विषय पर बोल कर ज्यादा समय नहीं लेना चाहता हूं। देश के दलितों और आदिवासियों को मानवता की तरह जीने का पूरा अधिकार है और उन्हें जीने दिया जाए, यही मेरी प्रार्थना है।

सामाजिक अत्याचार के बारे में हमारे मित्र राष्ट्रपाल जी और प्रकाश अम्बेडकर जी ने जो विचार रखे, मैं उससे अपने आप को जोड़ता हूं। देश में दलितों और आदिवासियों की आबादी करीबन ३० परसैंट है। मैं भारत सरकार से विनती करता हूं कि उनकी आबादी के हिसाब से बजट में धनराशि का आवंटन होना चाहिए। यहां माननीय मंत्री जी ने जो दलितों और आदिवासियों को शिक्षा देने और सामाजिक सुधार संबंधी आंकड़े दिए। यदि उन्हें इतने बड़े देश के हिसाब से परसैंटेज में गिनें तो २-३ परसैंट से ज्यादा बजट आवंटन नहीं हो रहा है। कम से कम ३० परसैंट बजट का आवंटन होना चाहिए तभी उनकी आर्थिक स्थिति सुधर सकती है और मदद हो सकती है।

मेरे क्षेत्र में सरदार सरोवर परियोजना बन रही है लेकिन गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के आदिवासियों के गांव पानी में डूब गए। यह भी एक बहुत बड़ा अन्याय है। सरदार सरोवर प्रोजैक्ट के एवार्ड में लिखा है, उनका पुनर्वास किया जाएगा, उन्हें जमीन दी जाएगी और सिंचाई सुविधाएं दी जाएंगी लेकिन कुछ भी नहीं हो रहा है। एक बहुत बड़ा अन्याय आदिवासियों के ऊपर हो रहा है। इसे भारत सरकार गम्भीरता से ले, यही मेरी प्रार्थना है।

दूसरे, जहां तक आरक्षण का प्रश्न है, वह पूरा नहीं मिल पा रहा है। मैं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति कल्याण समति का सदस्य हूं। हमने भारत सरकार और राज्य सरकारों के उपक्रमों में जाकर मीटिंग की है, उनसे भेंट की है लेकिन उनमें हमारा आरक्षण का परसंटेज पूरा नहीं किया जा रहा है। हमने देखा है कि जो बोगस लोग हैं, वे इस परसंटेज का फायदा उठा रहे हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लोगों का आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस ओर सरकार को देखने की जरूरत है। जैसा मैंने बताया कि सरदार सरोवर परियोजना में मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासियों की हालत बहुत गम्भीर है। गुजरात राज्य की लाखों हैक्टेयर जमीन को पानी मिलने वाला है। उनके पुनर्वास की जमीन के लिये पानी की व्यवस्था किये जाने की जरूरत है। जब कभी भी मैं यह सवाल उठाता हूं, यह कहकर टाल दिया जाता है कि यह राज्य सरकार का विषय है। मेरा कहना है कि आदिवासियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिये। इसके अलावा शैक्षणिक अत्याचार दलितों पर किया जाता है। भारत सरकार व राज्य सरकार ने मैडिकल कालेज, इंजीनियरिंग कालेज, बड़े बड़े वैटरीनरी कालेज खोले गये हैं जहां एस.सी.एस.टी. का आरक्षण है लेकिन वे स्थान भरे नहीं जाते हैं। यदि यह आरक्षण नहीं दिया जायेगा तो ये लोग कैसे डाक्टर्स, वकील या इंजीनियर्स बनेंगे? इस ओर भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग और आदिवासी विभाग को ध्यान देना चाहिये।

उपाध्यक्ष महोदय, यहां माननीय सदस्यों ने अपने विचार रखे हैं। मेरे पास और भी मुद्दे थे लेकिन समय की कमी के कारण मैं ज्यादा समय नहीं ले पाऊंगा। इसलिये सामाजिक अन्याय अत्याचार,शैक्षणिक अत्याचार और आर्थिक अत्याचार के बारे में भारत सरकार इस ओर ध्यान देगी,यही प्रार्थना है।

गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री (श्री ईश्वर दयाल स्वामी) :उपाध्यक्ष महोदय, इस बहुत लम्बी चर्चा में ३२ माननीय सदस्यों ने भाग लिया। श्री सुमन जी, श्री पासवान जी इस मोशन के मूवर्स थे। मैं इन सब लोगों का आभारी हूं कि इनके बहुत सारे सुझाव आये। डैफशियंसीज क्या हैं, उसके लिये तवज्जह दी और उसके इम्प्रूवमेंट के लिये काफी सुझाव दिये। मैं यह बात इसलिये कह रहा हूं कि जो इम्प्रेशन था कि शायद सरकार की तरफ से इतनी सीरियसनैस नहीं है, मैंने एक-एक चीज को नोट किया है और हमारे सोशल जस्टिस के मनिस्टर डॉ. जटिया ने वैलफेयर क्टीविटीज ब्रीफ में बताई हैं। लेकिन मेन मुद्दा एट्रोसिटीज ऑन दलित रहा है। हमारे कांस्टीटयुशन मेकर्स ने पहले ही उसमें प्रोवीजन्स कर दिये थे कि जैसे आर्टिकल १५(२), १७, २५(२बी) हैं, इनमें सेफ गार्ड किया गया था। आर्टिकल १७ को पहले कर दिया कि इसे इंपलीमेंट किया जाये कि इकौनोमिक, सोशल, पौलटिकल, इन सब चीजों में किस तरह से स्टैप्स लिये गये, लीगल एक्शन क्या लिया जाये, इन सब के संबंध में समय समय पर सभी सरकारें काम करती रही है।

इसके अलावा जो आर्टीकल ३३०, ३३२, ३३५, ३३८, ३३९, ३४१ और ३४२ वगैरह बहुत सारे ऐसे आर्टीकल्स हैं, जिनमें दलितों, शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स के इंटरेस्ट को सेफगार्ड करने के लिए रिजर्वेशन का प्रावधान, सर्विस में प्रोविजन, शेडयूल्ड ट्राइब्स और शेडयूल्ड कास्ट्स का नेशनल कमीशन बनाने की बात, ये सब चीजें उसमें आती हैं। उसके बाद जो प्रोटैक्शन ऑफ सविल राइट्स एक्ट, १९५५ में बना था, उसे १९७६ में जब अमैन्ड किया तो उसके प्रोविजन्स बहुत ज्यादा स्टि्रन्जैन्ट बनाये थे और वे ऑफेन्सिज नॉन कम्पाउन्डेबल कर दिये थे और कॉगनिजेबल ऑफेन्सिज कर दिये थे। १९५५ का एक्ट था, उसमें उस वक्त कागनिजेबल ऑफेन्स नहीं था। उसके बाद दूसरा शेडयूल्ड कास्ट्स प्रिवैन्शन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट, १९८९ आया, उसमें भी फर्दर स्पेशल कोट्र्स का, उसके ट्रॉयल ऑफेन्स का और रिलीफ एंड रिहैबलिटेशन ऑफ दि विक्टिम्स, जिन पर एट्रोसिटीज हुई हैं, उन्हें किस तरह से रिहैबलिटेट किया जाए, उन्हें क्या-क्या रिलीफ दिये जाएं और उनके ऑफेन्सिज का जल्दी से निपटारा हो, कन्विक्शन हो सके, उसके लिए भी स्पेशल कोट्र्स बनाई जाएं, ये सब प्रावधान भी उसमें किये थे।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं एक बात आपके ध्यान में जरूर लाना चाहूंगा कि हम यह बात इसलिए नहीं कहते कि टालने के लिए सैन्ट्रल गवर्नमैन्ट यह कहती है, मैंने यह बताया कि यह स्टेट सब्जैक्ट है। लेकिन सैन्ट्रल गवर्नमैन्ट ने भी जितने मैजर्स आज तक लिये हैं, उनमें स्पेशल लॉज का स्टि्रक्ट इम्पलीमैन्टेशन, समय-समय पर जो चठि्ठयां जारी की गई हैं, जो एजवाइज राज्य सरकारों को दी गई हैं, आइडैन्टीफिकेशन ऑफ एट्रोसिटीज प्रोन एरियाज, कहां-कहां, कौन-कौन सी स्टेट्स में ऐसे एरियाज हैं, जहां दलितों, बैकवर्ड, शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स पर ज्यादती होने की संभावनाएं ज्यादा हैं, उन एरियाज को आइडेन्टीफाई किया जाए और उन पर और ज्यादा निगरानी रखी जाए और ज्यादा कार्रवाई की जाए, ज्यादा सतर्कता बरती जाए। इन सब चीजों का भी इंतजाम किया गया। शेडयूल्ड कास्ट्स, शेडयूल्ड ट्राइब्स और दलितों के परिवारों में से ज्यादा लोग पुलिस में भरती हों, इसके बारे में भी बार-बार इम्फैसाइज किया गया। रिजर्वेशन तो है, लेकिन राज्य सरकारों को बार-बार चेताया गया है कि आप इसके बारे में ध्यान दे कि कोई पोस्टें बाकी न रहें। माननीय सदस्यों को यह बात पता है कि इस सरकार ने यह निश्चित किया कि शेष को कैरी फॉरवर्ड करें। पहले एक वक्त था जब दलितों के लिए जो पोस्ट्स होती थीं, अगर वे उसके लिए समझते थे कि पूरे लोग उपलब्ध नहीं हैं तो वे एक या दो दफा ट्राई करने के बाद जनरल कैटेगरी में चली जाती थीं। लेकिन अब यह निश्चित तौर पर तय कर दिया गया है कि वे पोस्ट्स उनकी ही रहेंगी। अगर एक दफा में वे नहीं भरी जाती हैं तो वे अगली साल भरी जाएं, इसका भी इंतजाम किया गया है।

उपाध्यक्ष महोदय, दलितों और शेडयूल्ड ट्राइब्स के खिलाफ जो जुर्म होते हैं, उनके लिए स्पेशल सैल्स बनाये जाएं। ताकि वे सैल्स इस बात की तरफ खास ध्यान दें, स्पेशल कोट्र्स बनाई जाएं। शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स को एम्पॉवर करने की जितनी भी डेवलपमैन्ट की स्कीम्स या प्रोग्राम्स हैं, उनकी इम्पलीमैन्टेशन का खास ध्यान रखा जाए। शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स के लिए अलग मनिस्ट्री सैट अप की गई हैं और इसके अलावा नेशनल कमीशन फॉर शेडयूल्ड कास्ट्स बनाया गया है। पहले यह नेशनल कमीशन फॉर शेड़्यूल्ड कास्ट्स एंड शेडयूल्ड ट्राइब्स था। अब एक बिल मूव किया गया है, वह बिल इंट्रोडयूस हो चुका है, जो स्टैंडिंग कमेटी में चला गया है। उसमें शेडयूल्ड ट्राइब्स का कमीशन सैपरेट बनाया गया है और इस तरह से शैडयूल्ड ट्राइब्स का अलग कमीशन हो जाए और शेडयूल्ड कास्ट्स का अलग कमीशन रहे। शेडयूल्ड कास्ट्स और शेडयूल्ड ट्राइब्स को इकोनोमिक डेवलपमैन्ट के लिए फाइनैन्स डेवलपमैन्ट कारपोरेशन का भी प्रावधान किया गया है। स्पेशल कम्पोनैन्ट प्लान का जिक्र जटिया जी ने भी किया और श्री प्रवीण राष्ट्रपाल जी बार-बार कह रहे थे कि उसके लिए कुछ नहीं किया गया। मैं यही उसके बारे में बता दूं कि वर्ष २०००-२००१ में ५६४१.६१ करोड़ रुपये अलग-अलग राज्यों को दिये गये हैं, इस काम के लिए ईयरमार्क किये गये हैं।

उसमें टोटल ९३३२ करोड़ रुपया बनता था स्पेशल कंपोनेन्ट। उसमें से ५६४१ खर्च हुआ। सुमन जी का बार बार आग्रह था कि इसकी मॉनीटरिंग की व्यवस्था की जाए। इसके लिए मैं बताना चाहता हूँ और जटिया जी ने भी उसका जिक्र किया। यह जो स्पेशल कंपोनेन्ट है, इसकी मॉनीटरिंग न सिर्फ सेन्ट्रल मनिस्ट्री जटिया जी की बल्कि प्लानिंग कमीशन भी करता है और नेशनल कमीशन फॉर शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्ज भी करता है। एक बात जरूर की गई जिसको हमें जरूर मानना पड़ेगा कि जो शैडयूल्ड कास्ट्स एंड ट्राइब्ज कमीशन्स की रिपोर्ट आती रही हैं, इसकी तरफ भी ज़िक्र आया है, चर्चा आई कि १९९८-९९ की तो रिपोर्ट और एक्शन टेकन रिपोर्ट संसद के सामने आई है मगर उसके बाद की रिपोट्र्स में डिले है। उसकी तरफ भी ध्यान दिया जाएगा यह मैं सदन को विश्वास दिलाना चाहता हूँ।

हमने क्या क्या रैमडियल मीज़र्स लिये हैं और स्पेशल सैल कहां कहां बने इसकी ओर भी ध्यान दिलाया गया। ध्यान दिलाने के बाद सवाल यह आता है कि चटि्ठयां लिखने और मॉनीटरिंग करने का असर हुआ या नहीं। उसके लिए मैं बताना चाहता हूँ कि स्पेशल सैल १७ स्टेट्स में आलरेडी बने हुए हैं और १० स्टेट्स में स्पेशल कोट्र्स सैटअप हुई हैं और ८ स्टेट्स में आइडेन्टिफाइ की गई हैं जो एटरोसिटीज़ प्रोन एरियाज़ हैं। यह नहीं है कि मॉनीटरिंग के बाद, एडवाइस देने के बाद कार्य नहीं हुआ है। कार्य होता है और मीटिंग्ज़ की जाती हैं और उसके नतीजे के तौर पर यह प्रोग्रैस हुई है।

जहां तक इंस्टीटयूशनल मैकेनिज्म है, शैडयूल्ड कास्ट्स और शैडयूल्ड ट्राइब्ज़ को ज्यादा स्ट्रॉन्ग बनाने के लिए सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मनिस्ट्री ऑफ ट्राइबल अफेयर्स दोनों कार्य कर रहे हैं जिसका ज़िक्र उन्होंने ब्रीफली किया है। शैडयूल्ड कास्ट्स एंड ट्राइब्ज़ के प्रैजेन्ट फॉर्म में एक नेशनल कमीशन बना था और उसके बाद नैशनल शैडयूल्ड कास्ट्स एंड ट्राब्ज़ फाइनेन्शियल डैवलपमेंट कार्पोरेशन बना और यह कार्पोरेशन भी जो एग्रीकल्चर, एलाइड सर्विसेज़, स्पेशल एरिया प्रोग्राम, इर्रीगेशन, फ्लड कंट्रोल, पावर डैवलपमेंट के लिए जो ग्रांट और लोन्स देती है, वह भी २५ स्टेट्स में ये कार्पोरेशन बने हुए हैं। ७३वां संविधान संशोधन जो हुआ था, उसमें पंचायतों में शैडयूल्ड कास्ट्स एंड ट्राइब्ज़ के लिए रिज़र्वेशन किया गया था, यह भी एक इंप्रूवमेंट उसमें हुआ था। इन सबके होते हुए कई बार यह ध्यान आता है और जब कई सदस्यों ने इस बात का ज़िक्र किया कि ये एट्रोसिटीज़ बढ़ रही हैं तो मैं एक पर्टिकुलर फिगर की तरफ आपका ध्यान दिलाऊंगा कि परसेंटेज ऑफ आई.पी.सी. क्राइम्स जो शैडयूल्ड कास्ट्स एंड शैडयूल्ड ट्राइब्ज़ के खिलाफ हुए हैं, पिछले दस साल में १९९१ से २००१ तक मैंने आंकड़े लिये, उसमें भारत की जनता का १६-१७ प्रतिशत शैडयूल्ड कास्ट्स और ट्राइब्ज़ हैं, उसमें १.० प्रतिशत ऐसे हैं जिनके खिलाफ वह क्राइम हुआ या जिन पर एट्रोसिटीज़ हुईं। इसी तरह से जहां शैडयूल्ड कास्ट्स एंड ट्राइब्ज़ का ताल्लुक है, वहां ०.२० परसेंट है। हालांकि उनकी पॉपुलेशन हमारे भारत में १ प्रतिशत है लेकिन जहां तक उनके खिलाफ जुर्म या एट्रोसिटीज़ का ताल्लुक है, वह ०.०२ प्रतिशत है।

झज्झर का ज़िक्र माननीय सदस्यों ने किया। चूँकि मैं भी हरियाणा से आता हूँ। वैसे तो कैप्टन साहब ने उसके बारे में स्पष्ट किया था, वे सदन में नहीं हैं।

उपाध्यक्ष महोदय, मैं यह भी बताना चाहता हूं कि उस हादसे में मैंने एक वक्तव्य भी दिया था और उस पर दोनों हाउसेस में क्लैरीफिकेशन भी दिया था। उसमें एक बात देखने वाली, सोचने वाली और समझने वाली यह है कि दुर्भाग्य से आल आफ ए सडन, यदि इस प्रकार के हादसे बदकिस्मती से हो जाएं, वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात थी, तो उसके बारे में ऐसा नहीं सोचा जाना चाहिए कि कोई यह काम जानबूझकर कराया गया है। यह ठीक है कि गलती उनकी है। वे पांच लोग खालें लेकर आ रहे थे। उनमें से किसी एक ने रास्ते में से मरी हुई गऊ सस्ते में ले ली और उन्होंने सड़क के किनारे ही उस गाय की खाल छीलने का काम शुरू कर दिया। यदि वे यह काम कहीं दूर भी कर रहे होते, तो ऐसा नहीं होता, लेकिन मैन सड़क के किनारे यह काम शुरू कर दिया। मैं इस बारे में सारी बात क्लीयर कर दूंगा, कुछ छिपाउंगा नहीं।

उपाध्यक्ष महोदय, उसमे देखने वाली बात यह है कि हमारा वहां एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट खुद दलित कम्युनिटी से था, वहां का एस.डी.एम. दलित कम्युनिटी का था, वहां का डिप्टी कमिश्नर दलित कम्युनिटी का था, वहां का कमिश्नर भी बाई चांस दलित कम्युनिटी का था। जो दलित कम्युनिटी के कमिश्नर थे, उनसे इसकी इन्वेस्टीगेशन कराई। उनकी अध्यक्षता में एक इन्क्वायरी कमीशन बनाया था। उन्होंने पूरी रिपोर्ट दी। हरियाणा शादय पूरे देश में ऐसी पहली स्टेट होगी, जहां किसी कमीशन की कोई रिपोर्ट आई और उसे इन टोटो एक्सैप्ट किया गया। यह पहली दफा हरियाणा में हुआ। जितने भी आफीसर्स गुनेहगार थे या जिनकी नैगलीजेंस की वजह से घटना हुई, इंटैंशन की वजह से नहीं, करप्शन की वजह से नहीं, पैसा लेने की वजह से नहीं, बल्कि नैगलीजैंस की वजह से कि उन्होंने समय पर डिस्टि्रक्ट अथौरिटीज को इन्फार्म नहीं किया, और फोर्स आ सकती थी, लेकिन उन्होंने उसे लाइटली लिया, केजुअली लिया। वे यह एसपैक्ट नहीं कर पाए कि दशहरे का दिन है, लोग आ रहे हैं, अगर भड़काव हो गया, तो स्थिति काबू से बाहर हो जाएगी, क्योंकि इस तरह की रियूमर फैल चुकी है, इसलिए लोग ज्यादा भड़क सकते हैं, और वहां सारे लोग इकट्ठे हो जाएंगे, यह वे एंटीसिपेट नहीं कर सके। फिर भी उनको चार्जशीट करना, उनको सस्पेंड करना। यह सब कार्रवाई तुरन्त की गई।

उपाध्यक्ष महोदय, सरकार ने दस-दस लाख रुपए मृतकों के परिवारों को दिया। नॉर्मली १० लाख रुपए कोई स्टेट नहीं देती है, लेकिन हरियाणा स्टेट ने दिया। मैं खुद इस प्रकार के एक पीड़ित परिवार में गया। हमारे यहां का, यानी करनाल का भी एक व्यक्ति था। मैं उसके घर पर गया। यह बात ठीक है कि मरने वाला वापस तो नहीं आ सकता, लेकिन जो कुछ कार्रवाई की गई, उससे उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि वाकई सरकार ने तुरन्त कार्रवाई की है और ठीक कार्रवाई की है।

सिर्फ इतना ही नहीं है, बल्कि उसमें जो मुलजिम पकड़े गए हैं, जिनमें शुरू में १० आदमियों ने पहले उन्हें छुड़ाया, वे भी उस भीड़ में थे, उनमें चार दलित थे। अब आप स्वयं सोचिए कि दलित थोड़े ही किसी दूसरे दलित को मारेगा, लेकिन यह गलतफहमी हुई। आल आफ ए सडन, स्पोंटेनियसली, ऐसे हालत बन गए थे। वहां सारी स्टेट में दलित या गैर-दलित का कोई झगड़ा नहीं है। वहां ऐसे कोई हालात नहीं हैं। वहं कोई ऐसा एनवायरमेंट नहीं है, ऐसा वातावरण नहीं है। यहां इसलिए इसका जिक्र किया गया क्योंकि इसका जिक्र कई माननीय सदस्यों ने इस सदन में अपने भाषणों में किया था।

मैं समझता हूं कि जो इकनौमिकली और सोश्यली एक्सप्लायटेशन की बात है और उसे समाप्त करने तथा समरसता पैदा करने की बात है, वह समरसता की बात तो इस सब कार्रवाई के बावजूद भी, तभी आएगी, जब समाज खुद आगे आकर समरसता करने की कोशिश करेगा। समाज का जो उत्तरदायित्व है, समाज का जो धर्म है, समाज की जो जिम्मेदारियां हैं, आप और हम सब समाज, उसके लिए विचार करेगा तब वह बनेगा। सरकार जो कार्य कर सकती है, वह कर रही है। उसके नतीजे जैसा मैंने कोट किया, वे अच्छे निकल रहे हैं। वे मैंने सिर्फ इसलिए कोट किए हैं कि आजादी मिलने के बाद ऐसे हालात बने हैं, कांस्टीटयूशन एमेंडमेंट के बाद, तमाम लॉ पास करने के बाद, नए-नए कदम उठाने के बाद, शेडयूल्ड कास्ट्स कमीशन बनने के बाद और उनकी पैरवी करने के बाद, ऐसे हालत देश में जरूर बने हैं कि हालात बेहतर हुए हैं, हालात अच्छे हुए हैं।

एट्रोसिटीज की जो अब भी मिसालें आती हैं या जो वाकये होते हैं, उनको सख्ती से दबाया जाता है, तभी तो एट्रोसिटीज प्रोन एरिया, जहां ज्यादा वलनरेबल लोग हैं, उनको अलग से आइडेंटीफाई कर के, उन पर अच्छी तरह से नजर रखने सबंधी सारी कार्रवाई की गई है।

मैं यह समझता हूं कि यदि इसके साथ-साथ यदि सदन, यहां सभी बुद्धिजीवी हैं, सदन के माननीय सदस्यों का ताल्लुक ओपीनियन मेकर से है, उनका ताल्लुक सोश्यल रिफार्मर से है, उनका ताल्लुक सोश्यल लीडर से है, समाज के नेताओं से है, अपने-अपने हल्के में अगर वे भी उन्हें इस बात के लिए तैयार करें कि समरसता का वातावरण इस देश में बने, तो मैं समझता हूं कि हमारी इस समस्या का बिल्कुल निदान हो जाएगा। यह समस्या बिल्कुल खत्म हो जाएगी।

उपाध्यक्ष महोदय, हमारा ऐसा देश, १०० करोड़ लोगों का देश, एक महान् ५ हजार साल के इतिहास का देश, राम और कृष्ण का देश, गुरू नानक, गुरू गोविन्द का देश, ऋषियों और मुनियों का देश, एक महान् संस्कृति का देश, बाल्मीकि एवं रवि दास का देश है। कौन कहता है कि हम भगवान को नहीं मानते, हम तो सबको भगवान मानकर चलने वाले लोग हैं। इन भगवानों, इन सन्यासियों, तपस्वियों, गुरुओं, ऋषियों, मुनियों का देश, महान संस्कृति, ५००० साल पुरानी हमारी संस्कृति, १०० करोड़ का देश, पूरी तरह से आगे तरक्की कर सकता है।

बशर्ते कि हम सब लोग अपने-अपने हल्के में ऐसे लोगों को, जो ओपनियन मेकर्स हैं, समाज में अगवा हैं, उनके दिमाग में ये बातें डालीं कि उनका भी एक धर्म, उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी है, वे उन्हें निभाएं। सरकार अपनी तरफ से इसमें कोई कमी नहीं रखेगी। मैं एक बार फिर उन सभी माननीय सदस्यों का धन्यावाद करता हूं, जिन्होंने इसमें पार्टसिपेट किया है। उन्होंने जो सुझाव दिए हैं और कमियां निकालने की बात की है, उन सब को हमने नोट किया है, उन पर ध्यान दिया जाएगा और यह भी कोशिश की जाएगी कि जो कमीशन की रिपोट्र्स हैं वे जल्दी एक्शन टेकन के बाद पार्लियामेंट में आएं।

श्रीमती संतोष चौधरी (फिल्लौर): उपाध्यक्ष महोदय, मैं आपके माध्यम से मंत्री जी से जानना चाहती हूं, आपने अभी अपने जवाब में कहा था कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों के लिए पुलिस में भर्ती के लिए आपने राज्य सरकारों को आदेश दिए हैं, जो मापदंड भर्ती में आम बच्चों के लिए निर्धारित हैं, क्या वही अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए है या उसमें इनके लिए कुछ छूट दी है। ये गरीब बच्चे हैं, इनके पास इतने खान-पान के साधन नहीं होते। अक्सर देखने में आता है कि इन्हें रिजेक्ट कर दिया जाता है, जब फजिकल एफशिएंसी टेस्ट होता है।

श्री ईश्वर दयाल स्वामी : इनके बारे में मेरी जानकारी के मुताबिक यह है कि अलग-अलग सर्विसेस में, जैसे पैरा मलिट्री या पुलिस सर्विसेस हैं, इनमें फजिकल टेस्ट और रिटन एग्ज़ाम होता है। रिटन एग्ज़ाम में छूट नहीं है लेकिन फजिकल में छूट दी जाती है, न सिर्फ माप-तोल में फजिकल में छूट दी जाती है बल्कि इनके जो एफशिएंसी टेस्ट होते हैं, उनमें भी एससी, एसटी के लिए छूट है।

SHRI K.H. MUNIYAPPA : Mr. Deputy-Speaker, Sir, I would like to seek two clarifications. There are a number of atrocities on Scheduled Castes during the last three years. What are the steps taken by the Union Government and the Home Ministry so far to prevent these atrocities? Have you called the Chief Ministers and the Home Ministers of the States to discuss this matter?

DOPT Memorandums were issued and withdrawn. I thank the Government and all the political parties for passing the Ninety-second Constitution (Amendment) Bill. Thereafter, it has not been implemented. It is on record. I want to know from the Minister whether you have issued a Circular or Order to the Chief Secretaries of the State Governments to implement these five DOPT Memoranda which have been issued.

Thirdly, there is a backlog, and lakhs of vacancies are yet to be filled up in the Union Government. What are the steps taken by the Union Government to fill up those vacancies?

SHRI I.D. SWAMI: About the DOPT’s Office Memoranda which were issued, … (Interruptions)

SHRI K.H. MUNIYAPPA : Five Office Memoranda were issued. … (Interruptions)

SHRI I.D. SWAMI: Yes, this has also been discussed. … (Interruptions) Well, we have taken note of it. But those which have been withdrawn, the instructions must have gone to the States. I do not have ready information. If not, we will ensure that the instructions go.

This Government has gone to the extent of rescinding the Supreme Court judgement regarding reservation in promotion. This has also been done by this Government though there was a lot of resentment from the other side also because very junior people, because of the reservation, become senior to those who joined earlier to them. Despite that, keeping in view the social status and the sufferings which this particular section has been going through, this has been done by amending the Constitution. … (Interruptions)

SHRI K.H. MUNIYAPPA : I thanked the Government for that but it has not been implemented. That is the point. … (Interruptions)

23.00 hrs.

SHRI I.D. SWAMI: So far as your third question, what have I done so far, is concerned, I have already enumerated what has been done so far. But every year, it has been made an annual feature to hold the conferences of the Directors-General of Police and the Chief Secretaries of the States. The conference of Chief Ministers is also held. All these issues, along with many other issues of internal security, etc., are discussed there, and the attention of the officers is focussed on this.

SHRI KODIKUNNIL SURESH : Sir, I want to seek two clarifications. There is a long-pending demand for setting up of the special courts to try cases of atrocities on Dalits. What is the reaction of the Government of India?

The second one is, in the para-military forces like the CRPF, BSF and CISF, the representation of the Dalits is very less. I would like to know whether the Government of the day has considered to hold a special recruitment drive for the Dalit youth.

SHRI I.D. SWAMI: So far as the special courts are concerned, I have already said that exclusive special courts have already been established in 10 States.

SHRI KODIKUNNIL SURESH : What about the other States? In my State, there is no special court.

SHRI I.D. SWAMI: We are pursuing the matter with the other States.

MR. DEPUTY-SPEAKER: He is pursuing the matter in the other States.

SHRI DALIT EZHILMALAI : It should be insisted and he did not do that.

SHRI I.D. SWAMI: We are not only pursuing it bilaterally but also, as you know, under the existing Constitutional constraints and under the existing scheme of the Constitution of India, under the Constitutional and federal set-up, we cannot go beyond a particular limit. We are observing that limit, but we are certainly pursuing the matter.

SHRI DALIT EZHILMALAI : I want to know about the setting up of the special courts to try the cases. The Prevention of Atrocities on Scheduled Caste and Scheduled Tribe Act is certainly within the jurisdiction of the Union Government. It can instruct the State Governments to set up the court or to nominate a particular court in such and such time. The mechanism is to be suggested by this Union Government. It depends upon the nature of the cases, and the hon. Minister was referring to that. These are not the new things that are happening for the last three or four years. This has been in vogue for several years now.

MR. DEPUTY-SPEAKER: What is your clarification?

SHRI DALIT EZHILMALAI : There are 32 States in the country. According to the Minister, it is only in 10 States that the special courts have been set up and they are already existing. They propose to set up the special courts in eight other States. But the atrocities on Dalits are rampant, widespread and they are happening everywhere. Therefore, is there any mechanism, is there any direction, or is there any idea from the Union Government?

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Dalit Ezhilmalai, what he says is that there are certain limits within which they are pursuing the cases.

SHRI I.D. SWAMI: Mr. Deputy-Speaker, Sir, 137 exclusive special courts have been set up in the States. So far as the other States are concerned, all the State Governments, except the State of Arunachal Pradesh, Mizoram and Nagaland which are predominantly tribal area States, have notified the existing courts of session judge as special courts for the trial of offences under the Prevention of Atrocities on Scheduled Caste and Scheduled Tribe Act, 1989.

SHRI DALIT EZHILMALAI : Mr. Deputy-Speaker, Sir, those were all done during the days of Shri Sitaram Kesri when he was in the Ministry of Welfare.

SHRI I.D. SWAMI: I am not saying that we have done it only yesterday. We are saying that this has been done so far by the Central Government.

SHRI DALIT EZHILMALAI : This is my appeal to the hon. Minister. How many courts have been set up during this present regime? How many States are still expected to set up their own courts? What is the idea or mechanism from the Union Government to set up the special court when a woman is raped, when a group murder has taken place or when displacement is an ongoing affair? … (Interruptions) So, this is an honest statement from the Government. So, I am so grateful to the hon. Minister.

MR. DEPUTY-SPEAKER: He will send all these details to you.

SHRI DALIT EZHILMALAI : Thank you, Mr. Deputy-Speaker, Sir. I agree with you. I am grateful to the hon. Minister as well. At least, for the last three or four years, there was no activity with regard to the setting up of the special courts, particularly to try the cases. He was referring to the old courts and the information that was already available.

MR. DEPUTY-SPEAKER: He was referring to up-to-date information. Am I correct?

SHRI I.D. SWAMI: You are right.

MR. DEPUTY-SPEAKER: Shri Dalit Ezhilmalai, he has stated it in his reply. You did not hear him fully.

Mr. Minister, whatever information he has asked, you can send it to him if you do not have it now.

SHRI I.D. SWAMI: Yes, Sir.

SHRI DALIT EZHILMALAI : Hon. Deputy-Speaker, Sir, I was asking about the mechanism. Is there any new methodology that they have adopted or any new innovative system that they have worked out so far? That was my question. Whatever he has said are being done from the olden times. … (Interruptions)

MR. DEPUTY-SPEAKER: Do you have any methodology adopted to expedite the setting up of these courts?

SHRI I.D. SWAMI: Sir, the only methodology is that we can draw the attention of the State Governments to the provisions of the Act and advise them on the necessity for setting up of special courts. We will do that. … (Interruptions)

श्री रामजीलाल सुमन : माननीय उपाध्यक्ष महोदय, मंत्री जी ने तमाम चीजों की जानकारी दी। मेरा कहना है कि सरकार की अच्छी इच्छा होने के बावजूद भी प्रमोशन में रिजर्वेशन आदि तमाम बातों में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में मामले लंबित हैं। हमने आपसे कई बार आग्रह किया है कि अदालत में सरकार की तरफ से ठीक पैरवी हो, उसके लिए कानून मंत्रालय, कार्मिक मंत्रालय, जटिया साहब के मंत्रालय और गृह मंत्रालय आदि इन सब मंत्रालयों के सक्षम अधिकारियों की अगर कोई टीम बन जाये जो यह देखना सुनिश्चित करे कि वभिन्न अदालतों में अनुसूचित जाति-जनजाति के हकों के खिलाफ, इंटरैस्ट के खिलाफ मुकदमे चल रहे हैं, उनकी अच्छी पैरवी हो।

मैं मंत्री जी से जानना चाहूंगा कि क्या उनका इस प्रकार का कोई तंत्र विकसित करने का इरादा है ? दूसरा मुझे यह निवेदन करना है कि हिन्दुस्तान में महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे महापुरुषों के जन्म शताब्दी समारोह एक वर्ष तक चले बने जबकि डा. भीम राव अम्बेडकर का जन्म शताब्दी समारोह तीन वर्ष तक चला। आप मुझे इसके बारे में मत बताइये। उस समय जन्म शताब्दी समारोह समति ने काम किया। उसके साथ-साथ वभिन्न विषयों पर जैसे शिक्षा, आरक्षण, भूमि सुधार आदि अन्य विषयों पर काम करने के लिए वभिन्न उपसमतियां भी बनाई गयीं। उन्होंने अपनी जो संस्तुतियां दी, उसे भारत सरकार ने स्वीकार किया। कैबिनेट ने भी फैसला लिया था कि इन सब संस्तुतियों को पूरा करने का काम भारत सरकार करेगी। इसके साथ-साथ १५० संसद सदस्यों ने भी लिखकर दिया था कि डा. भीम राव अम्बेडकर जन्म शताब्दी समारोह समति की जो उपसमतियां बनी हैं, उन उपसमतियों की संस्तुतियों को सरकार माने। इस बारे में सरकार का कमिटमैंट था।

मैं आपकी मार्फत मंत्री जी से दो बातें जानना चाहूंगा कि अदालत में ठीक ढंग से पैरवी हो, उसके लिए क्या सरकार कोई उच्च स्तरीय समति बनाने का इरादा रखती है और डा. भीम राव अम्बेडकर जन्म शताब्दी समारोह समति के समय बनायी गयी उप समतियों की संस्तुतियां आने के बाद जो कमिटमैंट गवर्नमैंट ऑफ इंडिया ने किया था जिसके बारे में कैबिनेट में डिसीजन भी हुआ था, उसको सरकार लागू करने में क्यों देरी कर रही है ?

श्री आई.डी. स्वामी :आपने जो सुझाव दिया कि डिपार्मैंटल आफिसर्स की एक समति बनाई जाये, तो वह अच्छा सुझाव है। हम इस पर पूरी तरह से गौर करेंगे, कंसीडर करेंगे, विचार करेंगे। लेकिन मैं आपको बता दूं कि जो इम्प्रेशन है कि कन्वैंशन नहीं होता या ट्रायल नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। मेरे पास चार-पांच साल के आंकड़े हैं। १--२००० में आई.पी.…( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : आप हमें आंकड़े मत बताइये।…( व्यवधान)

श्री आई.डी. स्वामी :आपका सुझाव तो हमने मान लिया है। …( व्यवधान)

उपाध्यक्ष महोदय : आपने जो प्रश्न पूछा है, उसके उत्तर में वे आंकड़ें बता रहे हैं।

...( व्यवधान)

श्री रामजीलाल सुमन : यह आंकड़ों की बात नहीं है। ९ दिसम्बर को झज्जर में स्वामी जी ने अपने बयान में कहा था कि अनुसूचित जाति-जनजाति पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई है। यहां जटिया साहब बैठे हैं। उनका बयान इसी संसद में हुआ था। उस समय जटिया साहब ने स्वीकार किया था कि दलित अत्याचारों में इजाफा हुआ है। इसलिए पुराने आंकड़ों की बात छोड़ दीजिए। आप आगे क्या करना चाहते हैं, उसके बारे में बताइये। …( व्यवधान)

श्री आई.डी. स्वामी :आपने जो सुझाव दिया, उसके बारे में मैंने पहले कहा कि वह अच्छा सुझाव है। उस पर पूरा विचार किया जायेगा और जल्दी विचार किया जायेगा। यह मैंने आपको पहले भी कहा है। मैं आंकड़ें इसलिए बता रहा हूं कि ४१ परसेंट, २५ परसेंट, ४८ परसेंट कन्वैंशन भी होता है। जब वह समति नहीं बनी थी तब भी लीगल आफिसर उन केसेज की पैरवी करने के लिए लगाये गये। यह नहीं होता कि कोई कन्वैंशन ही न हो। मेरे पास आंकड़ें है जिसमें ४१.८ परसेंट, २६ परसेंट, ३९ परसेंट आदि अलग-अलग सालों में होते रहे हैं।

SHRI KODIKUNNIL SURESH : What about the special recruitment of paramilitary forces?

SHRI I.D. SWAMI: I have already told about it.

MR. DEPUTY SPEAKER : The house now stands adjourned till 11.00 a.m. tomorrow.

23.10 hrs.

The Lok Sabha then adjourned till Eleven of the Clock

on Thursday, March 13, 2003/Phalguna 22, 1924 (Saka).

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